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कभी सूखा, कभी बाढ़ और कभी लू… 9 महीने में मौसम ने ली 3,220 लोगों की जान, समझिए पूरा संकट

Climate Change India:  भारत में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। कहीं भीषण गर्मी और लू लोगों की जान ले रही है तो कहीं अचानक हुई भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन तबाही मचा रहे हैं। दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) और पर्यावरण पत्रिका ‘डाउन टू अर्थ’ की रिपोर्ट ‘क्लाइमेट इंडिया 2026’ के मुताबिक, जनवरी से सितंबर 2026 के बीच देश में 273 दिनों में से 251 दिन यानी करीब 92 फीसदी दिनों में किसी न किसी हिस्से में चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गईं। इन घटनाओं में 3,220 लोगों की मौत हुई, जबकि 42.5 लाख हेक्टेयर से अधिक फसल प्रभावित हुई। आखिर भारत में मौसम इतना अस्थिर क्यों होता जा रहा है और इसका आम लोगों, किसानों तथा अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है? समझिए पूरा मामला।

CSE की रिपोर्ट में क्या सामने आया?

CSE और डाउन टू अर्थ की 4 नवंबर 2026 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल जनवरी से सितंबर के बीच भारत के किसी न किसी हिस्से में 251 दिन चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें लू, शीतलहर, बिजली गिरना, तूफान, भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाएं शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन घटनाओं से देश में भारी जान-माल का नुकसान हुआ।

नुकसान का प्रकार          जनवरी-सितंबर 2026 के आंकड़े
लोगों की मौत                                  3,220
प्रभावित फसल क्षेत्र                     42.5 लाख हेक्टेयर
तबाह हुए मकान                                  1,28,334
मारे गए पशु                                         47,244
चरम मौसम वाले दिन                           251 दिन

यहां 92 फीसदी दिनों का मतलब यह नहीं है कि पूरे देश में हर दिन मौसम की मार पड़ी। इसका अर्थ है कि इन दिनों में देश के कम से कम एक हिस्से में कोई चरम मौसमी घटना दर्ज की गई।

Climate Change India: भारत में मौसम इतना खतरनाक क्यों होता जा रहा है?

मौसम में बदलाव के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारक काम करते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ने से वातावरण और समुद्र की स्थितियों में बदलाव आता है। इससे कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी, भारी बारिश और सूखे जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है। गर्म वातावरण अधिक नमी अपने भीतर रख सकता है। जब अनुकूल मौसमी परिस्थितियां बनती हैं तो कम समय में बहुत अधिक बारिश हो सकती है। इससे अचानक बाढ़, जलभराव और भूस्खलन का खतरा बढ़ता है। दूसरी ओर, लंबे समय तक बारिश नहीं होने और तापमान बढ़ने से मिट्टी की नमी कम हो सकती है। इसका सीधा असर खेती और जल उपलब्धता पर पड़ता है। हालांकि, हर बाढ़, सूखे या लू की घटना का एकमात्र कारण जलवायु परिवर्तन नहीं होता। स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियां, मौसम प्रणालियां, जमीन का इस्तेमाल और आपदा प्रबंधन की तैयारी भी नुकसान की गंभीरता तय करती हैं।

कम बारिश के बावजूद बाढ़ और भारी बारिश क्यों हुई?

रिपोर्ट में इस साल के मानसून का एक अहम पहलू सामने आया है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान देश में कुल बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) से करीब 13 फीसदी कम रही। इसके बावजूद मानसून के 122 दिनों में देश के किसी न किसी हिस्से में भारी बारिश, बाढ़ या भूस्खलन की घटनाएं दर्ज की गईं। सामान्य तौर पर कम बारिश को सूखे से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन कुल बारिश का आंकड़ा यह नहीं बताता कि बारिश कब और किस इलाके में हुई। मान लीजिए किसी क्षेत्र में कई दिनों तक बारिश नहीं होती, लेकिन कुछ घंटों में बहुत ज्यादा पानी बरस जाता है। ऐसे में कुल बारिश का औसत कम रह सकता है, जबकि अचानक आई बारिश बाढ़ और फसल नुकसान की वजह बन सकती है। यही कारण है कि मानसून के दौरान बारिश की मात्रा के साथ उसका समय, वितरण और तीव्रता समझना भी जरूरी है।

Climate Change India: फरवरी 2026 में मौसम ने कौन-सा रिकॉर्ड बनाया?

रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 2026 में भारत ने 1901 के बाद सबसे सूखा फरवरी दर्ज किया। तापमान के लिहाज से यह पिछले 125 वर्षों का चौथा सबसे गर्म फरवरी भी रहा। यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सर्दियों के मौसम में तापमान और बारिश का सामान्य पैटर्न खेती, जल संसाधनों और दैनिक जीवन को प्रभावित करता है। सर्दियों में पर्याप्त ठंड और बारिश न होने से रबी की फसलों पर असर पड़ सकता है। वहीं समय से पहले तापमान बढ़ने पर फसलों की वृद्धि और पैदावार प्रभावित होने का खतरा रहता है। रिपोर्ट में सर्दियों के बदलते स्वरूप, कम शीतलहर और कुछ इलाकों में समय से पहले गर्मी की घटनाओं को भी रेखांकित किया गया है।

किन राज्यों पर मौसम की सबसे ज्यादा मार पड़ी?

रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी से सितंबर के बीच उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा दिनों तक चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गईं। दोनों राज्यों में 273 दिनों में से करीब 64 फीसदी दिन ऐसे रहे, जब किसी न किसी तरह की चरम मौसमी घटना हुई। मौतों के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे रहा। राज्य में 811 लोगों की जान गई। इसके बाद महाराष्ट्र में 286 और बिहार में 245 मौतें दर्ज की गईं।

फसल नुकसान के मामले में महाराष्ट्र सबसे ज्यादा प्रभावित रहा। यहां करीब 28.3 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ। उत्तर प्रदेश में 6.9 लाख हेक्टेयर और बिहार में 2.3 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र को नुकसान पहुंचा। क्षेत्रीय स्तर पर उत्तर-पश्चिम भारत में सबसे ज्यादा 235 दिन चरम मौसम दर्ज किया गया। इसके बाद पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत का स्थान रहा, जहां 218 दिनों में ऐसी घटनाएं सामने आईं।

Climate Change India: किसानों के लिए मौसम का बदलता मिजाज क्यों बड़ी चुनौती है?

भारत की बड़ी आबादी आज भी खेती और उससे जुड़े कामों पर निर्भर है। ऐसे में मौसम में अचानक बदलाव किसानों की आय और खाद्य उत्पादन दोनों को प्रभावित कर सकता है। लंबे समय तक सूखा रहने पर फसलों को पर्याप्त पानी नहीं मिलता। इसके उलट, कम समय में अत्यधिक बारिश होने पर खेतों में पानी भर जाता है और खड़ी फसल खराब हो सकती है। लू और असामान्य गर्मी का असर फसलों की वृद्धि, फूल आने और दाने बनने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है। वहीं ओलावृष्टि और तेज हवाएं तैयार फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

CSE की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के शुरुआती नौ महीनों में 42.5 लाख हेक्टेयर से अधिक फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ। यह नुकसान केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर किसानों की आमदनी, ग्रामीण बाजार, खाद्य आपूर्ति और कृषि आधारित उद्योगों तक पहुंच सकता है।

क्या हर साल मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं?

CSE की पांच साल की समीक्षा में चरम मौसम वाले दिनों की हिस्सेदारी में बढ़ोतरी का रुझान सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 और 2023 में जनवरी से सितंबर के बीच करीब 86 से 88 फीसदी दिनों में चरम मौसमी घटनाएं दर्ज हुईं। 2024 में यह आंकड़ा 93 फीसदी और 2025 में 99 फीसदी तक पहुंच गया। 2026 के पहले नौ महीनों में यह हिस्सेदारी करीब 92 फीसदी रही।

पिछले पांच साल यानी 2022 से 2026 के दौरान चरम मौसमी घटनाओं में 16 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई और करीब 2.06 करोड़ हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ। इससे पता चलता है कि समस्या किसी एक साल या एक राज्य तक सीमित नहीं है। हालांकि, अलग-अलग वर्षों के आंकड़ों की तुलना करते समय रिपोर्ट की अवधि और घटनाओं को दर्ज करने की पद्धति को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

Climate Change India: मौसम की मार से बचने के लिए क्या करना होगा?

रिपोर्ट में जलवायु संकट से निपटने के लिए केवल आपदा आने के बाद राहत और बचाव पर निर्भर रहने के बजाय पहले से तैयारी करने की जरूरत बताई गई है। इसके लिए शहरों में जल निकासी व्यवस्था बेहतर बनाना, तालाबों और प्राकृतिक जल स्रोतों को संरक्षित करना, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना और हरित क्षेत्रों तथा जंगलों की रक्षा करना जरूरी है। खेती में भी मौसम के अनुसार फसल चयन, बेहतर सिंचाई व्यवस्था, मौसम पूर्वानुमान की जानकारी और फसल बीमा जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना होगा। इसके साथ ही गांवों और शहरों में स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन की तैयारी जरूरी है। समय रहते चेतावनी मिलने से बाढ़, लू, आकाशीय बिजली और तूफान से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।

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मौसम का संकट अब जिंदगी और आजीविका का सवाल

CSE की ‘क्लाइमेट इंडिया 2026’ रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि चरम मौसमी घटनाएं भारत के सामने एक बड़ी चुनौती बन रही हैं। 3,220 मौतें, 42.5 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र का प्रभावित होना और एक लाख से अधिक मकानों का तबाह होना इस संकट के मानवीय और आर्थिक असर को दिखाता है।

CSE की महानिदेशक सुनीता नारायण ने इसे जलवायु परिवर्तन का मानवीय चेहरा बताया है। रिपोर्ट का संदेश साफ है कि अब केवल आपदा के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं होगा। मौसम के जोखिम को पहले से समझना, शहरों और गांवों को उसके अनुकूल तैयार करना और किसानों की सुरक्षा के उपाय मजबूत करना जरूरी है।

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