Parbati Ghosh: ओडिया सिनेमा के इतिहास में जब भी महिला सशक्तिकरण और रचनात्मक साहस की बात होगी, तो पार्वती घोष का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा। एक बाल कलाकार से लेकर ओडिशा की पहली महिला फिल्म निर्माता बनने तक का उनका सफर संघर्ष, समर्पण और अदम्य साहस की मिसाल है।
5 रुपये का पहला पुरस्कार और अभिनय का जुनून
28 मार्च 1942 को ओडिशा के कटक जिले में जन्मी पार्वती घोष बचपन से ही सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय थीं। स्कूल में एक कविता पाठ के लिए उन्हें 5 रुपये का पुरस्कार मिला यही उनकी प्रतिभा का पहला सार्वजनिक सम्मान था। शिक्षकों के प्रोत्साहन और माता-पिता के समर्थन ने उनके भीतर छिपे कलाकार को मजबूत आधार दिया। बहुत कम उम्र में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो और विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू कर दिया। 1949 में फिल्म ‘श्री जगन्नाथ’ में उन्हें बाल कलाकार के रूप में पहला ऑन-स्क्रीन अवसर मिला।
Parbati Ghosh: लीड रोल और पहचान
1953 में उन्हें ‘अमारी गान झुआ’ में मुख्य भूमिका मिली। इसके बाद 1956 की फिल्म ‘भाई भाई’ ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। 1959 की फिल्म ‘मां’ उनके जीवन का अहम मोड़ साबित हुई। इसी वर्ष उन्होंने गौर घोष से विवाह किया और पार्वती घोष के रूप में नई पहचान बनाई। बंगाली भाषा सीखकर उन्होंने साहित्य और सिनेमा की समझ को और समृद्ध किया। यह बौद्धिक तैयारी आगे चलकर उनके फिल्म निर्माण में दिखाई दी।
Parbati Ghosh: ओडिया सिनेमा की पहली महिला निर्माता
पति गौर घोष के साथ उन्होंने कई सफल फिल्में बनाईं। फिल्म ‘संसार’ के बाद उन्होंने फकीर मोहन सेनापति के प्रसिद्ध उपन्यास ‘छा माना अथा गुंथा’ को सिनेमा में रूपांतरित करने का निर्णय लिया। यह कहानी ग्रामीण शोषण पर आधारित थी। 1986 में उन्होंने इस प्रोजेक्ट को खुद प्रोड्यूस और डायरेक्ट किया। यह कदम उस दौर में बेहद साहसिक था, जब फिल्म निर्माण में महिलाओं की भागीदारी सीमित थी। फिल्म को आलोचकों और दर्शकों से सराहना मिली।
समाज सेवा और सम्मान
फिल्मों से दूरी बनाने के बाद भी वह सामाजिक और स्वैच्छिक कार्यों में सक्रिय रहीं। उनके योगदान के लिए उन्हें कई लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 12 फरवरी 2018 को उन्होंने अंतिम सांस ली, लेकिन ओडिया फिल्म उद्योग में उनकी विरासत आज भी जीवित है।
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