Chabahaar port: ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच चाबहार बंदरगाह एक बार फिर चर्चा में है। भारत सरकार के शीर्ष सूत्रों ने साफ कर दिया है कि भारत चाबहार बंदरगाह को छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं रहा है। सरकार के मुताबिक, इस विकल्प पर कोई विचार नहीं किया जा रहा। हालांकि, ऐसा कोई बीच का रास्ता जरूर तलाशा जा रहा है, जिससे अमेरिका की चिंताओं को भी दूर किया जा सके और भारत के दीर्घकालीन रणनीतिक हित भी सुरक्षित रहें।
चाबहार छोड़ने के दावे को सरकार ने बताया गलत
चाबहार बंदरगाह को लेकर विवाद तब गहराया, जब कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चाबहार पर भारत का कंट्रोल छोड़ दिया है। कांग्रेस ने दावा किया कि ट्रंप प्रशासन के दबाव में मोदी सरकार ने सरेंडर कर दिया, जिससे भारत को करीब 1100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। हालांकि, विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ कहा कि चाबहार पोर्ट से जुड़ी सभी योजनाएं जारी हैं और भारत इन योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका के साथ लगातार बातचीत कर रहा है।
Chabahaar port: अमेरिकी प्रतिबंध और ‘बीच के रास्ते’ की तलाश
अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं, जिनका असर चाबहार बंदरगाह से जुड़े व्यापार पर भी पड़ता है। भारत ने 2024 में ईरान के साथ 10 साल का समझौता किया था, जिसके तहत चाबहार बंदरगाह का विकास किया जा रहा है। 2018 में अमेरिका ने भारत को चाबहार पर काम करने के लिए विशेष छूट दी थी, लेकिन पिछले साल यह छूट वापस लेने का फैसला किया गया। बाद में अमेरिका ने अप्रैल 2026 तक बिना प्रतिबंध काम करने की अस्थायी मंजूरी दी।
कांग्रेस का दावा है कि अप्रैल के बाद फिर से अमेरिकी प्रतिबंध लागू हो सकते हैं, जबकि विदेश मंत्रालय का कहना है कि इस मुद्दे पर अमेरिका से बातचीत जारी है।
भारत के लिए चाबहार क्यों है इतना अहम?
Chabahaar port: चाबहार बंदरगाह भारत के लिए व्यापार और रणनीति दोनों लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। इससे भारत को ईरान के साथ तेल और अन्य व्यापार में सहूलियत मिलती है। भारत ने चाबहार के विकास में भारी निवेश किया है और इसे एक बड़े ट्रेड हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच देता है, वह भी पाकिस्तान को बाईपास करते हुए। यही नहीं, चाबहार के पास ही पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट है, जहां चीन का बड़ा निवेश है। ऐसे में चाबहार भारत को रणनीतिक मजबूती देता है और चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को संतुलित करने में मदद करता है। इसके अलावा, चाबहार इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का भी अहम हिस्सा है। इस कॉरिडोर के तहत भारत से ईरान होते हुए रूस, मध्य एशिया और यूरोप तक करीब 7200 किलोमीटर लंबा मल्टी-मोड ट्रांसपोर्ट नेटवर्क तैयार किया जाना है। कुल मिलाकर, चाबहार प्रोजेक्ट भारत के लिए सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, बल्कि मध्य एशिया तक पहुंच का रास्ता और स्वतंत्र विदेश नीति का मजबूत प्रतीक है। मौजूदा हालात में यह परियोजना भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और अमेरिका के साथ रिश्तों के बीच संतुलन साधने की एक बड़ी परीक्षा बनकर सामने आई है।
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