Smell: अब तक बौद्धिक संपदा के भीतर दृश्य या शब्द को रजिर्स्ट्ड किया जाता रहा है, लेकिन अब गंध भी भारत में पहली बार शामिल की गई है। यानि कि कोई दूसरा आपके द्वारा किए गये कार्य को अपनी संपत्ति नहीं कह सकता। वह अधिकार उसका ही होता है, जो अपने काम को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय ट्रेडमार्क रजिस्ट्री का सहारा लेता है, यह वह संस्था है, जो आपके किये गये कामों को जीवनभर आपका ही होने का सबूत बताती है। और आपके द्वारा खोजे और प्रयोग किए गये कार्य को व्यापार में आपका ही मानने का सफल सबूत देता है। इसी प्रसंग में गंध या सुगंध का कोई इजाद करेगा या कर रहा है, तो उसके लिए सुरक्षित रखने में बौद्विक संपदा का पंजीकरण करना जरूरी है। तभी वह गंध आपकी संपत्ति होगी, जिसको आप बना रहे हैं। आपका व्यवसाय भी गंध का उत्पादन करने और बेचने पर आपको आर्थिक मदद करेगा। ऐसे में आधुनिक तकनीकी में एक और नये व्यवसाय का चैप्टर खुल गया है।
विश्व के कई देशों- जैसे आस्ट्ेलिया, यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका में गंध के ट्रेडमार्क चिन्हों को पंजीकरण के लिए स्वीकार योग्य माना जाता है। इस तरह से विशिष्ठ गंध को अप्राकृतिक ढ़ंग से बनाया भी जा रहा है, उसका कापी राइट भी संरक्षित हो रहा है। भारत में वनस्पतियां जिनसे दवाइयां बनाई जाती रही हैं। पूरा आर्युवेद भारत के पास रहा है। यहां के वैद्यों ने उस तकनीकी को नहीं अपनाया, जिसमें उन खोजी हुई दवाओं का पेटेंट कर पाते। क्योंकि जानकारी के अभाव और व्यापारिक बुद्धि का प्रयोग करने में वे पिछड़े रहे। आज आर्युवेद बहुत बड़ा विज्ञान है, जिसके द्वारा उपचार करने से बहुत सारी बीमारियों का इलाज हो रहा है। बहुत सारी जड़ी-बूटियों के गंध मात्र की पहचान से वैद्य कभी असाष्य से असाष्य रोग का उपचार कर लेते थे।
भविष्य में शायद विशिष्ठ गंध को पंजीकृत करने से बहुत-सारी वनस्पतियों का व्यापार बढ़े। पर इसमें एक शर्त होनी चाहिए, जंगल से वनस्पतियों का सफाया न किया जाए; उसकी जगह उन औषधीय गुण वाली वनस्पतियों की खेती की जाए, ताकि इस पृथ्वी से वह मिट न पाये। आज भारत की बहुत सारी वन संपदा विलुप्त हो चुकी हैं, और बहुत सारी विलुप्त होने के कगार पर हैं। इसलिए साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी इससे जुड़ा हुआ है। गंध विज्ञान भी बहुत बड़ा विज्ञान है। विश्व व्यापार भी इससे प्रभावित है। नये- नये ब्रांड बाजार में उतारे जा रहे हैं।
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