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Nepal Disaster: बालेन शाह सतर्क रहें, आपदा कहीं कुर्सी न छीन ले…

Nepal Disaster: बालेन शाह सतर्क रहें, आपदा कहीं कुर्सी न छीन ले...
Nepal Disaster: प्राकृतिक आपदा अपने साथ तबाही ही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचारियों के लिए कमाई के अवसर भी लेकर आती है।अतीत के बहुत से ऐसे उदाहरण हैं, जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से लेकर नौकरशाहों और यहां तक कि तथाकथित समाजसेवियों ने भी आपदा में कमाई के अवसर ढूंढ़े।राहत सामग्री की जबर्दस्त लूट मची और पुनर्वास के नाम पर बनी योजनाओं में जमकर घोटाले हुए।नेपाल के युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह को यह बात गंभीरता से ध्यान में रखनी होगी कि कहीं नेपाल में भी आपदा में अवसर तलाशने वाले तत्व हावी न हो जाएं। यदि ऐसा हुआ तो उनके राजनीतिक भविष्य के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी। 

राहत सामग्री में घपला न होने पाए

आपदा के समय लोगों की प्राथमिकता जीवन बचाने की होती है।पीड़ित परिवार अपनों के खो जाने के गम में डूबे रहते हैं, तो अन्य उन्हें ढाढ़स बंधाने और सहारा देने का फर्ज निभाते हैं।बहुत से अपनों की तलाश में भटकते रहते हैं।एक तरफ लोग जीवन को बचाने की चुनौती से जूझते रहते हैं, तो दूसरी तरफ चालबाज मौके का नाजायज फायदा उठाकर उनके हिस्से की राहत सामग्री को ठिकाने लगाने में जुटे रहते हैं।राहत सामग्री में नीचे से लेकर ऊपर तक कई स्तरों पर भ्रष्टाचार होता है।भोजन सामग्री, दवाइयां, टेंट और कंबल जैसी जरूरी चीजों की कालाबाजारी कर दी जाती है।वास्तविक पीड़ितों को दरकिनार कर कागजों पर नकली पीड़ित खड़े कर दिये जाते हैं।राहत राशि और मुआवजे में बड़े पैमाने पर धाँधली होती है। 
  

Nepal Disaster: केदारनाथ आपदा

बालेन शाह इस बात का ध्यान रखें कि अतीत के अनुभवों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। 2013 की केदारनाथ आपदा के दौरान एक ओर जहां पीड़ित दाने-दाने को मोहताज थे, वहीं दूसरी तरफ राहत कार्य की निगरानी के लिए भेजे गए सरकारी अधिकारी आलीशान होटलों में मौज कर रहे थे।हालत यह रही कि वे होटल के जिन कमरों में ठहरे उनके प्रतिदिन का किराया 7,000  रुपए तक था। उन दुकानों और संपत्तियों के नाम पर भी भारी मुआवजा बंटा जो जमीन पर कहीं नहीं थे।राहत सामग्री पहुंचाने वाले वाहनों के नाम पर भी जमकर फर्जीवाड़ा हुआ।तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के खिलाफ जनता में इस बात को लेकर असंतोष बढ़ा कि वे आपदा से निपटने में असफल रहे। नतीजा यह हुआ कि उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी।
बहुगुणा के बाद जिन हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया, उनके शासन में भी आपदा से उजड़े लोगों के घावों पर मलहम नहीं लग पाया।मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनकी सरकार पर आपदा प्रभावित क्षेत्रों की उपेक्षा के आरोप लगे।आखिरकार पीड़ितों को अपने साथ न्याय के लिए हाईकोर्ट का रुख करना पड़ा, तब जाकर उन्हें कुछ राहत मिली।हालांकि रावत ने आपदा के चलते इस्तीफा तो नहीं दिया, लेकिन वे फिर कभी उत्तराखंड की सत्ता में नहीं लौट पाए।

