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IAS-IPS से राजनीति में एंट्री, किसी ने संभाला मंत्रालय तो किसी की पार्टी नहीं चली, जानिए क्यों

Divya Mittal’s party: पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल ने ‘जननीति भारत’ नाम से नई राजनीतिक पार्टी बनाने और 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरने का ऐलान किया है। उनके इस कदम ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि प्रशासनिक सेवा का अनुभव राजनीति में कितनी मदद करता है? देश में कई पूर्व IAS, IPS और IFS अधिकारी राजनीति में आए। कुछ मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री बने, तो कुछ चुनावी राजनीति में अपनी जगह नहीं बना सके। डॉ. जयप्रकाश नारायण और शाह फैसल ने अपनी पार्टियां बनाईं, जबकि अरविंद केजरीवाल ने IRS की नौकरी छोड़कर आम आदमी पार्टी बनाई। दूसरी ओर, किरण बेदी चुनाव हार गईं। आखिर नौकरशाही से सियासत तक का यह सफर किन वजहों से सफल या चुनौतीपूर्ण रहा?

IAS-IPS अधिकारियों का राजनीति की ओर रुख क्यों?

IAS और IPS अधिकारियों को प्रशासन चलाने, सरकारी योजनाओं को लागू करने, कानून-व्यवस्था संभालने और जनता से जुड़े मुद्दों पर काम करने का अनुभव मिलता है। इस वजह से राजनीति में आने पर उनके पास शासन और प्रशासन की समझ पहले से होती है।

लेकिन प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। एक अधिकारी सरकारी नियमों और नीतियों के दायरे में काम करता है, जबकि एक राजनेता को जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता बनानी पड़ती है। चुनाव जीतने के लिए संगठन, स्थानीय मुद्दों की समझ, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क, संसाधन और मतदाताओं से लगातार संवाद भी जरूरी होता है। यही वजह है कि प्रशासनिक अनुभव रखने वाले सभी लोग राजनीति में एक जैसा परिणाम हासिल नहीं कर पाते। कुछ स्थापित राजनीतिक दलों में शामिल होकर आगे बढ़ते हैं, जबकि कुछ अपनी अलग पार्टी बनाकर राजनीतिक विकल्प तैयार करने की कोशिश करते हैं।

Divya Mittal’s party: 1. दिव्या मित्तल ने अपनी पार्टी क्यों बनाई?

पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल ने ‘जननीति भारत’ नाम से राजनीतिक पार्टी बनाने और 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरने की घोषणा की है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उन्होंने नागरिकों की भागीदारी और पारदर्शी जननीति को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बताया है।

दिव्या मित्तल का यह कदम इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने स्थापित राजनीतिक दल में शामिल होने के बजाय अपनी पार्टी बनाने का रास्ता चुना है। इस रास्ते पर सबसे बड़ी चुनौती केवल विचारों को जनता तक पहुंचाना नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करना, उम्मीदवार तैयार करना और मतदाताओं का भरोसा हासिल करना भी है।

उत्तर प्रदेश में पहले से कई स्थापित राजनीतिक दल सक्रिय हैं। ऐसे माहौल में नई पार्टी को अपनी पहचान बनाने के लिए स्थानीय मुद्दों पर स्पष्ट एजेंडा, मजबूत संगठन और लगातार जनसंपर्क की जरूरत होगी। हालांकि, किसी नई पार्टी की सफलता या असफलता का आकलन उसके गठन के समय ही नहीं किया जा सकता। उसका वास्तविक राजनीतिक आधार चुनावों, संगठन के विस्तार और जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता से सामने आएगा।

2. अपनी पार्टी बनाने वाले पूर्व अधिकारियों का क्या रहा अनुभव?

डॉ. जयप्रकाश नारायण: विधायक बने, लेकिन पार्टी का विस्तार सीमित रहा

पूर्व IAS अधिकारी डॉ. जयप्रकाश नारायण ने प्रशासनिक सेवा छोड़ने के बाद राजनीति में प्रवेश किया और 2006 में लोक सत्ता पार्टी का गठन किया। वह 2009 में आंध्र प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए। उनका राजनीतिक सफर बताता है कि किसी नई पार्टी के लिए चुनाव जीतना संभव है, लेकिन एक सीट हासिल करना और व्यापक राजनीतिक संगठन खड़ा करना दो अलग चुनौतियां हैं। लोक सत्ता पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा राजनीतिक विस्तार नहीं कर सकी।

