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फ्रांस-इटली के बाद पुर्तगाल में Gen-Z का प्रदर्शन, जानें क्यों सड़कों पर उतरे लोग

Gen Z Protests:

Gen Z Protests: दुनिया के कई देशों में महंगाई, बेरोजगारी, महंगी शिक्षा और आवास संकट को लेकर लोगों का गुस्सा सड़कों पर दिखाई दे रहा है। फ्रांस, बेल्जियम, पुर्तगाल, इटली, अल्बानिया, अर्जेंटीना और तुर्किये जैसे देशों में अलग-अलग मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। कई जगह इन प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई। आखिर इन आंदोलनों के पीछे क्या वजह है और क्यों युवा अपनी सरकारों की नीतियों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं? आइए जानते हैं।

Gen Z Protests: सरकारों के खिलाफ क्यों बढ़ रहा है गुस्सा-

अलग-अलग देशों में विरोध प्रदर्शनों के मुद्दे भले ही अलग हों, लेकिन लोगों की परेशानियों में कई समानताएं हैं। बढ़ती महंगाई, महंगे मकान, आसमान छूता किराया, कम वेतन और रोजगार के सीमित अवसर युवाओं के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। इसके अलावा, शिक्षा पर सरकारी खर्च में कटौती और सामाजिक सेवाओं में कमी ने भी लोगों की मुश्किलें बढ़ाई हैं। कई देशों में नागरिकों का मानना है कि उनकी आय के मुकाबले जीवनयापन का खर्च तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में सरकारों की आर्थिक नीतियों के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है, जो कई जगह बड़े विरोध प्रदर्शनों के रूप में सामने आया है।

Gen Z Protests: फ्रांस: शिक्षा बजट और महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन-

फ्रांस में शिक्षा बजट में कटौती और स्कूलों की खराब स्थिति को लेकर शिक्षकों और छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किए। इसके साथ ही ईंधन की बढ़ती कीमतों और जीवनयापन के खर्च को लेकर भी लोगों ने नाराजगी जताई। गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज के मुताबिक, देशभर में करीब 5.5 लाख लोग इन प्रदर्शनों में शामिल हुए। इनमें लगभग 1.10 लाख प्रदर्शनकारी राजधानी पेरिस में थे। शिक्षा व्यवस्था और महंगाई से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ सरकार की नीतियों तथा राजनीतिक हालात को लेकर असंतोष ने भी प्रदर्शनों को व्यापक बनाने में भूमिका निभाई।

बेल्जियम: महंगी पढ़ाई और सरकारी खर्च में कटौती-

बेल्जियम में सार्वजनिक खर्च में कटौती और विश्वविद्यालयों की रजिस्ट्रेशन फीस बढ़ाने के विरोध में छात्रों ने प्रदर्शन किए। धीरे-धीरे इन विरोध प्रदर्शनों का दायरा बढ़ा और महंगाई तथा आर्थिक परेशानियां भी आंदोलन का हिस्सा बन गईं। ब्रुसेल्स और लीज जैसे शहरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। हालात को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया। छात्रों की नाराजगी के पीछे शिक्षा का बढ़ता खर्च और आर्थिक दबाव प्रमुख मुद्दे रहे।

पुर्तगाल: कम वेतन और आवास संकट से परेशान युवा-

पुर्तगाल में कम वेतन और घरों की बढ़ती कीमतें लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह बनी हुई हैं। राजधानी लिस्बन में हजारों लोगों ने मार्च निकालकर बेहतर आर्थिक परिस्थितियों की मांग की। रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 के बाद से लिस्बन समेत कई शहरों में मकानों की कीमतें और किराया दोगुने से अधिक हो चुके हैं। इसका सबसे ज्यादा असर युवाओं और कम आय वाले परिवारों पर पड़ा है। उनके लिए घर खरीदना तो दूर, कई शहरों में किराए पर रहना भी मुश्किल होता जा रहा है। बढ़ते आवास संकट और कम वेतन के कारण युवाओं में भविष्य को लेकर चिंता बढ़ रही है। यही वजह है कि बेहतर जीवनस्तर और आर्थिक राहत की मांग को लेकर लोग सड़कों पर उतर रहे हैं।

