BJP Delimitation Move: परिसीमन के मुद्दे पर भाजपा की नई राजनीतिक रणनीति ने विपक्षी खेमे में हलचल बढ़ा दी है। कांग्रेस को आशंका है कि सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए विपक्षी दलों के बीच सहमति बनाने और अपने पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। दरअसल, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बयान के बाद परिसीमन विधेयक पर चर्चा के लिए संसद का संक्षिप्त सत्र बुलाए जाने की अटकलें तेज हो गई हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा की यह रणनीति कांग्रेस को विपक्ष में अलग-थलग कर सकती है और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ बने संयुक्त विपक्षी मोर्चे को कमजोर कर सकती है?
BJP Delimitation Move: लोकसभा में अटक गया था संविधान संशोधन विधेयक-
सरकार ने अप्रैल 2026 में लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने की कोशिश की थी, लेकिन उसे आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। महिला आरक्षण लागू करने और लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने से जुड़े इस विधेयक पर सदन में पर्याप्त समर्थन नहीं जुट पाया था। मतदान के दौरान विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। कुल 528 सदस्यों ने मतदान किया था। संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए कम से कम 352 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता थी। इस तरह विधेयक आवश्यक बहुमत हासिल करने में विफल रहा।
BJP Delimitation Move: क्या है परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य-
सरकार के प्रस्ताव का उद्देश्य 2029 से विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना और लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करना है। परिसीमन के तहत निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व से जुड़े बदलाव किए जा सकते हैं।
हालांकि, इस प्रस्ताव को लागू करने के तरीके और राज्यों के प्रतिनिधित्व पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद हैं। यही वजह है कि विधेयक को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक खींचतान जारी है।
कांग्रेस को किस बात का है डर-
कांग्रेस को आशंका है कि सरकार विधेयक को दोबारा पारित कराने के लिए आवश्यक बहुमत जुटाने की कोशिश कर रही है। इसके लिए भाजपा विपक्षी खेमे की क्षेत्रीय पार्टियों से अलग-अलग बातचीत करके समर्थन हासिल करने की रणनीति अपना सकती है।
कांग्रेस की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्षी दलों के विचार एक जैसे नहीं हैं। ऐसे में यदि कुछ क्षेत्रीय दल सरकार के प्रस्ताव के समर्थन में आते हैं, तो विपक्ष की संयुक्त रणनीति कमजोर पड़ सकती है।
खरगे ने पीएम मोदी को लिखा चौथा पत्र-
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चौथा पत्र लिखकर परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयकों पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग दोहराई। खरगे ने सरकार को आगाह किया कि राष्ट्रीय परिसीमन जैसे संवेदनशील संवैधानिक सुधारों पर एकतरफा फैसला लेना उचित नहीं है। इसका सीधा असर संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और राज्यों के क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। खरगे ने अपने पत्र में याद दिलाया कि उन्होंने सबसे पहले 11 अप्रैल 2026 को सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी। इसके बाद 14 अप्रैल की देर शाम विधेयक सार्वजनिक किए गए और 16 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुलाया गया था।
हालांकि, 17 अप्रैल को संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका। खरगे ने बताया कि इसके बाद उन्होंने 16 जुलाई और 27 अगस्त को भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखे थे। अब चौथी बार उन्होंने सरकार से एकतरफा कदम उठाने से बचने और सभी राजनीतिक दलों से परामर्श करने की अपील की है।
खरगे के पत्र पर रिजिजू की तीखी प्रतिक्रिया-
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पत्र पर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बार-बार अनुरोध के बावजूद कांग्रेस ने चर्चा के लिए तारीखें तय नहीं कीं। इसके बाद सरकार ने व्यापक सहमति बनाने के उद्देश्य से अन्य राजनीतिक दलों से बातचीत की। रिजिजू के मुताबिक, प्रस्तावित कानून को लेकर समाजवादी पार्टी, डीएमके, वाईएसआरसीपी, एनसीपी (एसपी), शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजेडी समेत कई प्रमुख दलों के प्रतिनिधियों से परामर्श किया गया है। रिजिजू ने मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं होने को लेकर खरगे की चिंताओं को भी खारिज किया। उन्होंने कहा कि संविधान में ऐसा कोई नियम नहीं है, जिसके तहत अनिश्चितकाल के लिए स्थगित सदन का एक निश्चित समयसीमा के भीतर सत्रावसान करना अनिवार्य हो।