शाह फैसल: पार्टी बनाई, फिर राजनीति से पीछे हटे

2009 के UPSC टॉपर शाह फैसल ने 2019 में IAS पद से इस्तीफा देकर जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट बनाया। हालांकि, उनका राजनीतिक सफर लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ा। बाद में उन्होंने राजनीति से दूरी बनाई और प्रशासनिक सेवा में वापसी की। उनका उदाहरण इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि प्रशासनिक सेवा में पहचान बना लेना अपने आप में राजनीतिक आधार की गारंटी नहीं है। राजनीति में टिके रहने के लिए संगठन, जनता से जुड़ाव और बदलती परिस्थितियों के बीच लगातार काम करना पड़ता है।

Divya Mittal’s party: 3. किन पूर्व अधिकारियों ने राजनीति में बड़े पद हासिल किए?

कई पूर्व अधिकारियों ने अपनी अलग पार्टी बनाने के बजाय पहले से स्थापित राजनीतिक दलों में शामिल होकर चुनावी और संसदीय राजनीति में जगह बनाई। कुछ ने राज्य और केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी संभालीं।

अजीत जोगी: IAS से छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री तक

पूर्व IAS अधिकारी अजीत जोगी ने कांग्रेस के साथ राजनीतिक सफर शुरू किया और छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने। बाद में उन्होंने अपनी अलग पार्टी, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़, बनाई। उनका सफर दिखाता है कि प्रशासनिक अनुभव रखने वाला व्यक्ति चुनावी राजनीति में प्रवेश करके राज्य के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुंच सकता है। हालांकि, मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी अलग पार्टी के जरिए राजनीतिक प्रभाव बनाए रखना अलग चुनौती थी।

अरविंद केजरीवाल: IRS की नौकरी छोड़कर बनाई आम आदमी पार्टी

अरविंद केजरीवाल भारतीय राजस्व सेवा यानी IRS के पूर्व अधिकारी हैं। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से जुड़े अपने अनुभव के बाद आम आदमी पार्टी बनाई और दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। उनका उदाहरण इस चर्चा में इसलिए अहम है क्योंकि उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान एक नए संगठन के जरिए बनाई। उनकी पार्टी ने दिल्ली में चुनावी सफलता हासिल की और राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

इससे यह समझ आता है कि नई पार्टी को राजनीतिक सफलता दिलाने में केवल संस्थापक की पिछली नौकरी नहीं, बल्कि जनसमर्थन, संगठन निर्माण, चुनावी रणनीति और स्थानीय मुद्दों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।

एस. जयशंकर: राजनयिक से विदेश मंत्री तक

एस. जयशंकर पूर्व भारतीय विदेश सेवा यानी IFS अधिकारी हैं। वह भारत के विदेश सचिव रहे और बाद में केंद्र सरकार में विदेश मंत्री बने। उनका उदाहरण यह भी स्पष्ट करता है कि राजनीति में आने वाले सभी अधिकारी IAS या IPS से नहीं होते। भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी भी सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर सकते हैं। इसलिए ऐसे मामलों को केवल IAS-IPS तक सीमित करने के बजाय पूर्व नौकरशाहों की व्यापक श्रेणी में देखना अधिक सटीक है।

अश्विनी वैष्णव: प्रशासन, कॉर्पोरेट क्षेत्र और राजनीति का सफर

अश्विनी वैष्णव पूर्व IAS अधिकारी हैं। प्रशासनिक सेवा के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम किया और फिर राजनीति में आए। वह केंद्र सरकार में रेल और सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।

उनका सफर इस बात का उदाहरण है कि कुछ अधिकारी राजनीति में आने से पहले प्रशासन के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी अनुभव हासिल करते हैं। हालांकि, किसी मंत्री की राजनीतिक सफलता का आकलन केवल पद के आधार पर नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक सफर, चुनावी स्थिति और सार्वजनिक कार्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

आर. के. सिंह: गृह सचिव से केंद्रीय मंत्री तक

पूर्व IAS अधिकारी आर. के. सिंह केंद्रीय गृह सचिव रहे और बाद में भाजपा में शामिल हुए। वह सांसद बने और केंद्र सरकार में मंत्री पद संभाला। उनका उदाहरण बताता है कि प्रशासनिक अनुभव और सरकारी व्यवस्था की समझ राजनीतिक दलों में भूमिका पाने का एक रास्ता हो सकती है। लेकिन चुनाव जीतना और राजनीति में अपनी स्थिति बनाए रखना अंततः मतदाताओं तथा पार्टी के समर्थन पर भी निर्भर करता है।

