Ajit Pawar: अगर किस्मत ने ज़रा-सा भी रुख बदला होता, तो महाराष्ट्र की राजनीति में नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की दुनिया में एक जाना-पहचाना नाम होता अजित पवार।उनके सामने दो रास्ते खुले थे सिनेमा और सत्ता। उन्होंने वह रास्ता चुना, जिसने उन्हें सीधे राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया।
Ajit Pawar: फिल्मी विरासत: जहां से शुरू हो सकता था बॉलीवुड का सफ़र
अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को अहमदनगर ज़िले के देवलाली प्रवरा में हुआ। कम लोग जानते हैं कि उनके पिता अनंतराव पवार ने हिंदी सिनेमा के दिग्गज V. Shantaram के साथ Rajkamal Studio में काम किया था।यानी कैमरा, लाइट और एक्शन—अजित पवार के लिए अनजान नहीं थे। अगर वे पिता की राह पकड़ते, तो संभव था कि उनका नाम किसी निर्माता-निर्देशक या प्रभावशाली फिल्मी मैनेजर के तौर पर लिया जातालेकिन यहीं कहानी ने मोड़ लिया।
Ajit Pawar: चाचा की छाया और राजनीति का चुंबक
अजित पवार ने सिनेमा की चमक के बजाय अपने चाचा Sharad Pawar की सियासी विरासत को चुना।शरद पवार की प्रशासनिक समझ, जनाधार और सत्ता की पकड़ ने अजित पवार को राजनीति की ओर खींच लिया।महाराष्ट्र में पढ़ाई पूरी करने के बाद (बी.कॉम—शिवाजी यूनिवर्सिटी), उन्होंने बिना देर किए सत्ता की राह पकड़ ली।
सहकार से सत्ता तक: राजनीति में ठोस एंट्री
अजित पवार का राजनीतिक सफ़र किसी अचानक हुए चमत्कार का नतीजा नहीं था, बल्कि उन्होंने पवार परिवार की पहचान रहे गन्ना सहकारी समितियों, ग्रामीण राजनीति और किसान-केंद्रित संगठनों को ही अपना आधार बनाया।1991 में बारामती से सांसद बने, लेकिन महज़ छह महीने बाद ही इस्तीफा दे दिया। वजह साफ थी शरद पवार का केंद्र में मंत्री बनना और परिवार का अलिखित नियम: एक पद, एक जिम्मेदारी। इसके बाद अजित पवार ने विधानसभा की राजनीति को अपना स्थायी मैदान बना लिया।अजित पवार के बारे में एक बात निर्विवाद रही वे सत्ता से समझौता नहीं करते, उसे हासिल करना जानते हैं।2009 के विधानसभा चुनावों के बाद डिप्टी सीएम न बनाए जाने से उनकी नाराज़गी खुलकर सामने आई। लेकिन दिसंबर 2010 में उन्होंने ज़ोरदार वापसी की और डिप्टी सीएम की कुर्सी संभाली।इस दौर में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री Prithviraj Chavan की खुलकर आलोचना भी की—जो उनके बेबाक अंदाज़ की पहचान बना।
Ajit Pawar: एनसीपी का जन्म और ताकत का विस्तार
1999 में सोनिया गांधी की विदेशी नागरिकता के मुद्दे पर शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर Nationalist Congress Party की स्थापना की।अजित पवार बिना हिचक उनके साथ खड़े हुए। उसी साल, 40 वर्ष की उम्र में, वे महाराष्ट्र के सबसे युवा कैबिनेट मंत्री बने।उन्हें सिंचाई मंत्रालय सौंपा गया—जहां उन्होंने लगभग 10 साल तक काम किया। हालांकि इसी विभाग से जुड़े कथित घोटालों ने उन्हें लंबे समय तक विवादों में भी रखा।
फिल्मी पर्दा नहीं, सियासी मंच
अगर अजित पवार ने बॉलीवुड चुना होता, तो शायद वे परदे के पीछे से कहानी चलाते।लेकिन उन्होंने चुना सत्ता का मंच, संघर्ष की रोशनी और फैसलों की आंधी।आज वे महाराष्ट्र की राजनीति के ऐसे किरदार हैं, जो कभी नायक लगते हैं, कभी विरोधी पर कहानी के केंद्र में हमेशा रहते हैं।क्योंकि कुछ लोग फिल्में नहीं बनाते इतिहास गढ़ते हैं
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