Sabarimala SC Hearing: केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने आज से सुनवाई शुरू कर दी है। अदालत यह तय करेगी कि मंदिर में महिलाओं को प्रवेश देने का आदेश जारी रखा जाए या नहीं। सुनवाई के दौरान वकीलों के बीच इस बात पर भी बहस चल रही है कि मामला सबरीमाला फैसले की समीक्षा से जुड़ा है या फिर अदालत केवल उन सात सवालों पर ही विचार करेगी जिन्हें पहले संविधान पीठ के सामने रखा गया था।
केंद्र सरकार ने आस्था और परंपरा का हवाला दिया
सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना लिखित पक्ष रखा। सरकार ने कहा कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर जो रोक है, उसका कारण भगवान अयप्पा की मान्यता है। मंदिर में भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है, यानी उन्होंने जीवनभर ब्रह्मचर्य का पालन किया। सरकार का कहना है कि इस परंपरा का महिलाओं की शुद्धता या उनके सामाजिक दर्जे से कोई संबंध नहीं है। अगर इस आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जाती है, तो वहां की पारंपरिक पूजा-पद्धति बदल सकती है। इससे संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक विविधता प्रभावित हो सकती है।

सुनवाई केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं
यह सुनवाई केवल सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं है। धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े कई अन्य मुद्दे भी अदालत के सामने हैं। इनमें मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश का सवाल, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतना की प्रथा, दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थलों में प्रवेश देने का अधिकार, और मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के मुद्दे शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट इन सभी मामलों पर व्यापक रूप से विचार करेगा।
Sabarimala SC Hearing: सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा याचिकाएं
इन मामलों से जुड़े विवाद पिछले लगभग 26 वर्षों से देश की अलग-अलग अदालतों में लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट में अब 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशनों पर अंतिम सुनवाई हो रही है। यह सुनवाई 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक चलेगी। अदालत ने समय तय किया है जिसके तहत 7 से 9 अप्रैल के बीच रिव्यू पिटीशन दाखिल करने वाले और उनका समर्थन करने वाले पक्ष अपनी दलीलें देंगे। इसके बाद 14 से 16 अप्रैल के बीच उन पक्षों को सुना जाएगा जो इन याचिकाओं का विरोध कर रहे हैं।

अदालत के सामने पांच बड़े विवाद
इस सुनवाई में कई महत्वपूर्ण धार्मिक और संवैधानिक सवालों पर चर्चा हो रही है। इनमें सबसे प्रमुख मामला सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का है। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इस फैसले के बाद मंदिर के पुजारी और कुछ धार्मिक संस्थाओं ने इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की थीं।
इसके अलावा अदालत दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना की प्रथा पर भी विचार कर रही है। इस मामले में 2017 में वकील सुनीता तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी और इसे महिलाओं के मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया था। इसी तरह मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में नमाज पढ़ने की अनुमति देने का सवाल भी अदालत के सामने है। 2016 में यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
एक अन्य महत्वपूर्ण मामला पारसी समुदाय से जुड़ा है। 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम. गुप्ता ने एक हिंदू पुरुष से शादी की थी, जिसके बाद उन्हें पारसी धर्मस्थलों में प्रवेश से रोका जाने लगा। उन्होंने इसके खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी और बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। अब अदालत यह तय करेगी कि गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिला को अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है या नहीं। इसके साथ ही अदालत मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्नों पर भी विचार करेगी और यह देखेगी कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
अदालत में धर्म और संविधान पर लंबी बहस
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि किसी भी धर्म को एक ही रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि बौद्ध धर्म को भी एक ही संप्रदाय मानना सही नहीं है, क्योंकि उसमें भी आंतरिक विविधता मौजूद है। उनके अनुसार अदालत को यह भी देखना चाहिए कि क्या वह धार्मिक सिद्धांतों पर निर्णय लेने के लिए विशेषज्ञ है या नहीं। अगर अदालत को यह तय करना है कि कोई प्रथा जरूरी धार्मिक परंपरा है या नहीं, तो इसके लिए धार्मिक ग्रंथों की गहराई से जांच करनी होगी, जो बेहद जटिल प्रक्रिया है।
उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या करते समय उसकी प्रस्तावना और धार्मिक आस्था को भी ध्यान में रखना जरूरी है। उनके अनुसार हिंदू धर्म बहुत व्यापक है और उसमें अनेक परंपराएं, विचार और दर्शन शामिल हैं। इसमें आस्तिक, नास्तिक, मूर्ति-पूजा करने वाले और मूर्ति-पूजा न मानने वाले सभी लोग शामिल हो सकते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शिरडी में सभी संप्रदायों के हिंदू जाते हैं, जबकि निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर हर धर्म के लोग पहुंचते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक परंपराओं की अपनी-अपनी पहचान और विविधता होती है।

