Air pollution: देश में सर्दियों की शुरुआत से पहले ही वायु प्रदूषण चिंता बढ़ाने लगा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के 22 अक्टूबर 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, निगरानी वाले 254 शहरों में से 131 शहरों का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) मध्यम से लेकर बेहद खराब श्रेणी में दर्ज किया गया। हरियाणा के पंचगांव में AQI 378 तक पहुंच गया, जबकि उत्तर प्रदेश के बड़ौत और हापुड़ में यह 328 दर्ज किया गया। दिल्ली-NCR में भी हवा की गुणवत्ता खराब होने के बाद ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) का पहला चरण लागू किया गया। ऐसे में सवाल है कि सर्दी शुरू होने से पहले ही हवा क्यों बिगड़ने लगी है? क्या आने वाले दिनों में प्रदूषण और बढ़ेगा? पराली, गाड़ियों का धुआं और निर्माण कार्य इसमें कितनी भूमिका निभाते हैं? आइए, समझते हैं पूरा मामला।
254 में से 131 शहरों की हवा खराब क्यों?
CPCB के 22 अक्टूबर के आंकड़ों के अनुसार, देश के 254 निगरानी वाले शहरों में वायु गुणवत्ता की स्थिति इस प्रकार रही: 25 शहर: अच्छी हवा (AQI 0–50), 98 शहर: संतोषजनक हवा (AQI 51–100), 111 शहर: मध्यम श्रेणी (AQI 101–200), 17 शहर: खराब हवा (AQI 201–300), 3 शहर: बेहद खराब हवा (AQI 301–400) खराब है । इन आंकड़ों से पता चलता है कि 131 शहरों में हवा की गुणवत्ता मध्यम से बेहद खराब श्रेणी में थी। हालांकि, मध्यम श्रेणी की हवा को सीधे सांस लेने के लिए अनुपयुक्त कहना सही नहीं होगा। प्रदूषण का असर व्यक्ति की सेहत, उम्र और पहले से मौजूद बीमारियों के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।
Air pollution: किन शहरों में सबसे ज्यादा प्रदूषण?
आंकड़ों के मुताबिक, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में प्रदूषण का स्तर काफी ऊंचा रहा।
पंचगांव, हरियाणा: AQI 378
बड़ौत, उत्तर प्रदेश: AQI 328
हापुड़, उत्तर प्रदेश: AQI 328
दिल्ली: AQI 223
इस दौरान मिजोरम की राजधानी आइजोल में AQI 20 दर्ज किया गया, जो अच्छी श्रेणी में आता है। दिल्ली-NCR में भी स्थिति चिंताजनक रही। रिपोर्ट के अनुसार, 21 अक्टूबर को दिल्ली का AQI 244 तक पहुंच गया था। अगले दिन इसमें कुछ गिरावट आई, लेकिन हवा खराब श्रेणी में बनी रही।
दिल्ली-NCR में GRAP-1 क्यों लागू किया गया?
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने दिल्ली-NCR में प्रदूषण बढ़ने के बाद ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान यानी GRAP का पहला चरण लागू किया। GRAP प्रदूषण की स्थिति के अनुसार लागू किए जाने वाले उपायों की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य हवा की गुणवत्ता बिगड़ने पर प्रदूषण के स्रोतों को नियंत्रित करना और स्थिति को और खराब होने से रोकना है। दिल्ली में प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों की धूल, कचरा जलाना और आसपास के क्षेत्रों में पराली जलाने से उठने वाला धुआं शामिल हैं। अलग-अलग समय पर इन स्रोतों का योगदान मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।
सर्दियों से पहले ही हवा क्यों बिगड़ रही है?
