Home » एक्सप्लनेर » प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार, फिर पुलिस की परमिशन क्यों जरूरी? हिरासत में आपके क्या अधिकार हैं

प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार, फिर पुलिस की परमिशन क्यों जरूरी? हिरासत में आपके क्या अधिकार हैं

CJP Protest: दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन को लेकर पुलिस की कार्रवाई ने शांतिपूर्ण विरोध, पुलिस की शक्तियों और नागरिकों के अधिकारों पर बहस छेड़ दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने के बाद पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। सीजेपी के तीन प्रमुख नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को भी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने के बाद रिहा करने का आदेश दिया गया। रिपोर्टों के मुताबिक, उनकी रिहाई शांति बनाए रखने की शर्तों से जुड़ी थी।

इस घटनाक्रम में एक बड़ा सवाल सामने आया है: जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है, तो पुलिस की अनुमति क्यों जरूरी है? क्या बिना अनुमति प्रदर्शन करने पर गिरफ्तारी हो सकती है? हिरासत और गिरफ्तारी में क्या अंतर है और पुलिस किसी को अपने साथ ले जाए तो उसके पास कौन-से कानूनी अधिकार होते हैं? आइए, आठ सवालों में समझते हैं पूरा मामला।

 सवाल 1: क्या प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है?

जवाब: हां। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत बिना हथियार शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार दिया गया है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी इन अधिकारों के दायरे में आता है। हालांकि, यह अधिकार असीमित नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 19(3) सार्वजनिक व्यवस्था सहित निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है। यानी नागरिक सरकार के फैसलों का विरोध कर सकते हैं, अपनी मांगें रख सकते हैं और प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन उन्हें लागू कानूनी प्रतिबंधों का पालन भी करना होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और आम लोगों की सुविधा के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया था। अदालत के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए आसपास रहने वाले लोगों और सार्वजनिक व्यवस्था के हितों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

CJP Protest: सवाल 2: जब प्रदर्शन मौलिक अधिकार है, तो पुलिस की अनुमति क्यों जरूरी?

जवाब: मौलिक अधिकार होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी जगह, किसी भी समय और किसी भी संख्या में लोग बिना किसी व्यवस्था के इकट्ठा हो सकते हैं। बड़े प्रदर्शनों में यातायात, सुरक्षा, आपातकालीन सेवाओं और आसपास के लोगों की आवाजाही पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से संबंधित प्रशासन प्रदर्शन के लिए जगह, समय, लोगों की संख्या और सुरक्षा व्यवस्था तय कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के मजदूर किसान शक्ति संगठन मामले में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को मान्यता दी, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिकार और अन्य लोगों के अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी है।  दिल्ली में प्रदर्शन की अनुमति से जुड़े स्थानीय नियमों के तहत आयोजकों को पहले आवेदन करना पड़ सकता है। अनुमति देने या इनकार करने का फैसला संबंधित अधिकारी उपलब्ध जगह, सुरक्षा और यातायात जैसे पहलुओं को देखकर करता है।

सवाल 3: दिल्ली में प्रदर्शन की अनुमति के क्या नियम हैं?

जवाब: दिल्ली पुलिस के स्थानीय नियमों और स्टैंडिंग ऑर्डर के मुताबिक, प्रदर्शन के लिए संबंधित अधिकारी के पास आवेदन करना होता है। उपलब्ध रिपोर्टों में आवेदन आमतौर पर कम से कम 10 दिन पहले देने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। आवेदन पर विचार करते समय इन पहलुओं को देखा जा सकता है:- प्रदर्शन के लिए प्रस्तावित जगह और समय उपलब्ध है या नहीं। कितने लोगों के शामिल होने की संभावना है। यातायात और आम लोगों की आवाजाही पर कितना असर पड़ेगा। सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्या इंतजाम जरूरी हैं। संबंधित पुलिस इकाइयों और यातायात विभाग की क्या राय है।

CJP Protest
                                                                   CJP Protest

दिल्ली में जंतर-मंतर और रामलीला मैदान जैसे स्थानों पर प्रदर्शन की व्यवस्था अलग-अलग क्षमता और शर्तों के आधार पर हो सकती है। किसी स्थान पर लोगों की अधिकतम संख्या या आवेदन की समय-सीमा के बारे में जानकारी प्रकाशित करने से पहले संबंधित स्टैंडिंग ऑर्डर का नवीनतम संस्करण देखना चाहिए।

सीजेपी के मामले में दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस का तर्क था कि आवेदन प्रदर्शन से कुछ ही दिन पहले दिया गया था और कानून-व्यवस्था संबंधी चिंताएं थीं। यह पुलिस का पक्ष है; अनुमति से इनकार के औचित्य का आकलन संबंधित आदेश और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

CJP Protest:  सवाल 4: पुलिस अनुमति न दे तो आयोजकों के पास क्या विकल्प हैं?

