Pakistan-Afghanistan Conflict: पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के खिलाफ अपने हमलों में आत्मरक्षा का दावा किया है, लेकिन हालिया रिपोर्टों से पता चला है कि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन नहीं कर रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान पर हमले को “सुरक्षा कारण” बताकर कानूनी ढाँचे से बाहर नहीं कर सकता।
नागरिक सुरक्षा पर हवाई हमलों का असर
अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, किसी भी देश को दूसरे देश में हमला करने, नागरिक इलाकों को खतरे में डालने और फिर इसे सुरक्षा का तर्क देकर सही ठहराने की अनुमति नहीं है। नियम यह भी कहते हैं कि किसी संघर्ष में प्रतिक्रिया संतुलित होनी चाहिए और सैन्य व नागरिक लक्ष्य साफ़ अलग होने चाहिए। अगर यह नियम मान लिया जाए, तो हर देश पड़ोसी पर हमला कर सकता है, बस यह कहकर कि “हमारे पास सबूत हैं।”
रिपोर्ट के अनुसार, हाल के हफ्तों में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर हवाई हमलों को तेज़ कर दिया है, जिनका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों और बच्चों को हो रहा है। काबुल के एक नशा मुक्ति केंद्र पर हमला सबसे गंभीर घटना रहा, जिसमें 143 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। यूएन के अनुसार, इस हमले से तीन हफ्ते पहले हुए हमलों में कम से कम 70 लोग मारे गए, 478 घायल हुए और लगभग 1,15,000 लोग विस्थापित हुए।
Pakistan-Afghanistan Conflict: अफगानिस्तान दो मोर्चों पर संघर्षरत
अफगानिस्तान इस समय दो मोर्चों से जूझ रहा है: एक तरफ तालिबान की कठोर नीतियां, और दूसरी तरफ सीमा पार से लगातार हमले। इस वजह से देशवासियों की सुरक्षा और आजादी दोनों ही खतरे में हैं।
रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान का यह रवैया कोई संयोग नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय की लंबी चुप्पी और चुनिंदा कार्रवाई का परिणाम है। साथ ही, दुनिया का ध्यान अमेरिका, इजरायल और ईरान के युद्ध पर केंद्रित होने के कारण अफगानिस्तान फिर हाशिए पर चला गया है।
कानून की कमी बढ़ा रही खतरा
इस चुप्पी से यह संदेश जाता है कि अपराधी बिना सजा के काम कर सकते हैं। नतीजतन, चिकित्सा केंद्रों और नागरिक इलाकों पर हमले सामान्य बनते जा रहे हैं, और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही। यह सिर्फ अफगानिस्तान के लिए नहीं, बल्कि पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खतरा है। जब कानून का डर खत्म हो जाता है, तो उसका महत्व भी खो जाता है।
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