पर्यावरणविद डॉ. सुभाष पांडे के मुताबिक, वायु प्रदूषण बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। इनमें पराली जलाना, वाहनों का उत्सर्जन, मौसम में बदलाव और स्थानीय प्रदूषण प्रमुख हैं।
1. पराली जलाने से बढ़ता है प्रदूषण
पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में धान की कटाई के बाद अक्टूबर और नवंबर के दौरान पराली जलाने की घटनाएं सामने आती हैं। इससे निकलने वाला धुआं हवा में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ा सकता है। हालांकि, दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण के लिए केवल पराली को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। इसका असर हवा की दिशा, मौसम और दूसरे स्थानीय स्रोतों पर भी निर्भर करता है।

2. गाड़ियों का धुआं भी बड़ी वजह
वाहनों से निकलने वाला धुआं शहरी प्रदूषण का महत्वपूर्ण स्रोत है। पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन के साथ सड़कों पर उड़ने वाली धूल भी हवा की गुणवत्ता प्रभावित करती है। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में वाहनों की संख्या, ट्रैफिक और सड़क की स्थिति प्रदूषण के स्तर को प्रभावित कर सकती है।
3. मौसम बदलते ही प्रदूषक हवा में फंसने लगते हैं
मानसून के बाद तापमान गिरने लगता है और हवा की गति में बदलाव आता है। कुछ परिस्थितियों में वायुमंडल की निचली परत में प्रदूषक कण जमा होने लगते हैं। हवा का पर्याप्त प्रसार नहीं होने पर प्रदूषण लंबे समय तक बना रह सकता है। यही वजह है कि सर्दियों में कई शहरों में धुंध और प्रदूषण की समस्या बढ़ जाती है।
4. पटाखे, निर्माण कार्य और कचरा जलाना
दशहरा और दिवाली के दौरान पटाखों से निकलने वाला धुआं स्थानीय स्तर पर प्रदूषण बढ़ा सकता है। इसके अलावा निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और खुले में कचरा जलाने से भी हवा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इन स्रोतों पर नियंत्रण के लिए नियमों का पालन और प्रशासनिक निगरानी जरूरी है।
Air pollution: प्रदूषित हवा से सेहत पर क्या असर पड़ता है?
हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण सांस के जरिए शरीर में पहुंच सकते हैं। PM2.5 के कण बेहद छोटे होते हैं और फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। प्रदूषण के संपर्क में आने से आंखों में जलन, खांसी, गले में परेशानी और सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से हृदय और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और अस्थमा या हृदय रोग से पीड़ित लोगों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है।
क्या सर्दियों में और बिगड़ेंगे हालात?
सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने की आशंका रहती है, लेकिन इसकी गंभीरता पहले से निश्चित नहीं कही जा सकती। यह पराली जलाने की घटनाओं, वाहनों के उत्सर्जन, निर्माण कार्यों, हवा की गति, तापमान और बारिश जैसी परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
यदि हवा की गति कम रहती है और प्रदूषण के स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाता, तो कुछ शहरों में स्थिति और बिगड़ सकती है। इसके उलट, तेज हवा या बारिश से प्रदूषक कणों की मात्रा में कमी आ सकती है। इसलिए प्रदूषण से निपटने के लिए केवल सर्दियां आने पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। पराली जलाने पर नियंत्रण, वाहनों के उत्सर्जन में कमी, निर्माण स्थलों पर धूल रोकने और कचरा जलाने के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई जरूरी है।
सर्दियों से पहले देश के कई शहरों में वायु गुणवत्ता का बिगड़ना चिंता का विषय है। CPCB के आंकड़े बताते हैं कि 22 अक्टूबर को 254 निगरानी वाले शहरों में से 131 शहरों की हवा मध्यम से बेहद खराब श्रेणी में थी। पराली जलाना, वाहनों का धुआं, निर्माण कार्यों की धूल और मौसम में बदलाव प्रदूषण बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। आने वाले दिनों में हवा की स्थिति कैसी रहेगी, यह इन कारकों और प्रशासनिक कदमों पर निर्भर करेगा। साफ हवा के लिए जरूरी है कि प्रदूषण के स्रोतों पर समय रहते नियंत्रण किया जाए, न कि हालात गंभीर होने के बाद ही कदम उठाए जाएं।
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