Europe Protests: फ्रांस से शुरू हुए सरकार विरोधी प्रदर्शन अब यूरोप के कई अन्य देशों तक फैल गए हैं। इन प्रदर्शनों में महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और घरों के बढ़ते किराये जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं। इनकी तुलना 2011 में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों में हुए ‘अरब स्प्रिंग’ आंदोलन से की जा रही है। उस दौरान सरकारों के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिसके बाद कई शासकों को अपनी सत्ता छोड़नी पड़ी थी।इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि फ्रांस की राजधानी पेरिस जल्द ही मुस्लिम शहर बन सकती है। उनका कहना है कि फ्रांस में बड़ी संख्या में बाहरी लोग आ रहे हैं और उन्होंने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को पहले ही चेतावनी दी थी। ट्रंप ने फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों को इस्लाम की ओर से एक बड़े देश पर कब्जा करने की कोशिश से भी जोड़ा है।ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यूरोप में भी अरब देशों की तरह सत्ता परिवर्तन की कोशिश हो रही है, या लोग महंगाई और दूसरी आर्थिक समस्याओं से परेशान होकर सड़कों पर उतर रहे हैं? क्या यूरोप में हो रहे प्रदर्शनों के पीछे ट्रंप के दावे के मुताबिक कोई दूसरी वजह है? आइए, पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
Europe Protests: फ्रांस में कैसे शुरू हुए विरोध प्रदर्शन?
गर्मियों की छुट्टियों के बाद सितंबर में फ्रांस के स्कूल दोबारा खुलने लगे। इसी दौरान 21 सितंबर को राजधानी पेरिस के लाइसी सेंट-एक्सुपेरी हाईस्कूल के विद्यार्थियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया। विद्यार्थियों की शिकायत थी कि स्कूल में शिक्षकों की कमी है, कक्षाओं में जरूरत से ज्यादा छात्र हैं और इमारत की हालत भी खराब है।सोशल मीडिया के जरिए यह आंदोलन तेजी से दूसरे इलाकों तक पहुंच गया। इसमें शिक्षक, अभिभावक और ट्रेड यूनियन भी शामिल होने लगे। इसके बाद महंगाई और सरकारी बजट में कटौती जैसे मुद्दों को लेकर भी विरोध शुरू हो गया। करीब 20 दिनों के भीतर प्रदर्शन फ्रांस के 100 से ज्यादा शहरों और कस्बों तक फैल गए।17 अक्टूबर को प्रदर्शन हिंसक हो गए। इस दौरान 5.5 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतर आए। 1,500 से अधिक दुकानों में लूटपाट हुई, कई इमारतों में आग लगा दी गई और 2,400 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया।
Europe Protests: फ्रांस के बाद 8 अन्य देशों में भी विरोध
फ्रांस से शुरू हुआ विरोध यूरोप के कम से कम 8 अन्य देशों तक पहुंच गया। इन देशों में अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों को लेकर सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन किए जा रहे हैं।

स्पेन: बुजुर्ग महिला की मौत के बाद बढ़ा विरोध
स्पेन में 87 साल की एक बुजुर्ग महिला घर का किराया 230% बढ़ जाने के कारण नहीं चुका पाईं, जिसके बाद उन्हें घर से निकाल दिया गया। 7 अक्टूबर को उनकी मौत हो गई। इस घटना के बाद 50 से ज्यादा शहरों में हजारों लोग विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आए।
इटली: ‘नो मेलोनी डे’ के नाम से निकाला मार्च
इटली में महंगाई और दूसरी समस्याओं को लेकर प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की सरकार का विरोध किया जा रहा है। 16 अक्टूबर को विद्यार्थियों ने ‘नो मेलोनी डे’ के नाम से मार्च निकाला। अगले दिन, 17 अक्टूबर को प्रदर्शन हिंसक हो गए। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर फेंके, दुकानों में लूटपाट की और सामान में आग लगा दी।
अल्बानिया: प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग
अल्बानिया में 13 अक्टूबर से भ्रष्टाचार के विरोध में प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। 17 अक्टूबर को प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर और पेट्रोल बम फेंके। इसके अलावा कारों और सड़कों पर रखे कूड़ेदानों में आग लगा दी गई।
बेल्जियम: छात्र और ट्रेड यूनियन सरकार के खिलाफ
बेल्जियम में छात्र और ट्रेड यूनियन एकजुट होकर सरकार की आर्थिक नीतियों और महंगाई का विरोध कर रहे हैं। 17 अक्टूबर को यहां भी प्रदर्शन हिंसक हो गए। इस दौरान 139 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया।

पुर्तगाल: घरों की बढ़ती कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन
पुर्तगाल में घरों की कीमतें बढ़ने के विरोध में 10 अक्टूबर से अलग-अलग जगहों पर प्रदर्शन शुरू हुए। 17 अक्टूबर को राजधानी लिस्बन में हजारों लोगों ने मार्च निकालकर अपनी नाराजगी जाहिर की।इसके अलावा ऑस्ट्रिया में शिक्षा बजट में 1 अरब यूरो की संभावित कटौती, ग्रीस में महंगी शिक्षा और हॉस्टल की कमी तथा जर्मनी में अनिवार्य सैन्य सेवा का नियम दोबारा लागू किए जाने की आशंका के कारण भी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। जर्मनी, ऑस्ट्रिया और आयरलैंड के कुछ इलाकों में भी लोगों के सड़कों पर उतरने की खबरें सामने आई हैं।
Europe Protests: क्या सभी देशों में विरोध की वजह एक जैसी है?
