High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया है। यह इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब उनके खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया और न्यायिक स्तर पर आंतरिक जांच की कार्रवाई चल रही थी। इस घटनाक्रम को न्यायिक और राजनीतिक दोनों ही स्तरों पर बेहद अहम माना जा रहा है।
घटना के समय दिल्ली में मौजूद नहीं
सूत्रों के अनुसार, यह पूरा विवाद पिछले वर्ष उस समय शुरू हुआ जब दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर आग लगने की घटना के बाद कथित रूप से भारी मात्रा में अधजली नकदी मिलने की बात सामने आई थी। उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में पदस्थ थे। आरोप यह था कि आग लगने के बाद आवास परिसर में स्थित एक स्टोररूम से बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद हुई। हालांकि, इस पूरे मामले पर जस्टिस वर्मा ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि घटना के समय वे दिल्ली में मौजूद नहीं थे। उनका यह भी कहना था कि यदि परिसर की सुरक्षा और रखरखाव में किसी प्रकार की चूक हुई है, तो उसके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
घटना के बाद न्यायिक स्तर पर प्रक्रिया तेज हुई। 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट करने की सिफारिश की थी। इसके बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश की ओर से मामले की आंतरिक जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया। इस समिति ने आरोपों की जांच कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे आगे की संवैधानिक प्रक्रिया के लिए भेजा गया।
High Court: संसद तक पहुंचा मामला
इसी बीच मामला संसद तक भी पहुंचा। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने 146 सांसदों के हस्ताक्षरों के आधार पर महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार किया और ‘जजेस (जांच) अधिनियम, 1968’ के तहत तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की। यह समिति आरोपों की विस्तृत जांच कर रही थी। जानकारी के अनुसार, आंतरिक जांच रिपोर्ट के बाद मामला आगे बढ़ते हुए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचा था। इसके बाद जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में इस आंतरिक जांच की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया था। लगातार चल रही इन जांचों और महाभियोग प्रक्रिया के बीच अब उनके इस्तीफे ने पूरे मामले में नया मोड़ ला दिया है। न्यायिक और राजनीतिक हलकों में इस फैसले को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
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