ख़बर का असर

Home » Foreign Affairs » टैरिफ की धमकियों से डिजिटल दुनिया में दरार, अमेरिका पर निर्भरता घटाने की राह पर यूरोप

टैरिफ की धमकियों से डिजिटल दुनिया में दरार, अमेरिका पर निर्भरता घटाने की राह पर यूरोप

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर टैरिफ को हथियार बनाकर दुनिया पर अपनी शर्तें थोपने की कोशिश कर रहे हैं। स्वीडन के राइज रिसर्च इंस्टीट्यूट की सीनियर रिसर्चर और लुंड यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर जोहान लिनाकर का मानना है कि यूरोप की सालों की लापरवाही अब भारी पड़ रही है।

Tarrif news: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर टैरिफ को हथियार बनाकर दुनिया पर अपनी शर्तें थोपने की कोशिश कर रहे हैं। व्यापार हो या तकनीक, ट्रंप लगातार अलग-अलग देशों को टैरिफ बढ़ाने की धमकियां दे रहे हैं। इसके चलते हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि यूरोपीय यूनियन समेत कई देश अब अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करने के विकल्प तलाशने लगे हैं। आज की दुनिया में डिजिटल फ्रेमवर्क हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। क्लाउड, डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर ऑनलाइन सर्विसेज तक ज्यादातर तकनीकी ढांचा अमेरिकी कंपनियों के हाथ में है। ऐसे में अगर अमेरिका के साथ संबंधों में खटास बढ़ती है, तो जरूरी डिजिटल सेवाओं पर भी असर पड़ सकता है।

अमेरिका पर कितना निर्भर है यूरोप

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के साथ ही वैश्विक राजनीति में तनाव साफ नजर आने लगा है। व्यापार, राजनीति और तकनीक तीनों ही मोर्चों पर समीकरण बदलने की चर्चा तेज हो गई है। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के बयान और टैरिफ की धमकियों ने यूरोपीय यूनियन को अपने पुराने सहयोगी अमेरिका के साथ रिश्तों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। यूरोप का बड़ा हिस्सा अमेरिकी क्लाउड सर्विसेज पर निर्भर है। अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी कंपनियां यूरोप के दो-तिहाई से ज्यादा क्लाउड मार्केट पर कब्जा किए हुए हैं। वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी अमेरिकी कंपनियां फिलहाल सबसे आगे हैं।

Tarrif news: ‘देसी जुगाड़’ पर फोकस

यूरोपियन पार्लियामेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोपीय यूनियन 80 फीसदी से ज्यादा डिजिटल प्रोडक्ट्स, सर्विसेज, इंफ्रास्ट्रक्चर और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी के लिए नॉन-ईयू देशों पर निर्भर है। यही वजह है कि अब ईयू के लॉ-मेकर्स अमेरिका के विकल्प तलाशने की बात कर रहे हैं। यूरोपीय नेता गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और ओपनएआई जैसी कंपनियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय लोकल या वैकल्पिक तकनीकी समाधानों पर जोर दे रहे हैं। मकसद साफ है डिजिटल सेक्टर में आत्मनिर्भरता बढ़ाना और रणनीतिक जोखिम कम करना।

बदलाव में लग सकता है एक दशक

Tarrif news: स्वीडन के राइज रिसर्च इंस्टीट्यूट की सीनियर रिसर्चर और लुंड यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर जोहान लिनाकर का मानना है कि यूरोप की सालों की लापरवाही अब भारी पड़ रही है। उनके मुताबिक, यूरोप का बड़ा हिस्सा अमेरिकी बिग-टेक कंपनियों के क्लाउड सिस्टम पर टिका हुआ है। लिनाकर कहती हैं, “सरकारी संस्थाएं दशकों से एक तरह के कम्फर्ट जोन में रहीं। जोखिम लेने से बचने की प्रवृत्ति, कंजर्वेटिव प्रोक्योरमेंट सिस्टम और बदलाव से दूरी इन सबने यूरोप को पीछे कर दिया। अब हालात बदल गए हैं। भू-राजनीतिक तनाव ने जोखिम को और बढ़ा दिया है, जो सिर्फ इनोवेशन की कमी या बढ़ती लाइसेंस कॉस्ट तक सीमित नहीं है।”

 

यह भी पढ़ें: ISS जाने वाले पहले भारतीय शुभांशु शुक्ला को अशोक चक्र, 70 जवानों को गैलेंट्री अवॉर्ड

 

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments

Share this post:

खबरें और भी हैं...

Live Video

लाइव क्रिकट स्कोर

Khabar India YouTubekhabar india YouTube poster

राशिफल