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मोदी सरकार के 12 साल में मेट्रो नेटवर्क का विस्तार, 250 KM से 1100 KM पार कैसे पहुंचा?

Indian Metro: मोदी सरकार में मेट्रो नेटवर्क 250 KM से 1100 KM कैसे पहुंचा

Indian Metro: भारत में शहरी परिवहन बीते एक दशक में बड़े बदलावों से गुजरा है। वर्ष 2014 में देश का मेट्रो नेटवर्क लगभग 250 किलोमीटर था, जो 2026 तक 1100 किलोमीटर से अधिक हो गया। मेट्रो सेवाओं का विस्तार अब दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों के साथ कई अन्य शहरों तक भी पहुंचा है। केंद्र सरकार ने शहरी परिवहन के आधुनिकीकरण, मेट्रो परियोजनाओं के विस्तार और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। ऐसे में सवाल है कि मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में मेट्रो नेटवर्क का विस्तार कैसे हुआ और इसका शहरों की परिवहन व्यवस्था पर क्या असर पड़ा?

2014 में पांच शहरों तक सीमित था मेट्रो नेटवर्क

वर्ष 2014 में भारत में लगभग 248 किलोमीटर का मेट्रो नेटवर्क पांच शहरों में संचालित था। इसके बाद दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई, लखनऊ, अहमदाबाद, नागपुर और पुणे जैसे शहरों में मेट्रो सेवाओं का विस्तार हुआ। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2025 तक परिचालन मेट्रो नेटवर्क 1,000 किलोमीटर के पार पहुंच चुका था। वर्ष 2026 में यह आंकड़ा और आगे बढ़ा। इस विस्तार ने मेट्रो को कुछ बड़े महानगरों तक सीमित परिवहन व्यवस्था से आगे बढ़ाकर कई शहरी क्षेत्रों की यातायात व्यवस्था का हिस्सा बनाया।

Indian Metro: मोदी सरकार में मेट्रो परियोजनाओं पर निवेश बढ़ा

मेट्रो नेटवर्क के विस्तार में केंद्र सरकार की नीतियों, राज्यों की भागीदारी और शहरी परिवहन में निवेश की अहम भूमिका रही है। मोदी सरकार के कार्यकाल में नई मेट्रो परियोजनाओं को मंजूरी देने, पुराने कॉरिडोर का विस्तार करने और आधुनिक तकनीक अपनाने पर जोर दिया गया। मेट्रो परियोजनाओं में केंद्र और राज्य सरकारें निर्धारित वित्तीय मॉडल के अनुसार भागीदारी करती हैं। परियोजना की लागत, शहर की जरूरत, यात्रियों की संभावित संख्या और आर्थिक व्यवहार्यता के आधार पर योजनाएं तैयार की जाती हैं। हालांकि, मेट्रो का निर्माण लंबी प्रक्रिया है, जिसमें भूमि, निर्माण, सुरक्षा परीक्षण और परिचालन संबंधी मंजूरियां भी शामिल होती हैं।

यात्रियों की संख्या में भी हुई बढ़ोतरी

मेट्रो नेटवर्क के साथ यात्रियों की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2013-14 में मेट्रो से प्रतिदिन औसतन लगभग 28 लाख यात्राएं होती थीं, जबकि 2025-26 में यह संख्या करीब 1.15 करोड़ प्रतिदिन तक पहुंच गई। मेट्रो सेवाएं नियमित समय-सारिणी, अपेक्षाकृत तेज यात्रा और बड़े यात्री समूहों को एक साथ ले जाने की क्षमता के कारण शहरी परिवहन का महत्वपूर्ण विकल्प बनी हैं। यात्रियों को मिलने वाला वास्तविक लाभ शहर, रूट, स्टेशन की दूरी, किराये और अन्य परिवहन साधनों से कनेक्टिविटी पर निर्भर करता है।

Indian Metro: तकनीक और आधुनिक सुविधाओं पर भी जोर

मेट्रो विस्तार केवल नई पटरियां बिछाने तक सीमित नहीं रहा। कई परियोजनाओं में आधुनिक सिग्नलिंग, स्वचालित ट्रेन संचालन की तकनीक, डिजिटल टिकटिंग और ऊर्जा दक्षता से जुड़े उपाय शामिल किए गए हैं। देश में मेट्रो कोच के घरेलू निर्माण को भी बढ़ावा मिला है। दिल्ली-एनसीआर में नमो भारत जैसी क्षेत्रीय तेज परिवहन सेवा ने महानगरीय क्षेत्रों के बीच कनेक्टिविटी को लेकर नई संभावनाएं प्रस्तुत की हैं। हालांकि, मेट्रो और क्षेत्रीय रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) अलग-अलग प्रणालियां हैं, इसलिए नेटवर्क के आंकड़ों की तुलना करते समय यह देखना जरूरी है कि उनमें RRTS को शामिल किया गया है या नहीं।

Indian Metro: ट्रैफिक, प्रदूषण और लागत की चुनौतियां क्या हैं?

मेट्रो के विस्तार से निजी वाहनों पर निर्भरता घटाने और सड़क यातायात का दबाव कम करने की संभावना बढ़ती है। लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि कितने लोग निजी वाहनों से मेट्रो की ओर आते हैं और स्टेशन तक पहुंचने के लिए उन्हें कितनी सुविधाएं मिलती हैं। दूसरी ओर, मेट्रो परियोजनाओं में शुरुआती निवेश काफी अधिक होता है। निर्माण में देरी, लागत में वृद्धि, किराये और परिचालन खर्च जैसी चुनौतियां भी सामने आती हैं। इसलिए मेट्रो नेटवर्क की सफलता को केवल किलोमीटर में विस्तार से नहीं, बल्कि यात्रियों की संख्या, कनेक्टिविटी, वित्तीय स्थिरता और सेवा की गुणवत्ता से भी समझना जरूरी है।

 

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