Nepal Disaster: ओडिशा का महाचक्रवात

केदारनाथ आपदा से थोड़ा पीछे जाएं, तो वर्ष 1999 का ओडिशा महाचक्रवात के चलते राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी।29 अक्टूबर 1999 को आए उस विनाशकारी चक्रवात से ओडिशा में बहुत बड़ी तबाही हुई थी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक करीब 10 हजार लोगों की जानें चली गई थी। लाखों लोग प्रभावित हुए थे।तूफान के दौरान राहत और बचाव कार्यों के खराब प्रबंधन को लेकर मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग की भारी आलोचना हुई थी।आखिरकार भारी जनाक्रोश को देखते हुए कांग्रेस आलाकमान को झुकना पड़ा था।मुख्यमंत्री गमांग को इस्तीफा देना पड़ा था।यह अलग बात है कि गमांग ने कहा था कि वे राजनीति के शिकार हुए हैं।

Nepal Disaster: बालेन शाह क्या ध्यान रखें?

अच्छी बात है कि बालेन शाह सरकार ने भयंकर तबाही देखते हुए बचाव कार्यों में विदेशों की मदद ली। प्रधानमंत्री बालेन शाह को असली सतर्कता अब बरतने की जरूरत है।यदि जरूरत पड़ी तो वे राहत और बचाव में सुरक्षाकर्मियों के साथ ही राष्ट्रीय सेवा दल (National Cadet Corps -NCC) की भी मदद ले सकते हैं।राहत और पुनर्वास में प्रभावितों के साथ ही स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जा सकता है।प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासन को चुस्त और जवाबदेह बनाने की जरूरत है।यदि कहीं से भी घपले की आशंका हो, तो राहत राशि सीधे पीड़ितों के बैंक खातों में भेजी जा सकती है। इसके बावजूद यदि भ्रष्टाचार के मामले उजागर होते हैं, तो इनकी सुनवाई के लिए त्वरित अदालतें (Fast-track courts) बनाए जाएं।यदि युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह ने दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दिया और जनता को राहत और पुनर्वास में पारदर्शिता दिखाई दी, तो वे एक सफल राजनेता होकर उभरेंगे।अगर ऐसा न हुआ, तो उनके भविष्य की राह चुनौतीपूर्ण होनी तय है।

Nepal Disaster: दुनिया के वे बड़े नेता जिन्हें आपदा के कारण कुर्सियां गंवानी पड़ी

-वर्ष 2011 में जापान में आए विनाशकारी भूकंप, सुनामी और उसके बाद फुकुशिमा परमाणु आपदा के समय देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री  नाओतो कान की सरकार पर आपदा प्रबंधन में विफलता के आरोप लगे। जनता के साथ ही जब उनकी पार्टी के भीतर से भी आक्रोश के स्वर उठे तो, नाओतो कान को इस्तीफा देना पड़ा।

-अगस्त 2020 में लेबनान की राजधानी बेरुत के बंदरगाह पर हुए विनाशकारी विस्फोट के बाद पूरे देश में व्यापक विरोध-प्रदर्शन हुए। इस मानव-निर्मित आपदा और प्रशासनिक लापरवाही की जिम्मेदारी लेते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री हसन दियाब ने अपनी पूरी कैबिनेट के साथ इस्तीफा दे दिया था।

-अप्रैल 2014 में दक्षिण कोरिया के ‘सेवोल’ फेरी हादसे में 300 से अधिक लोगों जिनमें बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे शामिल थे, की डूबने से मौत हो गई थी।सरकार पर राहत और बचाव कार्यों में लापरवाही के गंभीर आरोप लगे, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री चुंग होंग-वोन को इस्तीफा देना पड़ा था।

-अक्टूबर 2015 में रोमानिया के एक नाइटक्लब में भीषण आग लगने से 60 से अधिक लोगों की जानें चली गई थी।जनता ने इस हादसे को  सुरक्षा मानकों की अनदेखी और सरकारी भ्रष्टाचार से जुड़ी आपदा माना। जन आंदोलन ने उग्र रूप लिया तो, तत्कालीन प्रधानमंत्री विक्टर पोंटा को इस्तीफा देना पड़ा।