Dussehra Traditions: राजस्थान में दशहरा केवल भगवान श्रीराम की जीत और रावण की हार का पर्व नहीं है। यहां अलग-अलग जगहों पर इस त्योहार को मनाने के तरीके भी अलग हैं। कहीं रावण के पुतले को जलाने के बजाय उसका वध किया जाता है, तो कहीं उसकी मृत्यु पर शोक मनाया जाता है। कुछ जगहों पर रावण के साथ कुश्ती लड़ने की परंपरा है, जबकि एक स्थान पर उसके पुतले को 20 फीट लंबी बीड़ी पिलाई जाती है। ये सभी परंपराएं राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय मान्यताओं को दर्शाती हैं। सदियों से चली आ रही ये रस्में बताती हैं कि एक ही त्योहार को अलग-अलग क्षेत्रों में कितने अनोखे तरीकों से मनाया जाता है।
Dussehra Traditions: सीकर में 173 साल से हो रहा राम-रावण युद्ध का मंचन
राजस्थान के सीकर जिले के दातारामगढ़ क्षेत्र के बाय कस्बे में दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। यहां दक्षिण भारतीय शैली में राम और रावण के बीच युद्ध का मंचन किया जाता है। इस दौरान पूरा गांव अयोध्या और लंका का रूप ले लेता है और गांव का लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी किरदार की भूमिका निभाता है।इस आयोजन में करीब 300 लोग मुखौटे पहनकर राम और रावण की सेनाओं में बंट जाते हैं। युद्ध के मंचन में तलवारों और दूसरे अस्त्र-शस्त्रों का इस्तेमाल किया जाता है। नगाड़ों की आवाज, शंखनाद और जयकारों से पूरे गांव का माहौल रणभूमि जैसा हो जाता है। इस परंपरा में हिस्सा लेने के लिए विदेशों में नौकरी करने वाले गांव के लोग भी छुट्टी लेकर वापस आते हैं।युद्ध के अंत में भगवान श्रीराम रावण का वध करते हैं। इसके बाद विजयादशमी का उत्सव मनाया जाता है।यह परंपरा करीब 173 साल पुरानी बताई जाती है। मान्यता के अनुसार, 1860 के आसपास गांव के कुछ पूर्वज काम के सिलसिले में दक्षिण भारत गए थे। वहां उन्होंने इसी तरह की रामलीला देखी। गांव लौटने के बाद उन्होंने भी इस आयोजन की शुरुआत की, जो आज तक जारी है।
जोधपुर: रावण की मृत्यु पर मनाया जाता है शोक
जोधपुर के मंडोर में रावण से जुड़ी एक अलग ही परंपरा देखने को मिलती है। इसे रावण का ससुराल माना जाता है। यहां मेहरानगढ़ किले की तलहटी में रावण का मंदिर बना हुआ है। यह राजस्थान की उन खास जगहों में शामिल है, जहां रावण की पूजा की जाती है।मंडोर में विजयादशमी के दिन रावण के वध को उत्सव के बजाय शोक के रूप में देखा जाता है। दवे गोधा ब्राह्मण समाज के लोग कई पीढ़ियों से रावण की पूजा करते आ रहे हैं।दशहरे पर रावण का दहन होने के बाद मंदिर की सफाई की जाती है और उसे धोया जाता है। इसके बाद धुएं को देखकर स्नान करने की परंपरा निभाई जाती है। मंदिर में आरती की जाती है और खीर-पूड़ी का भोग लगाया जाता है। दवे गोधा ब्राह्मण समाज से जुड़े परिवार भी अपने घरों में सूतक रखते हैं।मान्यता है कि रावण की पत्नी महारानी मंदोदरी मंडोर के राजा मयसुर की बेटी थीं। पंडित अजय दवे के अनुसार, जब रावण मंदोदरी से विवाह करने के लिए मंडोर आया था, तब दवे गोधा ब्राह्मण समाज के लोग भी उसके साथ आए थे।विवाह के बाद इस गोत्र के कुछ लोग यहीं रुक गए और धीरे-धीरे मंडोर में बस गए। इसी संबंध के कारण समाज के लोग रावण को अपना पूर्वज मानते हैं और उसकी मृत्यु पर शोक मनाते हैं।

Dussehra Traditions: कोटा में 1723 में शुरू हुआ दशहरा मेला
कोटा का दशहरा मेला राजस्थान के प्रसिद्ध आयोजनों में शामिल है। इसकी शुरुआत 1723 में महाराजा दुर्जनशाल सिंह हाड़ा के शासनकाल में हुई थी। इस मेले की खास बात यह थी कि यहां रावण को जलाने के बजाय उसका वध किया जाता था।इसके लिए रावण, मेघनाद, कुंभकर्ण, मंदोदरी और खर-दूषण के विशाल मिट्टी के पुतले तैयार करके दशहरा मैदान में खड़े किए जाते थे।आयोजन के दौरान सबसे पहले रावण को युद्ध न करने के लिए समझाया जाता था। इसके जवाब में रावण कहता था कि वह किसी की बात नहीं मानेगा और युद्ध जरूर करेगा।इसके बाद पूर्व कोटा राजपरिवार की शाही सेना के हाथी इन पुतलों को खींचकर गिराते थे और अपने पैरों से कुचलकर उनका वध करते थे।इस परंपरा के पीछे रावण के अहंकार को खत्म करने का संदेश माना जाता था। हाथियों के पैरों से मिट्टी के पुतलों को कुचलना बुराई और घमंड के अंत का प्रतीक था।