Sabarimala SC Hearing: जजों की टिप्पणियां और दार्शनिक चर्चा
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि संविधान के कुछ विचार आयरलैंड के संविधान से प्रेरित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ‘खुशी की तलाश’ जैसी अवधारणा को अक्सर जॉन लॉक से जोड़ा जाता है, लेकिन भारतीय दर्शन में चार्वाक विचारधारा में भी इसी तरह की सोच दिखाई देती है। चार्वाक दर्शन में कहा गया है कि जीवन को सुख के साथ जीना चाहिए, भले ही इसके लिए कर्ज ही क्यों न लेना पड़े।
वहीं जस्टिस अमानुल्लाह ने जैन धर्म के संदर्भ में कहा कि उसमें पुनर्जन्म की मान्यता भी मौजूद है, इसलिए यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि जैन धर्म में मृत्यु के बाद जीवन की कोई अवधारणा नहीं है।
केंद्र का आग्रह: अदालत धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करे
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि सबरीमाला का मुद्दा पूरी तरह धार्मिक आस्था और किसी विशेष धार्मिक समुदाय के अपने नियम तय करने के अधिकार से जुड़ा है। इसलिए अदालत को ऐसे मामलों में सीमित दखल देना चाहिए। सरकार का कहना है कि अगर अदालत धार्मिक परंपराओं में सीधे हस्तक्षेप करेगी, तो इससे देश की धार्मिक विविधता पर असर पड़ सकता है।
अदालत में अलग-अलग पक्षों की दलीलें
सुनवाई के दौरान कई वरिष्ठ वकीलों ने अपनी-अपनी राय रखी। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि अदालत को केवल मुख्य पक्षों की दलीलें ही सुननी चाहिए ताकि सुनवाई लंबी न खिंचे। वहीं वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने अदालत से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या वास्तव में रिव्यू पिटीशनों पर सुनवाई होगी या केवल उन सवालों पर जिनका जवाब देने के लिए मामला संविधान पीठ को भेजा गया था।
Sabarimala SC Hearing: मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत का उद्देश्य दलीलों को सीमित करना नहीं है, बल्कि दोहराव से बचते हुए सीधे मुद्दे पर आना है। उन्होंने बताया कि अदालत चार अलग-अलग तरह की दलीलें सुनेगी। कुछ पक्ष अदालत को पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप करने का अधिकार देने की बात करेंगे, जबकि कुछ यह कहेंगे कि धार्मिक परंपराओं की जांच अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती। कुछ लोग सीमित हस्तक्षेप की बात करेंगे और कुछ का कहना होगा कि अदालत को हर मामले की परिस्थितियों के आधार पर फैसला करना चाहिए।
पहले भी तय किए गए थे महत्वपूर्ण सवाल
13 जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि वह सीधे पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसला नहीं करेगा, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार के बीच संतुलन जैसे मुद्दों पर विचार करेगा। जनवरी और फरवरी 2020 में कई दिनों तक इस मामले पर बहस चली थी, जिसमें महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर चर्चा हुई थी। हालांकि कोविड-19 महामारी के कारण उस समय सुनवाई रोक दी गई थी।
अब एक बार फिर यह मामला सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए आया है और आने वाले दिनों में अदालत इन सभी महत्वपूर्ण धार्मिक और संवैधानिक प्रश्नों पर अपना फैसला दे सकती है।
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