यूरोप के अलग-अलग देशों में हो रहे प्रदर्शनों के पीछे मुख्य रूप से दो तरह के कारण दिखाई देते हैं। पहला, महंगाई, बेरोजगारी और शिक्षा जैसी बुनियादी समस्याएं। दूसरा, सरकार विरोधी राजनीतिक दलों और वामपंथी संगठनों का समर्थन।पेरिस के प्रोफेसर अल्बर्टो एलेमानो के मुताबिक, कई यूरोपीय देशों में महंगाई, बेरोजगारी, रोजमर्रा के खर्च और महंगी शिक्षा जैसे मुद्दे लोगों की नाराजगी की मुख्य वजह हैं। उनके अनुसार, फ्रांस इस आंदोलन का केंद्र बना है और दूसरे देशों में भी इसी तरह का विरोध देखने को मिल रहा है।फ्रांस में महंगाई और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से लोग परेशान हैं। आमदनी के मुकाबले रोजमर्रा का खर्च बढ़ने से परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे यूरोपीय संघ में 30 साल तक की उम्र के 27% युवा ऐसे घरों में रहते हैं, जहां पूरे परिवार के लिए पर्याप्त कमरे नहीं हैं। ग्रीस में यह आंकड़ा 48% तक पहुंच गया है। वहां युवा हॉस्टल की कमी और रहने के बढ़ते खर्च का विरोध कर रहे हैं।
पुर्तगाल में 2015 से 2024 के बीच मकानों की कीमतें दोगुने से भी ज्यादा बढ़ गईं। स्पेन में भी घरों की बढ़ती कीमतें एक बड़ी समस्या हैं। वहीं, इटली में महंगाई दर 4.2% तक पहुंच गई है, जिसे यूरोजोन में सबसे ज्यादा बताया गया है। बेल्जियम में विद्यार्थियों को पढ़ाई की फीस बढ़ने की आशंका है, जबकि जर्मनी और ऑस्ट्रिया में छात्र महंगी कॉलेज फीस देने के बावजूद पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिलने से नाराज हैं।अल्बानिया में भ्रष्टाचार सरकार के खिलाफ विरोध का सबसे बड़ा मुद्दा है। यहां मई में भी तटीय इलाकों को निजी कंपनियों के प्रबंधन में देने के विरोध में प्रदर्शन शुरू हुए थे।
Europe Protests: विरोध प्रदर्शनों को मिल रहा राजनीतिक समर्थन
इन प्रदर्शनों वाले कई देशों में दक्षिणपंथी विचारधारा वाली सरकारें सत्ता में हैं, जबकि विपक्ष में वामपंथी या वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाले दल मौजूद हैं। इनमें से कई दल किसी न किसी रूप में विरोध प्रदर्शनों का समर्थन कर रहे हैं।फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के दो कार्यकाल पूरे होने वाले हैं। उनकी सरकार को सीधे तौर पर वामपंथी या दक्षिणपंथी खेमे में नहीं रखा जाता। हालांकि, सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी ‘ला फ्रांस इंसूमिज’ (एलएफआई) वामपंथी विचारधारा की है और उसने प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन किया है।प्रदर्शनों के दौरान कुछ नकाबपोश लोगों ने आगजनी और हिंसा की। राष्ट्रपति मैक्रों ने आरोप लगाया कि कट्टर वामपंथी उपद्रवियों ने आंदोलन को अपने कब्जे में ले लिया है। प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने भी एलएफआई पर हिंसा फैलाने का आरोप लगाया। हालांकि, पार्टी ने इन आरोपों को खारिज किया है।
इटली में प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को कट्टर दक्षिणपंथी नेता माना जाता है। उन्होंने कुछ विश्वविद्यालयों की कक्षाओं में विदेशी विद्यार्थियों की संख्या 30% तक सीमित कर दी है। उन्होंने स्कूलों में बुर्के पर प्रतिबंध लगाने की बात भी कही थी। यहां विरोध प्रदर्शनों के पीछे ‘अक्टूबर 17 मूवमेंट’ नाम का एक समूह बताया जा रहा है। सरकार का आरोप है कि विपक्षी वामपंथी दल इन प्रदर्शनों के जरिए सरकार के खिलाफ बने माहौल का फायदा उठाना चाहते हैं। वामपंथी दलों ने 20 नवंबर को रोम में एक बड़ी रैली आयोजित करने का ऐलान किया है।

पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनीग्रो को दक्षिणपंथी विचारधारा का नेता माना जाता है, जबकि मुख्य विपक्षी सोशलिस्ट पार्टी वामपंथी विचारों से जुड़ी है। अल्बानिया में प्रधानमंत्री एडी रामा 2013 से सत्ता में हैं। उनके खिलाफ चल रहे आंदोलन को ‘फ्लेमिंगो’ नाम दिया गया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें किसी राजनीतिक पार्टी का समर्थन हासिल नहीं है, जबकि रामा का आरोप है कि आंदोलन वामपंथी विचारधारा से प्रभावित है। ग्रीस, बेल्जियम और जर्मनी में भी विपक्षी दलों में वामपंथी विचारधारा वाली पार्टियां शामिल हैं।
Europe Protests: क्या था अरब स्प्रिंग आंदोलन?
अरब स्प्रिंग 2010-11 के दौरान मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों में शुरू हुए सरकार विरोधी आंदोलनों को कहा जाता है। इन आंदोलनों में लोगों ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और तानाशाही शासन के खिलाफ आवाज उठाई थी। इसके बाद कई देशों में सत्ता परिवर्तन हुआ और कुछ शासकों को अपने पद छोड़ने पड़े।
ट्यूनीशिया से हुई थी आंदोलन की शुरुआत
अरब स्प्रिंग की शुरुआत 17 दिसंबर 2010 को ट्यूनीशिया में हुई थी। यहां मोहम्मद बुआजीजी नाम के एक फल विक्रेता की रेहड़ी पुलिस ने जब्त कर ली थी। इस घटना से परेशान होकर उन्होंने खुद को आग लगा ली। उनकी मौत के बाद महंगाई और सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए। उस समय राष्ट्रपति बेन अली करीब 23 साल से सत्ता में थे। आंदोलन बढ़ने के बाद उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा।
मिस्र में 30 साल के शासन का अंत
जनवरी 2011 में मिस्र की राजधानी काहिरा में राष्ट्रपति होस्नी मुबारक की सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए। लोग भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से परेशान थे। 11 फरवरी 2011 को मुबारक ने इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही उनके करीब 30 साल लंबे शासन का अंत हो गया।
Europe Protests: यमन में राष्ट्रपति को देना पड़ा इस्तीफा
जनवरी 2011 में यमन के राष्ट्रपति अब्दुल्ला अली सालेह के खिलाफ भी प्रदर्शन शुरू हुए। लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण लोग उनके शासन का विरोध कर रहे थे। 27 फरवरी 2012 को सालेह को इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद भी यमन में हालात सामान्य नहीं हो सके। देश में गृहयुद्ध जैसे हालात बने रहे और स्थिर सरकार की समस्या बनी रही।
सीरिया में विरोध प्रदर्शन गृहयुद्ध में बदले
मार्च 2011 में सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ। इसकी एक बड़ी वजह सरकार के खिलाफ नारे लगाने वाले बच्चों की गिरफ्तारी थी। धीरे-धीरे विरोध प्रदर्शन गृहयुद्ध में बदल गए और हजारों लोगों की जान चली गई। दिसंबर 2024 में बशर अल-असद का शासन समाप्त हो गया।
Europe Protests: लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी की हत्या
अक्टूबर 2011 में लीबिया में सैन्य शासक और प्रधानमंत्री मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ। वह करीब 42 साल से सत्ता में थे। 20 अक्टूबर 2011 को विद्रोहियों ने गद्दाफी की सार्वजनिक रूप से हत्या कर दी। गृहयुद्ध में हजारों लोगों की मौत हुई, लेकिन इसके बावजूद लीबिया में स्थिर सरकार स्थापित नहीं हो सकी।अरब स्प्रिंग का असर बहरीन, सूडान, लेबनान, मोरक्को और इराक जैसे देशों में भी देखने को मिला। इसके अलावा अल्जीरिया और इराक जैसे देशों में 2018-19 के दौरान भी बड़े आंदोलन हुए, जिनमें सैकड़ों लोग मारे गए। इन देशों में लंबे समय तक राजनीतिक स्थिरता की समस्या बनी रही।
Europe Protests: क्या यूरोप में भी अरब स्प्रिंग जैसी स्थिति बन सकती है?