जवाब: अनुमति से इनकार होने पर आयोजक दो प्रमुख रास्ते अपना सकते हैं। पहला रास्ता- पुलिस के सामने दोबारा प्रस्ताव रखना। आयोजक इनकार के कारणों को समझकर दूसरी जगह, कम समय, सीमित संख्या में प्रदर्शन या सुरक्षा से जुड़े अतिरिक्त इंतजामों का प्रस्ताव दे सकते हैं। संबंधित अधिकारी उस पर लागू नियमों के अनुसार विचार कर सकता है।

दूसरा रास्ता- अदालत जाना। अगर आयोजकों को लगता है कि अनुमति से इनकार मनमाना है या उनके संवैधानिक अधिकारों का अनुचित उल्लंघन करता है, तो वे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं। उपयुक्त परिस्थितियों में संवैधानिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया जा सकता है।

स्थानीय पुलिस नियमों में किसी अधिकारी के फैसले को अंतिम बताए जाने का अर्थ यह नहीं है कि उस फैसले को न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर कर दिया गया है। हालांकि, अदालत में याचिका दायर करने से अपने आप अनुमति मिल जाना या प्रतिबंध हट जाना तय नहीं होता।

 सवाल 5: धारा 163 क्या है? क्या इसके तहत प्रदर्शन रोका जा सकता है?

जवाब: पहले आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा जारी की जाती थी। अब इसी तरह की व्यवस्था भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163 में है। इस धारा के तहत सक्षम कार्यकारी मजिस्ट्रेट कुछ परिस्थितियों में लिखित आदेश जारी कर सकता है, जब उसे लगे कि तत्काल रोकथाम या शीघ्र कार्रवाई जरूरी है। आदेश में परिस्थितियों के मुताबिक लोगों की आवाजाही, किसी गतिविधि या एक जगह लोगों के एकत्र होने पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

लेकिन धारा 163 का मतलब यह नहीं है कि पूरे शहर में हर तरह का जमावड़ा अपने आप गैरकानूनी हो जाता है। यह देखना जरूरी है कि आदेश किस अधिकारी ने जारी किया, वह किस क्षेत्र पर लागू है, उसकी अवधि क्या है और उसमें कौन-सी गतिविधियां प्रतिबंधित हैं।

CJP Protest
                                                                   CJP Protest

क्या धारा 163 को चुनौती दी जा सकती है?  हां। BNSS की धारा 163(5) के तहत प्रभावित व्यक्ति आदेश जारी करने वाले मजिस्ट्रेट से उसे रद्द करने या बदलने का अनुरोध कर सकता है। इसके अलावा, परिस्थितियों के आधार पर हाईकोर्ट में भी चुनौती दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने मजदूर किसान शक्ति संगठन और दूसरे मामलों में स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंधों का औचित्य और उनका दायरा महत्वपूर्ण है।

CJP Protest: सवाल 6: बिना अनुमति या प्रतिबंध के बावजूद प्रदर्शन करने पर क्या कार्रवाई हो सकती है?

जवाब: यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस समय कौन-सा आदेश लागू है और व्यक्ति ने वास्तव में क्या किया है। अगर कोई व्यक्ति किसी वैध आदेश की जानबूझकर अवहेलना करता है और कानून की संबंधित शर्तें पूरी होती हैं, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत मामला बन सकता है। यह धारा लोक सेवक द्वारा विधिवत जारी आदेश की अवज्ञा से संबंधित है। हालांकि, केवल प्रदर्शन में शामिल होने से हर मामले में यह अपराध अपने आप साबित नहीं हो जाता; संबंधित आदेश, उसकी जानकारी और कथित उल्लंघन के तथ्य महत्वपूर्ण होंगे।

परिस्थितियों के अनुसार पुलिस कानून के तहत लोगों को रोक सकती है, किसी स्थान से हटा सकती है या निवारक कार्रवाई कर सकती है। लेकिन पुलिस की हर कार्रवाई के लिए कानूनी आधार होना जरूरी है। केवल यह कह देना कि प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी, किसी भी तरह की हिरासत या गिरफ्तारी को स्वतः वैध नहीं बना देता। पुलिस प्रदर्शन की रिकॉर्डिंग भी कर सकती है। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई होती है, तो उसे यह जानने का अधिकार है कि उसे किस आधार पर रोका गया है और उसके मामले में कौन-सी कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा रही है।

सवाल 7: हिरासत और गिरफ्तारी में क्या फर्क है?