तय समयसीमा के भीतर सत्रावसान का कोई नियम नहीं-
संसद की कार्यवाही और सत्रावसान की प्रक्रिया को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है। जब किसी सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया जाता है, तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि उसका सत्र औपचारिक रूप से समाप्त हो गया है। सत्रावसान के लिए राष्ट्रपति का आदेश आवश्यक होता है। इसके विपरीत, अनिश्चितकाल के लिए स्थगित सदन को आवश्यकता पड़ने पर दोबारा बुलाया जा सकता है। इस स्थिति में सरकार के पास संसद का सत्र फिर से बुलाकर विधेयक पर चर्चा कराने का विकल्प बना रह सकता है।
चूंकि परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक अध्यादेश के जरिए लागू नहीं किया जा सकता, इसलिए इसे पारित कराने के लिए संसद की मंजूरी आवश्यक होगी। यही कारण है कि विधेयक को लेकर सरकार की अगली रणनीति पर राजनीतिक दलों की नजर बनी हुई है।
SIR पर एकजुट विपक्ष, लेकिन परिसीमन पर मतभेद-
पिछले कुछ हफ्तों में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के विरोध में इंडी गठबंधन और कई क्षेत्रीय दल कांग्रेस के नेतृत्व में एकजुट नजर आए हैं। डीएमके और आम आदमी पार्टी जैसे दलों के रुख में भी इस मुद्दे पर विपक्षी एकजुटता दिखाई दी है, भले ही वे विपक्षी गठबंधन की सभी गतिविधियों में समान रूप से शामिल न रहे हों। हालांकि, परिसीमन के मुद्दे पर विपक्षी दलों के बीच अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं। डीएमके और कांग्रेस के बीच तमिलनाडु की राजनीति को लेकर भी मतभेद बताए जा रहे हैं। वहीं, कुछ अन्य क्षेत्रीय दल भी अलग-अलग मुद्दों पर अपने राजनीतिक हितों के अनुसार रुख अपनाते रहे हैं। ऐसे में परिसीमन विधेयक पर सरकार की ओर से क्षेत्रीय दलों के साथ सीधी बातचीत ने विपक्षी खेमे में असमंजस बढ़ा दिया है। कांग्रेस को आशंका है कि SIR के विरोध में बनी एकजुटता परिसीमन के मुद्दे पर कमजोर पड़ सकती है।
विपक्षी एकजुटता के सामने परिसीमन की चुनौती-
SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े मुद्दों पर कई क्षेत्रीय दलों और नागरिक समाज समूहों ने विरोध जताया है। हालांकि, परिसीमन विधेयक पर सरकार के साथ अलग-अलग स्तर पर हो रही बातचीत ने विपक्षी एकजुटता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस की चुनौती यह है कि वह क्षेत्रीय दलों को एक साझा रणनीति के तहत साथ रखे। वहीं, भाजपा की कोशिश है कि परिसीमन और महिला आरक्षण के मुद्दे पर अधिक से अधिक राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल किया जाए। यदि विपक्षी दल इस मुद्दे पर एक साझा रुख नहीं बना पाते हैं, तो इसका असर संसद में उनकी रणनीति और भविष्य में होने वाले राजनीतिक आंदोलनों पर पड़ सकता है।
क्षेत्रीय दलों को साधने की भाजपा की रणनीति-
भाजपा परिसीमन विधेयक पर आम सहमति बनाने के लिए क्षेत्रीय दलों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रही है कि प्रस्तावित बदलावों से लोकसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व प्रभावित नहीं होगा। सरकार के प्रस्तावित फॉर्मूले के अनुसार, लोकसभा की सीटों में सभी राज्यों के लिए समान अनुपात में 50 प्रतिशत की वृद्धि करने की बात कही गई है। इस व्यवस्था का उद्देश्य राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर उठने वाली चिंताओं को दूर करना है। हालांकि, इस फॉर्मूले का अंतिम स्वरूप और उसका वास्तविक प्रभाव विधायी प्रस्तावों के विवरण पर निर्भर करेगा।
दूसरी ओर, महिला आरक्षण का मुद्दा विपक्षी दलों के लिए राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण है। यदि कोई दल महिला आरक्षण का विरोध करता है, तो भाजपा उसे महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के खिलाफ बताकर घेर सकती है। वहीं, समर्थन करने से महिला आरक्षण के पक्ष में राजनीतिक संदेश देने का अवसर मिलता है। ऐसे में परिसीमन और महिला आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा की रणनीति विपक्षी दलों के बीच मतभेद बढ़ा सकती है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को साथ रखने में कितनी सफल होती है और सरकार विधेयक को लेकर आगे क्या कदम उठाती है।
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