कुछ जानकार यूरोप में हो रहे प्रदर्शनों को ‘यूरोप का अरब स्प्रिंग’ बता रहे हैं। अमेरिकी-कुवैती पत्रकार अहमद एल्डिन के मुताबिक, यूरोप में विरोध का फैलना 2011 के अरब स्प्रिंग जैसा दिखाई देता है। उनका कहना है कि अरब देशों में उस समय युवाओं ने ऐसे शासकों का विरोध किया था, जो आर्थिक संकट के बावजूद अमीर होते जा रहे थे। उनके अनुसार, यूरोप के कुछ नेताओं के बयान भी उन शासकों जैसे हैं, जबकि यूरोप के युवा अरब देशों के युवाओं की तरह अपनी मांगें उठा रहे हैं।हालांकि, जानकारों का मानना है कि यूरोपीय देशों में अरब देशों जैसी तख्तापलट की स्थिति या गृहयुद्ध होने की आशंका कम है। यूरोप में सरकार बदलने की संभावना मुख्य रूप से चुनावों के जरिए है। फ्रांस में छह महीने के भीतर राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने हैं।अरब स्प्रिंग के दौरान जिन देशों में बड़े आंदोलन हुए, वहां के अधिकतर शासक सैन्य ताकत के सहारे सत्ता में बने हुए थे। कुछ देशों में लोकतांत्रिक सरकारें केवल नाम के लिए थीं। इसके उलट, यूरोपीय देशों में चुनाव के जरिए सरकार बनाने और सत्ता बदलने की व्यवस्था मौजूद है।अहमद एल्डिन के अनुसार, यूरोपीय सरकारों के पास आंदोलनों को शांत करने के कई तरीके हैं। सरकार का कोई मंत्री इस्तीफा दे सकता है, प्रदर्शनकारियों से बातचीत की जा सकती है या बजट में नई घोषणाएं और वादे शामिल किए जा सकते हैं। इसके बाद जनता चुनाव में उस राजनीतिक दल को चुन सकती है, जो उसे बेहतर व्यवस्था देने का भरोसा दिलाता है।
क्या विरोध प्रदर्शनों के पीछे कोई विदेशी ताकत है?
कुछ रिपोर्टों में यूरोप के प्रदर्शनों के पीछे विदेशी ताकतों की भूमिका होने की आशंका जताई गई है। हालांकि, अब तक ऐसा कोई पुख्ता सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि किसी बाहरी साजिश के कारण ये प्रदर्शन शुरू हुए।फ्रांस में विरोध प्रदर्शन शुरू होने के दौरान 7 अक्टूबर को सरकार ने ईरान पर आरोप लगाए थे। फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने ईरानी राजदूत को बुलाकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। फ्रांस का आरोप था कि ईरान का विदेश मंत्रालय ऑनलाइन अभियान चलाकर प्रदर्शनों को बढ़ावा दे रहा है। फ्रांस ने ऐसे कथित उकसावे को शर्मनाक बताते हुए इसे बंद करने की मांग की थी।
Europe Protests: अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने प्रवासियों को ठहराया जिम्मेदार
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी दावा किया कि बड़ी संख्या में दूसरे देशों से आए प्रवासियों के कारण फ्रांस में दंगे हुए। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों के उदारवादी नेताओं ने दया दिखाने के नाम पर विकासशील देशों के लोगों को फ्रांस में आने दिया।हालांकि, अमेरिका के विपक्षी सांसद रो खन्ना ने इस तरह के दावों को खारिज किया। उनका कहना है कि यूरोपीय देशों में पैसा कुछ ही लोगों के हाथों में केंद्रित है। इसके कारण युवा घर, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।उनके मुताबिक, यूरोप में हो रहे प्रदर्शनों को समझने के लिए युवाओं की इन समस्याओं पर ध्यान देना जरूरी है।








