Chandrasekaran tenure controversy: टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा सन्स में चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के कार्यकाल और कंपनी की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग को लेकर बोर्डरूम विवाद गहरा गया है। गुरुवार को बोर्ड ने चंद्रशेखरन का कार्यकाल पांच साल बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं, टाटा सन्स के सबसे बड़े शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले को लेकर आपत्ति जताई है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के कार्यकाल बढ़ाने के प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। ट्रस्ट्स ने कहा है कि यह फैसला टाटा सन्स के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है और इसे कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
Chandrasekaran tenure controversy: टाटा सन्स में क्या है पूरा विवाद-
टाटा सन्स टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी है और इसमें टाटा ट्रस्ट्स की करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है। कंपनी के बोर्ड में चंद्रशेखरन के कार्यकाल को पांच साल बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया, जिसका छह में से चार निदेशकों ने समर्थन किया। नोएल टाटा ने प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि चंद्रशेखरन ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। टाटा ट्रस्ट्स ने बाद में इस प्रक्रिया और फैसले की वैधता पर सवाल उठाए।
Chandrasekaran tenure controversy: चंद्रशेखरन के कार्यकाल पर अचानक बदला फैसला-
एन चंद्रशेखरन ने अगस्त में घोषणा की थी कि वह फरवरी 2027 में अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद पद छोड़ देंगे और दोबारा नियुक्ति की मांग नहीं करेंगे। यह घोषणा टाटा सन्स में उनके कार्यकाल को बढ़ाने को लेकर कई महीनों से चल रहे मतभेद के बीच हुई थी। लेकिन गुरुवार की बोर्ड बैठक के बाद स्थिति बदल गई। बोर्ड ने उनके कार्यकाल को पांच साल बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, जिससे टाटा सन्स में नेतृत्व को लेकर विवाद एक बार फिर सामने आ गया है।
टाटा ट्रस्ट्स के पास सबसे बड़ी हिस्सेदारी-
टाटा सन्स में करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी 13 चैरिटेबल संस्थाओं के समूह टाटा ट्रस्ट्स के पास है। वहीं, टाटा समूह की कंपनियों के पास करीब 13 फीसदी हिस्सेदारी है। नोएल टाटा अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन बने थे। मौजूदा विवाद में वह टाटा सन्स के बोर्ड में चंद्रशेखरन के कार्यकाल और कंपनी की लिस्टिंग से जुड़े प्रस्तावों का विरोध करने वाले प्रमुख निदेशक हैं।
टाटा सन्स की लिस्टिंग पर भी मतभेद-
चंद्रशेखरन के कार्यकाल के अलावा टाटा सन्स को शेयर बाजार में लिस्ट कराने का मुद्दा भी विवाद के केंद्र में है। बोर्ड ने भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देश के अनुरूप कंपनी की लिस्टिंग की दिशा में कदम उठाने की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया है। आरबीआई ने पिछले सप्ताह टाटा सन्स की उस अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें कंपनी ने होल्डिंग कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट करने के नियमों से छूट मांगी थी।
नोएल टाटा ने लिस्टिंग का किया विरोध-
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि उसने टाटा सन्स को शेयर बाजार में लिस्ट करने पर सहमति नहीं दी है। ट्रस्ट्स के मुताबिक, मार्च 2024 में रतन टाटा के मार्गदर्शन में कंपनी को अनलिस्टेड रखने पर सर्वसम्मति से फैसला हुआ था। ट्रस्ट्स ने यह भी कहा कि जुलाई 2025 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने भी कंपनी को अनलिस्टेड रखने के पक्ष में प्रस्ताव पारित किए थे।
लिस्टिंग से बदल सकता है टाटा सन्स का ढांचा-
टाटा सन्स की संभावित लिस्टिंग को समूह के स्वामित्व और संचालन व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में विश्लेषकों के हवाले से कहा गया है कि लिस्टिंग होने पर टाटा सन्स का मूल्यांकन 120 अरब डॉलर से अधिक हो सकता है। ऐसी स्थिति में यह भारत के बड़े आईपीओ में शामिल हो सकता है। हालांकि, लिस्टिंग का अंतिम स्वरूप और इसके प्रभाव नियामकीय प्रक्रिया और कंपनी के फैसलों पर निर्भर करेंगे।
नोएल टाटा ने कानूनी चुनौती की बात कही-
नोएल टाटा ने बोर्ड बैठक के दौरान कहा कि चेयरमैन पद को लेकर लिया गया फैसला ऐसे शेयरधारक की ओर से कानूनी चुनौती के दायरे में आ सकता है, जो इसे चुनौती देना चाहे। टाटा ट्रस्ट्स ने भी चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव को टाटा सन्स के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के प्रावधानों के मद्देनजर वैध नहीं माना है।
कौन हैं एन चंद्रशेखरन-

एन चंद्रशेखरन टाटा परिवार से बाहर के पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने टाटा सन्स का नेतृत्व किया। रतन टाटा ने उन्हें इस पद के लिए चुना था। चंद्रशेखरन ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) में करीब तीन दशक बिताए और आठ साल तक कंपनी के CEO रहे। उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे क्षेत्रों में विस्तार किया। उनके कार्यकाल में समूह की कई बड़ी कंपनियों के कारोबार और मुनाफे में भी वृद्धि हुई।
चंद्रशेखरन के सामने कई बड़ी चुनौतियां-
पिछले एक साल में टाटा समूह को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इनमें एयर इंडिया से जुड़ा विमान हादसा, जगुआर लैंड रोवर पर साइबर हमला और आईटी क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी बदलती परिस्थितियां शामिल हैं। इसके अलावा टाटा समूह भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण से जुड़ी अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं को आगे बढ़ा रहा है।
टाटा परिवार में पहले भी सामने आए मतभेद-
टाटा ट्रस्ट्स और उसके सदस्यों के बीच मतभेद की खबरें पहले भी सामने आती रही हैं। निक्केई एशिया ने नवंबर 2025 में टाटा ट्रस्ट्स के भीतर मतभेदों को लेकर रिपोर्ट प्रकाशित की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, टाटा ट्रस्ट्स के बोर्ड सदस्य मेहली मिस्त्री ने नोएल टाटा को एक पत्र भेजकर संगठन से अलग होने की घोषणा की थी। मिस्त्री ने अपने पत्र में रतन टाटा के विजन और संस्थागत मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का भी उल्लेख किया था।
अब आगे क्या होगा-
टाटा सन्स में चेयरमैन के कार्यकाल और कंपनी की लिस्टिंग को लेकर बोर्ड और टाटा ट्रस्ट्स के रुख में अंतर साफ दिखाई दे रहा है। एक तरफ बोर्ड ने चंद्रशेखरन के कार्यकाल को बढ़ाने और लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया है, वहीं टाटा ट्रस्ट्स ने दोनों मुद्दों पर आपत्ति जताई है। ऐसे में आगे की कानूनी और नियामकीय प्रक्रिया यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि टाटा सन्स की नेतृत्व व्यवस्था और लिस्टिंग को लेकर विवाद किस दिशा में जाता है।
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