हरदीप सिंह पुरी: राजनयिक सेवा से केंद्रीय मंत्रिमंडल तक

हरदीप सिंह पुरी पूर्व IFS अधिकारी हैं। उन्होंने राजनयिक के रूप में काम किया और बाद में राजनीति में प्रवेश किया। केंद्र सरकार में उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारियां संभालीं। उनका उदाहरण इस बात को मजबूत करता है कि विदेश सेवा सहित दूसरी प्रशासनिक सेवाओं से आने वाले लोग भी राजनीतिक और सरकारी भूमिकाओं में जगह बना सकते हैं।

सत्यपाल सिंह और बृजलाल: पुलिस सेवा से राजनीति तक

मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त सत्यपाल सिंह ने राजनीति में प्रवेश किया और सांसद बने। उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP बृजलाल भी भाजपा में शामिल हुए और राज्यसभा पहुंचे। इन उदाहरणों से पता चलता है कि पुलिस सेवा के वरिष्ठ पदों पर काम करने वाले अधिकारी भी राजनीतिक दलों के माध्यम से चुनावी और संसदीय राजनीति में अपनी भूमिका बना सकते हैं।

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                                                             Divya Mittal’s party
Divya Mittal’s party: 4. किन अधिकारियों को चुनावी राजनीति में चुनौती मिली?

राजनीति में प्रवेश करने वाले सभी अधिकारियों को चुनावी सफलता नहीं मिली। इसका चर्चित उदाहरण किरण बेदी हैं।

किरण बेदी: मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बनीं, लेकिन चुनाव हार गईं

भारत की पहली महिला IPS अधिकारी किरण बेदी ने 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। वह अपनी सीट हार गईं। बाद में उन्हें पुडुचेरी का उपराज्यपाल नियुक्त किया गया। यहां दो बातें अलग-अलग समझना जरूरी है। चुनाव हारने का अर्थ यह नहीं कि किसी व्यक्ति का पूरा सार्वजनिक जीवन असफल रहा। साथ ही, किसी संवैधानिक पद पर नियुक्ति को चुनावी सफलता के बराबर भी नहीं माना जा सकता। किरण बेदी का उदाहरण खास तौर पर यह दिखाता है कि प्रशासनिक सेवा की पहचान और चुनाव में मतदाताओं का समर्थन अलग-अलग चीजें हैं।

वी. के. पांडियन: प्रशासनिक प्रभाव और चुनावी राजनीति में अंतर

पूर्व IAS अधिकारी वी. के. पांडियन ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के करीबी अधिकारी रहे। बाद में उन्होंने बीजू जनता दल में प्रवेश किया और राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, किसी अधिकारी का सरकार या पार्टी के भीतर प्रभावशाली होना और चुनावी जनसमर्थन हासिल करना एक ही बात नहीं है। पांडियन का राजनीतिक सफर इस अंतर पर चर्चा का अवसर देता है। उनके राजनीतिक प्रभाव का आकलन पद, पार्टी में भूमिका और चुनावी परिणामों को अलग-अलग देखकर किया जाना चाहिए।

5. क्या अपनी पार्टी बनाना ज्यादा जोखिम भरा रास्ता है?

अपनी पार्टी बनाना राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि नए संगठन को शुरुआत से ही कई व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ती हैं। इनमें प्रमुख हैं:

संगठन निर्माण: राज्य, जिला, विधानसभा और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का नेटवर्क तैयार करना। जनता से जुड़ाव: स्थानीय समस्याओं को समझना और मतदाताओं के बीच नियमित उपस्थिति बनाए रखना। चुनावी संसाधन: उम्मीदवारों, प्रचार और संगठनात्मक गतिविधियों के लिए संसाधन जुटाना। विश्वसनीयता: लोगों को यह भरोसा दिलाना कि पार्टी केवल घोषणा नहीं, बल्कि लंबे समय तक काम करने का इरादा रखती है। चुनावी पहचान: स्थापित दलों के बीच अपनी विचारधारा, कार्यक्रम और प्राथमिकताओं को स्पष्ट करना।

डॉ. जयप्रकाश नारायण और शाह फैसल के अनुभवों से नई पार्टी बनाने की चुनौतियों पर चर्चा की जा सकती है। वहीं, अरविंद केजरीवाल का सफर दिखाता है कि नई पार्टी भी चुनावी आधार बना सकती है। लेकिन इन उदाहरणों से यह तय नहीं किया जा सकता कि हर नई पार्टी का परिणाम कैसा होगा।

Divya Mittal’s party: 6. स्थापित पार्टी में शामिल होने से क्या अंतर पड़ता है?

