Protest: फ्रांस के हालात बहुत बिगड़ चुके हैं।हिंसक प्रदर्शनों के चलते देश के कई इलाकों में कर्फ्यू लगाना पड़ा है।देश भयंकर राजनीतिक और आर्थिक संकट का सामना कर रहा है।वित्तीय संकट की स्थिति यह है कि देश ने कर्ज चुकाने की क्षमता से कहीं अधिक खर्च कर दिया है।हाल के महीनों में ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के कारण बॉन्ड दरों में भारी उछाल आया है, जिससे कर्ज चुकाने का दबाव उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ गया है।जानकारों के अनुसार टैक्स बढ़ाना और सरकारी खर्च में कटौती करना इसके संभावित समाधान हो सकते हैं, लेकिन ये ऐसे राजनीतिक फैसले होंगे जो जनता के आक्रोश को और भड़का सकते हैं।सरकार के भीतर गहरी फूट के कारण बजट को लेकर चल रही इस अनिश्चित लड़ाई में किसी भी व्यावहारिक समाधान को लागू करना बेहद मुश्किल काम है।यूरोप के कई देश फ्रांस जैसी ही चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अमेरिका में भी फ्रांस जैसे हालात पैदा होने जा रहे हैं?
कर्ज और वित्तीय संकट का दबाव
हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि नीतियों और हिंसक प्रदर्शसीमाओं पर सख्ती नहीं बरती गई, तो अमेरिका में भी फ्रांस जैसे हिंसक प्रदर्शन और हालात पैदा हो सकते हैं। ट्रंप और उनके समर्थकों का मानना है कि अनियंत्रित अप्रवासन (Immigration) और सांस्कृतिक तनाव से फ्रांस जैसी अशांति अमेरिका में भी आ सकती है।जानकारों के मुताबिक अमेरिका पर कर्ज और वित्तीय संकट का दबाव फ्रांस जैसा ही है।अमेरिका का कुल सार्वजनिक ऋण 40 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया है, जो देश की कुल जीडीपी से भी ज्यादा है। टैक्स से मिलने वाले हर सात डॉलर में से एक डॉलर का इस्तेमाल सिर्फ उस रकम पर ब्याज चुकाने के लिए किया जा रहा है, जो अमेरिका ने उधार ली है।महंगाई, बढ़ती जीवन लागत और आर्थिक नीतियों के कारण अमेरिका में भी फ्रांस जैसा रोष सुलग सकता है।अमेरिका में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन के बीच वैचारिक और राजनीतिक टकराव बेहद गहरा है, जो विरोध प्रदर्शनों या सामाजिक असंतोष का रूप ले सकता है।
Protest: कैसे संभल सकेगा अमेरिका?
हालांकि अमेरिका में भी फ्रांस जैसी स्थितियां पैदा होने की आशंकाएं अवश्य व्यक्त की जा रही हैं, लेकिन इसमें देखना यह भी है कि अमेरिका की संघीय व्यवस्था, स्थानीय पुलिस बलों की संरचना और सुरक्षा तंत्र फ्रांस से काफी अलग हैं, जिससे वहां की तरह सीधे तौर पर राष्ट्रव्यापी अराजकता फैलना आसान नहीं है।अमेरिका का सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट यह है कि वह दुनिया की ‘रिज़र्व करेंसी’ (आरक्षित मुद्रा) छापता है। दुनिया भर के ज्यादातर लेन-देन अमेरिकी डॉलर में होते हैं, जिनमें तेल और सोने जैसी अहम चीजें भी शामिल हैं। डॉलर की मांग मजबूत बनी रहने का एक बड़ा कारण यह है कि इसे सुरक्षित माना जाता है। अमेरिका में पारदर्शिता और कानून के शासन के प्रति प्रतिबद्धता, डॉलर को वैश्विक वित्तीय प्रणाली की नींव बनाती है।इससे अमेरिकी ट्रेजरी (सरकारी बॉन्ड) की मांग भी बढ़ती है, जिन्हें सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है। वैश्विक स्तर पर सरकारी बॉन्ड की भारी बिकवाली के बावजूद, अन्य पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अमेरिकी बॉन्ड की दरें कम बनी हुई हैं। अमेरिका की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी और विविध है, जो कई छोटी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में झटकों को कहीं बेहतर तरीके से झेल सकती है। ऐसे में कई जानकार मानते हैं कि अमेरिका में फ्रांस जैसे हालात पैदा होने की आशंकाएं कम ही हैं।