जवाब: आम बोलचाल में हिरासत और गिरफ्तारी को एक जैसा समझ लिया जाता है, लेकिन कानूनी तौर पर दोनों की स्थिति कार्रवाई के आधार और अपनाई गई प्रक्रिया पर निर्भर करती है।

हिरासत: किसी व्यक्ति को पुलिस या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी के नियंत्रण में रखना व्यापक अर्थ वाला शब्द है। प्रदर्शन के दौरान पुलिस किसी व्यक्ति को कुछ समय के लिए रोक सकती है या किसी जगह से हटा सकती है। लेकिन ऐसी कार्रवाई भी कानून के दायरे में होनी चाहिए। केवल उसे ‘हिरासत’ कह देने से कानूनी सुरक्षा समाप्त नहीं हो जाती। गिरफ्तारी: यह किसी व्यक्ति को कानून के तहत औपचारिक रूप से गिरफ्तार करने की कार्रवाई है। इसके साथ गिरफ्तारी के कारण बताने, परिजनों को सूचना देने और मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने जैसी कानूनी जिम्मेदारियां लागू हो सकती हैं। प्रदर्शन के मामलों में निवारक कार्रवाई के लिए BNSS की अलग-अलग धाराओं का इस्तेमाल किया जा सकता है: धारा 170: अगर पुलिस को संज्ञेय अपराध किए जाने की योजना का पता चलता है और उसे किसी अन्य तरीके से रोकना संभव नहीं है, तो निर्धारित शर्तों के तहत निवारक गिरफ्तारी की जा सकती है।

धारा 172: पुलिस के वैध निर्देशों का पालन करने से जुड़े प्रावधान हैं। परिस्थितियों के अनुसार अवज्ञा करने वाले व्यक्ति को हिरासत में लेने या हटाने की कार्रवाई हो सकती है। इन धाराओं की शर्तें अलग-अलग हैं। इसलिए हर पुलिस कार्रवाई को एक ही नियम के तहत नहीं समझना चाहिए। सीजेपी के तीन नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका के मामले में मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें निवारक कार्रवाई के तहत मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और बाद में रिहाई का आदेश दिया गया।

CJP Protest: सवाल 8: पुलिस हिरासत या गिरफ्तारी में आपके क्या अधिकार हैं?

जवाब: यदि पुलिस आपको रोकती है या गिरफ्तार करती है, तो अपने अधिकारों और लागू प्रक्रिया के बारे में जानकारी रखना जरूरी है। ये पांच बातें विशेष रूप से जाननी चाहिए।

1. गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार

गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार और कारण बताए जाने चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी से जुड़े महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय देता है। कुछ विशेष कानूनी परिस्थितियों में अलग प्रावधान लागू हो सकते हैं।

2. 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेशी

संविधान के अनुच्छेद 22(2) के अनुसार, गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा के लिए जरूरी समय छोड़कर 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है। इसके बाद हिरासत जारी रखने के लिए कानून के मुताबिक मजिस्ट्रेट का प्राधिकार जरूरी होता है। हालांकि, हर प्रकार की रोक या हिरासत पर इस नियम को एक ही तरह लागू नहीं किया जा सकता; कार्रवाई की कानूनी प्रकृति देखनी होगी।

3. वकील की मदद लेने का अधिकार

गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से परामर्श और कानूनी सहायता लेने का अधिकार है। BNSS की धारा 38 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार है, हालांकि वकील को पूरी पूछताछ के दौरान लगातार मौजूद रहने का स्वतः अधिकार नहीं है। पात्र व्यक्ति मुफ्त कानूनी सहायता भी मांग सकता है।

4. महिलाओं की गिरफ्तारी से जुड़े विशेष नियम

BNSS की धारा 43(5) के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में किसी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। अपवादस्वरूप परिस्थितियों में कानून में निर्धारित प्रक्रिया और प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति जरूरी होती है।

5. गिरफ्तारी और हिरासत में प्रक्रिया का पालन

सुप्रीम कोर्ट के डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य फैसले में गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान सुरक्षा से जुड़े दिशानिर्देश दिए गए थे। इनमें पुलिसकर्मियों की स्पष्ट पहचान, गिरफ्तारी का मेमो तैयार करना, परिजन या मित्र को सूचना देना, हिरासत का रिकॉर्ड रखना और चोटों की स्थिति दर्ज करना जैसे उपाय शामिल हैं।

यदि आपको लगता है कि पुलिस ने गैरकानूनी तरीके से रोका है, गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए हैं या कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया है, तो वकील, परिवार या कानूनी सहायता सेवा से संपर्क करें। घटना का समय, स्थान, संबंधित पुलिसकर्मियों की पहचान और उपलब्ध दस्तावेजों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना भी उपयोगी हो सकता है।

ये भी पढ़े… अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को कोर्ट से राहत, दिल्ली में आज फिर प्रदर्शन की तैयारी; अब तक क्या-क्या हुआ?