MP OBC Reservation: मध्य प्रदेश में साल 2003 से अब तक ज्यादातर समय भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार रही है। साल 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद कमलनाथ के नेतृत्व में 15 साल बाद कांग्रेस की सरकार बनी थी, लेकिन यह सरकार सिर्फ 16 महीने ही चल सकी। इस छोटे से कार्यकाल में कमलनाथ सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का फैसला लिया था। सरकार बदलने के बाद भी यह फैसला बीजेपी के लिए चुनौती बना हुआ है।
MP OBC Reservation: आरक्षण बढ़ाने का फैसला बना राजनीतिक चुनौती
आरक्षण का मुद्दा देश की राजनीति में हमेशा संवेदनशील रहा है। मार्च 2020 में कमलनाथ सरकार गिरने के बाद शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बीजेपी ने दोबारा सरकार बनाई। हालांकि, बीजेपी सरकार ने ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के फैसले को वापस नहीं लिया। इस बीच मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुंच गया। अदालत ने आरक्षण बढ़ाने के फैसले को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया।ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के फैसले से राज्य में कुल आरक्षण 73 प्रतिशत तक पहुंच गया था। हाई कोर्ट ने इसे सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय 50 प्रतिशत की सामान्य सीमा के खिलाफ माना। पिछले सप्ताह अदालत ने तीसरी बार इस आरक्षण को रद्द कर दिया। अब मध्य प्रदेश सरकार इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है।
सामान्य वर्ग की नाराजगी भी बीजेपी के लिए चिंता
मुख्यमंत्री मोहन यादव भले ही हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हों, लेकिन यह मुद्दा बीजेपी के लिए मुश्किल बन गया है। यूजीसी के निर्देशों, आरक्षण में लगातार हो रही बढ़ोतरी और एससी-एसटी एक्ट में केंद्र सरकार के विवादित संशोधनों को लेकर सामान्य वर्ग के कुछ लोग बीजेपी से नाराज हैं। सामान्य वर्ग के कई कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर पार्टी के फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं।इन कार्यकर्ताओं का कहना है कि मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए कुल 36 प्रतिशत आरक्षण है, जबकि केंद्र सरकार की नौकरियों में इन दोनों वर्गों को मिलाकर 22.5 प्रतिशत आरक्षण मिलता है।
उनका आरोप है कि कमलनाथ सरकार ने एससी-एसटी आरक्षण में बदलाव करने का जोखिम नहीं लिया और सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध अनारक्षित सीटों की संख्या कम करके ओबीसी आरक्षण बढ़ा दिया। उनका सुझाव है कि यदि राज्य सरकार ओबीसी आरक्षण बढ़ाना चाहती है, तो उसे एससी-एसटी आरक्षण की व्यवस्था भी केंद्र के बराबर करनी चाहिए, ताकि सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध सीटों पर असर न पड़े।
MP OBC Reservation: ओबीसी कोटे पर अदालत में क्या दलील दी गई?
सामान्य वर्ग के कुछ कार्यकर्ताओं ने अदालत में यह दलील भी दी कि मध्य प्रदेश सरकार की नौकरियों में पहले से ही लगभग 28.5 प्रतिशत कर्मचारी ओबीसी वर्ग से आते हैं। ऐसे में इस वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए अलग से कोटा तय करना असंवैधानिक है।हाई कोर्ट ने भी अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत तक बढ़ाने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति मौजूद थी।

कमलनाथ सरकार ने 2019 में बढ़ाया था आरक्षण
ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का फैसला कमलनाथ सरकार के कार्यकाल में लिया गया था। 8 मार्च 2019 को कांग्रेस सरकार ने अध्यादेश संख्या 2, 2019 के जरिए राज्य में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया था।इसके बाद जुलाई 2019 में मध्य प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) संशोधन विधेयक, 2019 को विधानसभा से पारित कराया गया।कमलनाथ दिसंबर 2018 में मुख्यमंत्री बने थे। साल 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायकों की बगावत के बाद उनकी सरकार अल्पमत में आ गई। मार्च 2020 में शिवराज सिंह चौहान ने दोबारा मुख्यमंत्री पद संभाल लिया।बीजेपी की सरकार बनने के बाद भी ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का फैसला वापस नहीं लिया गया। हालांकि, इस फैसले के खिलाफ कुछ याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का रुख किया। इसके बाद आरक्षण को लेकर कानूनी विवाद शुरू हो गया।
MP OBC Reservation: हाई कोर्ट ने तीसरी बार रद्द किया 27 प्रतिशत आरक्षण
9 अक्टूबर 2026 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने वाले कानून को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया।अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के 1992 के इंदिरा साहनी मामले का हवाला दिया, जिसमें सामान्य परिस्थितियों में कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय की गई थी। इस मामले में हाई कोर्ट ने पहले अंतरिम रोक लगाई थी। अक्टूबर 2026 के फैसले में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े संशोधन को रद्द करते हुए ओबीसी आरक्षण को फिर से 14 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया।
ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत होने पर मध्य प्रदेश में एससी के लिए 16 प्रतिशत, एसटी के लिए 20 प्रतिशत और ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण मिलाकर कुल आरक्षण 63 प्रतिशत हो जाता है। इसके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण जोड़ने पर यह आंकड़ा 73 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। हाई कोर्ट ने इसे 50 प्रतिशत की सामान्य सीमा और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत माना।
भर्ती प्रक्रिया में अपनाया गया 87-13 फॉर्मूला
ओबीसी आरक्षण पर कानूनी विवाद का असर सरकारी भर्तियों पर भी पड़ा। आमतौर पर जब किसी राज्य में आरक्षण को लेकर अदालत की रोक लगती है, तो भर्ती प्रक्रिया रोक दी जाती है या पुराने आरक्षण नियमों के आधार पर परिणाम जारी किए जाते हैं।लेकिन मध्य प्रदेश में इस स्थिति से निपटने के लिए अलग व्यवस्था अपनाई गई। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) और अन्य भर्ती बोर्डों ने 87-13 फॉर्मूला लागू किया।इस व्यवस्था के तहत 87 प्रतिशत पदों के परिणाम घोषित किए गए, जबकि विवाद से जुड़े बाकी 13 प्रतिशत पदों को फिलहाल रोककर सुरक्षित रखा गया। इस तरह भर्ती के एक हिस्से को आगे बढ़ाया गया और विवादित पदों का फैसला कानूनी प्रक्रिया के लिए छोड़ दिया गया। देश के दूसरे राज्यों में इस तरह की व्यवस्था कम देखने को मिलती है।
MP OBC Reservation: मध्य प्रदेश में एसटी आरक्षण भी ज्यादा
मध्य प्रदेश उन राज्यों में शामिल है, जहां अनुसूचित जनजाति की आबादी काफी अधिक है। राज्य में एसटी आबादी 21 प्रतिशत से ज्यादा बताई जाती है। इसी वजह से यहां एसटी वर्ग को 20 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है, जो कई बड़े राज्यों की तुलना में अधिक है। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश में एसटी वर्ग के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण है।दूसरी ओर, कुछ राज्यों में अनुसूचित जाति या अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी ज्यादा है। उदाहरण के लिए, पंजाब में एससी आबादी लगभग 32 प्रतिशत बताई जाती है।साल 2017-18 के दौरान कांग्रेस ओबीसी राजनीति पर ज्यादा जोर दे रही थी। इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में कमलनाथ सरकार ने एसटी आरक्षण में बदलाव करने के बजाय ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का फैसला लिया। इसके बाद इस मुद्दे पर हाई कोर्ट में मामला चलता रहा और मार्च 2020 में कांग्रेस सरकार गिर गई।
बीजेपी के सामने दोहरी चुनौती
ओबीसी आरक्षण को लेकर कमलनाथ सरकार के फैसले ने बीजेपी के सामने मुश्किल स्थिति पैदा कर दी है। यदि बीजेपी 50 प्रतिशत की सामान्य आरक्षण सीमा के भीतर रहने के लिए एसटी आरक्षण में कटौती करती है, तो उसे आदिवासी समुदाय की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। इससे उसके इस वर्ग के वोट बैंक पर भी असर पड़ने की आशंका है।वहीं, यदि सरकार अदालत के फैसले के अनुसार ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत पर ही बनाए रखती है, तो कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल उस पर ओबीसी विरोधी होने का आरोप लगा सकते हैं।
इस मुद्दे पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच सहमति के संकेत भी दिखाई दिए हैं। सर्वदलीय बैठक के बाद नेता प्रतिपक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के साथ मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि ओबीसी आरक्षण का कानून बरकरार रहना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले छह साल से जिन लोगों ने इस प्रक्रिया को रोका है, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
जीतू पटवारी ने अधिकारियों और वकीलों पर मामले को लेकर सरकार को गुमराह करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस मामले में सरकार ने वकीलों पर 100 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जो जनता का पैसा है। उनके मुताबिक, आरक्षण लागू कराने के लिए राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर प्रयास किए जाने चाहिए और मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
MP OBC Reservation: सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की तैयारी
हाई कोर्ट के फैसले के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मंगलवार को दिल्ली में भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह से मुलाकात की। बैठक में ओबीसी आरक्षण से जुड़े कानूनी पहलुओं और आगे की कार्रवाई पर चर्चा हुई।मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर इस मुलाकात की जानकारी देते हुए लिखा, “नई दिल्ली में भारत के सॉलिसिटर जनरल श्री तुषार मेहता जी एवं प्रदेश के महाधिवक्ता श्री प्रशांत सिंह जी के साथ ओबीसी आरक्षण को लेकर माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय से जुड़े विधिक पहलुओं और आगामी कानूनी कार्यवाही की रणनीति पर विस्तृत चर्चा की।”
मुख्यमंत्री की इस पोस्ट और सर्वदलीय बैठक के बाद यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि राज्य सरकार हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट में मोहन यादव सरकार की दलीलों को स्वीकार किया जाएगा या हाई कोर्ट की तरह वहां भी सरकार को झटका लगेगा। इस मामले का अगला फैसला मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण और सरकारी भर्तियों की स्थिति के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।