प्रतापगढ़: 71 फीट के रावण को पिलाई जाती है 20 फीट लंबी बीड़ी
राजस्थान के प्रतापगढ़ में दशहरे पर रावण के पुतले से जुड़ी एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां हर साल रावण का करीब 71 फीट ऊंचा पुतला तैयार किया जाता है। इसे जोधपुरी पोशाक पहनाई जाती है और हर साल इसकी पोशाक में बदलाव किया जाता है।इस पुतले की सबसे खास बात यह है कि इसे 20 फीट लंबी बीड़ी पिलाई जाती है। इस परंपरा को निभाने के लिए एक मुस्लिम परिवार कई सालों से रावण का पुतला तैयार करता आ रहा है।दशहरे के दिन इस आयोजन के दौरान करीब एक घंटे तक आतिशबाजी भी की जाती है।नगर परिषद ने 2011 में रावण के पुतले को बीड़ी पिलाने की परंपरा शुरू की थी। इसका उद्देश्य लोगों को नशे से दूर रहने का संदेश देना और नशामुक्त समाज के निर्माण के प्रति जागरूक करना है।
कोटा के नांता में रावण से होती है कुश्ती
कोटा के नांता में दशहरे पर रावण को जलाने के बजाय पैरों से कुचलकर उसका वध किया जाता है। यह आयोजन जेठी समाज की कुलदेवी लिंबजा माता के मंदिर में होता है। इस परंपरा में समाज के पहलवान हिस्सा लेते हैं।इस आयोजन की तैयारी श्राद्ध पक्ष के दौरान ही शुरू हो जाती है। इसी समय मिट्टी से रावण की प्रतिमा बनाई जाती है। इसे तैयार करने के लिए कुश्ती के अखाड़े की मिट्टी में घी, दूध, शहद, दही और गेहूं मिलाए जाते हैं।नवरात्र के नौ दिनों के दौरान इस प्रतिमा में जवारे उग आते हैं। इसके बाद मंदिर में केवल पुजारी को प्रवेश की अनुमति होती है।दशहरे के दिन जेठी समाज के पहलवान मंदिर में इकट्ठा होते हैं। पूजा-अर्चना के बाद वे मिट्टी से बनी रावण की प्रतिमा को अपने पैरों से कुचलकर उसका वध करते हैं।
Dussehra Traditions: 150 साल पुरानी है परंपरा
जेठी समाज को पारंपरिक रूप से पेशेवर पहलवानों का समाज माना जाता है। इस समाज के लोग अखाड़े की पवित्र मिट्टी से रावण की प्रतिमा तैयार करते हैं। विजयादशमी पर पहलवान कुश्ती के दांव-पेच और अपने पैरों का इस्तेमाल करके प्रतिमा को रौंदते हैं।करीब 150 साल से चली आ रही इस परंपरा का उद्देश्य रावण के घमंड और अहंकार को पैरों तले कुचलने का प्रतीकात्मक संदेश देना है। इसके जरिए बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है।
कोटा: 133 साल पहले शुरू हुआ रावण दहन
कोटा में रावण दहन की परंपरा करीब 133 साल पहले शुरू हुई थी। यहां दशहरे पर राजस्थान के सबसे विशाल रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। इन पुतलों की ऊंचाई 200 फीट से भी अधिक बताई जाती है।इसके साथ ही पूर्व कोटा राजपरिवार के सदस्य 300 साल से भी पुरानी दरिखाने की परंपरा को आज भी निभाते हैं। इस परंपरा के तहत एक सभा आयोजित की जाती है और शोभायात्रा निकालकर दशहरा मैदान तक पहुंचा जाता है।मैदान में पहुंचने के बाद पूर्व राजपरिवार के सदस्य कलश पूजन करते हैं। इसके बाद रावण पर तीर चलाकर उसका दहन किया जाता है।शुरुआत में कोटा का दशहरा मेला केवल तीन दिन तक आयोजित किया जाता था। बाद में महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय ने इसका विस्तार करते हुए इसे 25 दिनों के बड़े मेले का रूप दिया।
Dussehra Traditions: क्या था दशहरा मेले का उद्देश्य?
रियासतकाल में दशहरा मेले का मुख्य उद्देश्य आम जनता और सामंतों यानी ठिकानेदारों को एक साथ लाना था। इसके जरिए हाड़ौती क्षेत्र की परंपराओं को जीवित रखने और लोगों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़े रखने का प्रयास किया जाता था।वहीं, हाथियों से रावण के मिट्टी के पुतलों को कुचलने के पीछे उसके अहंकार को खत्म करने की मान्यता जुड़ी थी। इस तरह कोटा का दशहरा मेला धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सामाजिक मेल-मिलाप और स्थानीय परंपराओं को आगे बढ़ाने का माध्यम भी रहा है।