किसी स्थापित राजनीतिक दल में शामिल होने पर नए नेता को पहले से मौजूद संगठन, कार्यकर्ताओं और चुनावी ढांचे का लाभ मिल सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि टिकट या चुनावी जीत की गारंटी मिल जाती है।

पूर्व अधिकारी को पार्टी की विचारधारा, स्थानीय नेतृत्व, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के साथ तालमेल बनाना पड़ता है। प्रशासन में वरिष्ठ पद पर काम करने वाला व्यक्ति सरकारी फैसले लेने की प्रक्रिया से परिचित हो सकता है, लेकिन चुनावी राजनीति में उसे जनता के बीच लगातार संवाद और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। इसके उलट, अपनी पार्टी बनाने वाला व्यक्ति अपने कार्यक्रम और संगठन की दिशा तय करने में अधिक स्वतंत्र हो सकता है, लेकिन उसे संसाधन और जनाधार खुद तैयार करना पड़ता है। इसलिए दोनों रास्तों की चुनौतियां अलग हैं। किसी एक रास्ते को हर परिस्थिति में सफल या असफल नहीं कहा जा सकता।

7. क्या दिव्या मित्तल 2027 में अपनी राजनीतिक पहचान बना पाएंगी?

दिव्या मित्तल की राजनीतिक चुनौती अब संगठन निर्माण और जनता के बीच अपनी पहचान स्थापित करने की होगी। उत्तर प्रदेश में भाजपा, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे स्थापित दलों के अलावा अन्य राजनीतिक दल भी सक्रिय हैं। ऐसे में नई पार्टी को अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट करनी होंगी।

नागरिक भागीदारी और पारदर्शी जननीति का विचार पार्टी की घोषित प्राथमिकता है। लेकिन इन विचारों को मतदाताओं तक पहुंचाना, स्थानीय समस्याओं पर ठोस कार्यक्रम देना और विधानसभा क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं का नेटवर्क तैयार करना अलग-अलग काम हैं।

यह भी देखना होगा कि पार्टी कितने उम्मीदवार उतारती है, उसका संगठन किन क्षेत्रों में सक्रिय होता है और मतदाताओं के बीच उसे कितना समर्थन मिलता है। अभी उसके चुनावी प्रदर्शन के बारे में कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। दिव्या मित्तल के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होगा कि क्या वह अपने प्रशासनिक अनुभव को जनता के बीच एक स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम में बदल पाती हैं। इसका जवाब पार्टी की गतिविधियों और चुनावी नतीजों से ही सामने आएगा।

प्रशासनिक अनुभव शुरुआत है, राजनीतिक सफलता की गारंटी नहीं

पूर्व IAS, IPS, IFS और IRS अधिकारियों के राजनीतिक सफर बताते हैं कि प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आने के कई रास्ते हैं। अजीत जोगी मुख्यमंत्री बने, अरविंद केजरीवाल ने नई पार्टी बनाकर दिल्ली की राजनीति में जगह बनाई और एस. जयशंकर तथा अश्विनी वैष्णव जैसे पूर्व अधिकारी केंद्र सरकार में मंत्री बने। दूसरी ओर, किरण बेदी चुनाव हार गईं, जबकि शाह फैसल का राजनीतिक सफर आगे नहीं बढ़ सका।।

दिव्या मित्तल की ‘जननीति भारत’ के लिए 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अपनी राजनीतिक पहचान और संगठनात्मक क्षमता दिखाने का अवसर होगा। उनकी पार्टी कितना प्रभाव डालती है, यह अभी भविष्य का सवाल है। फिलहाल, उनका कदम एक बार फिर इस बहस को सामने लाता है कि क्या प्रशासन चलाने का अनुभव चुनाव जीतने और राजनीतिक संगठन खड़ा करने के लिए पर्याप्त है, या राजनीति के लिए अलग तरह के कौशल और जनसंपर्क की जरूरत होती है?

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