इटली: महंगाई और स्थिर वेतन से बढ़ी परेशानी-

इटली के मिलान में महंगाई, स्थिर वेतन और रोजमर्रा की जरूरतों पर बढ़ते खर्च को लेकर लोगों ने प्रदर्शन किए। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच झड़पें भी हुईं। लोगों की नाराजगी का प्रमुख कारण यह है कि जीवनयापन का खर्च बढ़ने के बावजूद उनकी आय में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हो रही। इससे आम परिवारों का बजट बिगड़ रहा है और युवाओं के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चुनौती बनता जा रहा है।

अल्बानिया: शिक्षा व्यवस्था और रोजगार के अवसरों पर सवाल-

अल्बानिया में छात्र विश्वविद्यालयों की स्थिति, महंगी शिक्षा, आर्थिक सहायता की कमी और पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार के सीमित अवसरों से नाराज हैं। 13 अक्टूबर को राजधानी तिराना में शिक्षा मंत्रालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान तनाव बढ़ गया। प्रदर्शनकारियों ने इमारत पर ईंट-पत्थर फेंके, जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज किया। यह विरोध केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और बेहतर भविष्य की चिंता भी युवाओं के असंतोष की बड़ी वजह बन रही है।

अमेरिका: ट्रंप की नीतियों के खिलाफ ‘नो किंग्स’ रैलियां-

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का विरोध करने वाले ‘नो किंग्स’ नेटवर्क ने विभिन्न शहरों में रैलियां आयोजित कीं। इन कार्यक्रमों के जरिए लोगों ने सरकार की नीतियों के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर की। इन रैलियों के माध्यम से मतदाताओं को मध्यावधि चुनाव में समय से पहले मतदान करने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया। अमेरिका में ये प्रदर्शन दिखाते हैं कि सरकारी नीतियां और राजनीतिक फैसले भी बड़े जन आंदोलनों की वजह बन सकते हैं।

अर्जेंटीना: विश्वविद्यालयों के बजट में कटौती का विरोध-

अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में राष्ट्रपति जेवियर माइली की सरकार की ओर से विश्वविद्यालयों के बजट में कटौती के खिलाफ छात्रों, कर्मचारियों और विपक्षी कार्यकर्ताओं ने संसद के बाहर प्रदर्शन किया। रिपोर्ट के मुताबिक, माइली के सत्ता में आने के बाद शिक्षा बजट के मुद्दे पर यह पांचवां बड़ा विरोध बताया गया। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि शिक्षा व्यवस्था के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध कराया जाए, ताकि विश्वविद्यालयों और छात्रों को आर्थिक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

तुर्किये: महंगाई और कम पेंशन के खिलाफ प्रदर्शन-

तुर्किये की राजधानी अंकारा में बुजुर्गों और मजदूर संगठनों ने महंगाई तथा कम पेंशन के खिलाफ संवैधानिक न्यायालय के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में शामिल लोगों ने बढ़ते खर्च और सीमित आय के कारण पैदा हुई आर्थिक परेशानियों को सामने रखा। इसी दौरान 60 वर्षीय सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी अली सेकेरोग्लू ने अपनी आर्थिक परेशानियों और बेरोजगार बेटों की स्थिति का जिक्र करते हुए कथित तौर पर अपनी सर्विस पिस्तौल से खुद को गोली मार ली। यह घटना आर्थिक दबाव और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों की गंभीरता को उजागर करती है।

क्या है इन आंदोलनों के पीछे की सबसे बड़ी वजह-

अलग-अलग देशों में हुए ये प्रदर्शन बताते हैं कि महंगाई, आय और खर्च के बीच बढ़ता अंतर, महंगी शिक्षा, आवास संकट और रोजगार की कमी लोगों की नाराजगी बढ़ा रहे हैं। युवाओं के लिए नौकरी पाना, घर खरीदना और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। वहीं, शिक्षा और सामाजिक सेवाओं पर सरकारी खर्च में कटौती से भी लोगों की चिंताएं बढ़ रही हैं।

जब नागरिकों को लगता है कि उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है और सरकार उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही है, तो असंतोष बड़े आंदोलनों का रूप ले सकता है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि हर देश में विरोध प्रदर्शनों के स्थानीय, आर्थिक और राजनीतिक कारण अलग-अलग हैं। सभी आंदोलनों को केवल Gen-Z का आंदोलन कहना भी सही नहीं होगा, क्योंकि इनमें छात्रों, कर्मचारियों, मजदूरों और अन्य आयु वर्ग के लोगों की भागीदारी भी रही है।

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