Donald Trump : मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी टकराव के कारण कच्चे तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। अचानक बढ़ी इस महंगाई ने दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर दिया है। हालात को संभालने के लिए अमेरिका ने अब अस्थायी कदम उठाते हुए रूस से जुड़े कुछ तेल सौदों पर सीमित छूट देने का फैसला किया है। माना जा रहा है कि यह फैसला बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों पर लगाम लगाने के उद्देश्य से लिया गया है।
अमेरिकी वित्त विभाग की ओर से जारी एक विशेष लाइसेंस के तहत उन रूसी तेल खेपों को बेचने और डिलीवर करने की अनुमति दी गई है, जो 12 मार्च से पहले ही जहाजों में लोड होकर समुद्र में ट्रांजिट में थीं।
Donald Trump का फरमान
यह अनुमति अस्थायी है और 11 अप्रैल तक ही लागू रहेगी। अधिकारियों के मुताबिक यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि वैश्विक बाजार में अचानक आई सप्लाई की कमी को कुछ हद तक संतुलित किया जा सके। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इससे बाजार में तत्काल राहत मिल सकती है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के प्रमुख स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल अल्पकालिक राहत के लिए है। उनके अनुसार इससे रूस को बहुत बड़ा आर्थिक लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि यह छूट केवल उन खेपों पर लागू है जो पहले ही समुद्र में हैं। रूस की आय का बड़ा हिस्सा तेल उत्पादन के दौरान लगने वाले टैक्स से आता है, जबकि यह अनुमति केवल ट्रांजिट में मौजूद तेल तक सीमित है। प्रशासन का कहना है कि इसका उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखना है।
2 बड़े कारण
विशेषज्ञों के अनुसार इस फैसले के पीछे दो अहम वजहें हैं। पहली वजह है खाड़ी क्षेत्र का बेहद अहम समुद्री रास्ता Strait of Hormuz, जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति गुजरती है। युद्ध की आशंका के चलते यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है। दूसरी वजह है तेल की लगातार बढ़ती कीमतें। हाल के दिनों में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई थीं और ईरान ने चेतावनी दी है कि हालात बिगड़े तो कीमतें 200 डॉलर तक जा सकती हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद लगी थी पाबंदी
दरअसल फरवरी 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, तब पश्चिमी देशों ने रूस की ऊर्जा आय को सीमित करने के लिए उस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। अमेरिका और यूरोप ने रूसी तेल खरीद पर रोक लगाकर उसकी आर्थिक ताकत को कमजोर करने की कोशिश की थी। लेकिन मौजूदा वैश्विक संकट ने हालात को इतना जटिल बना दिया है कि अब कुछ मामलों में अस्थायी छूट देना जरूरी माना जा रहा है।
भारत जैसे देशों पर भी पड़ सकता है असर
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ता है तो इसका असर भारत समेत कई बड़े तेल आयातक देशों पर पड़ेगा। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है और खाड़ी क्षेत्र उसके लिए बेहद अहम है। अगर आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित रहती है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों के साथ महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया का यह संकट किस दिशा में जाता है।
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