Supreme Court stray dogs: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आवारा कुत्तों के हमलों के मामलों पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी हमले में चोट या मौत होती है, तो नगर निकायों के साथ-साथ डॉग फीडर्स की जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि पिछली सुनवाई की टिप्पणियों को मजाक में लेना गलत होगा, अदालत इस मुद्दे को लेकर पूरी तरह गंभीर है।
‘स्थानीय प्रशासन की विफलता सामने आई’
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में स्थानीय प्रशासन की विफलता साफ नजर आती है और कोर्ट जिम्मेदारी तय करने से पीछे नहीं हटेगा। बेंच ने संकेत दिए कि अब इस मामले में ठोस दिशा-निर्देश तय किए जा सकते हैं।
Supreme Court stray dogs: 28 जनवरी को अगली सुनवाई
कोर्ट ने कहा कि निजी पक्षों और एनजीओ की दलीलें पूरी हो चुकी हैं। अब 28 जनवरी को दोपहर 2 बजे अगली सुनवाई होगी, जिसमें एमिकस क्यूरी, एनएचआरसी के वकील और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की दलीलें सुनी जाएंगी। एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने बताया कि अभी सात राज्यों की जानकारी आना बाकी है।
Supreme Court stray dogs: रोकथाम, करुणा और जिम्मेदारी पर जोर
सुनवाई के दौरान एडवोकेट के. मोहम्मद असद ने कहा कि इलाज से बेहतर रोकथाम है और लोगों को बचपन से ऐसी स्थितियों से निपटने की शिक्षा दी जानी चाहिए। एडवोकेट चारु माथुर ने कहा कि हर डॉग बाइट मामले में राज्य की जिम्मेदारी निभाने में चूक साफ दिखती है, खासकर जब पीड़ित बच्चे हों।
निगमों और राज्यों की भूमिका पर फोकस
वकील मनोज शिरसाट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आवारा कुत्तों को नियंत्रित करना नगर निगम और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है और ऐसा न कर पाना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन माना जाएगा। वहीं, वकील कीर्ति आहूजा ने आक्रामकता की स्पष्ट परिभाषा तय करने और डॉग फीडिंग के लिए अलग स्थान चिन्हित करने की जरूरत बताई।सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानव सुरक्षा और पशु करुणा के बीच संतुलन जरूरी है और इस दिशा में एक प्रभावी व जिम्मेदार व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
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