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‘वोट चोरी’ का राग अलापना है, तो ठोस ढंग से क्यों नहीं…?  

Opinion: 'वोट चोरी' का राग अलापना है, तो ठोस ढंग से क्यों नहीं...?  
Opinion: विपक्ष, खासकर कांग्रेस पार्टी एक बार फिर ‘वोट चोरी’ का राग गाने लगी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी जो तेवर दिखा रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस यूपी, उत्तराखंड, पंजाब आदि राज्यों के विधानसभा चुनावों और यहां तक कि आगामी लोकसभा चुनाव में भी इस राग को अलापने के मूड में है।हालांकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी के पास रणनीतिकारों एवं सलाहकारों की भारी-भरकम फौज हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक देश में इतना तो कहा ही जा सकता है कि यदि आप कोई राग गाना चाहते हैं, तो शौक से गाइये और सुनाइये, लेकिन इसमें दो बातों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।पहली बात यह कि एक ही राग को बार-बार सुनाया जाए, तो लोग उससे ऊब जाते हैं।दूसरी खास बात यह देखनी होती है कि साज-बाज राग के मुताबिक है या नहीं? ऐसा न होने पर पर राग बेसुरा लगता है।

ठोस तथ्यों के आधार पर कही बात का ही वजन

कहने का मतलब यह है कि लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने हिसाब से रणनीति अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन कोई भी रणनीति तभी कारगर हो पाती है, जब वह जनता की समझ में आ जाए या जनता उससे सहमत हो जाए।चुनाव आयोग की कमियों को लेकर सवाल उठाना राजनीतिक पार्टियों का लोकतांत्रिक अधिकार है, कुछ भी गलत होने पर वे आयोग को सवालों के कटघरे में खड़ा कर सकती हैं, लेकिन जनता किसी भी बात पर तभी सहमत होती है, जब वह ठोस तथ्यों के साथ सामने रखी जाए।यहां यह याद दिलाना समीचीन होगा कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ भी विपक्षी पार्टियों ने जमकर बवाल माचाया था, लेकिन अहम सवाल यह है कि एसआईआर के खिलाफ सर्वोच्च अदालत के समक्ष जो आपत्तियां रखी गई, वे सबकी सब कैसे खारिज हो गई? अदालत ने न सिर्फ एसआईआर को जरूरी माना, बल्कि चुनाव आयोग के फार्म 6 में जोड़े गए एक अतिरिक्त घोषणा पत्र को भी वैध करार दिया।इसीलिए कहते हैं कि किसी भी बात के गहरे मायने तभी हैं, जब वह ठोस ढंग से कही जाए।कोई भी राग तभी कर्णप्रिय लगता है, जब वह पूरी तैयारी के साथ गाया जाए, वर्ना ऑडियंस भला क्यों आपके गाने पर तालियां बजाए? 

 Opinion: क्या ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर जनसमर्थन हासिल हो सकेगा? 

इस बार विपक्ष ने एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है। उसका आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण में चुनाव आयोग के दो अन्य आयुक्तों सुखवीर सिंह संधू और विवेक जोशी की आपत्तियों को नजरअंदाज किया, जिससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हुई।विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त की गिरफ्तारी की मांग कर रहा है।यदि कोई अधिकारी दोषी साबित हो जाता है, तो उसे सजा भी मिल सकती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या चुनाव आयुक्तों की सहमतियों या असहमतियों को मुद्दा बनाकर चुनाव मैदान में जाने की रणनीति से ऐसा कुछ विशेष हासिल हो सकेगा, जैसा कि राहुल गांधी का इरादा लगता है ? क्या वे इस आधार पर व्यापक जनसमर्थन हासिल करने में सफल हो पाएंगे? खासकर उस स्थिति में जबकि चुनाव आयोग स्पष्ट कर चुका है कि विचार-विमर्श के दौरान सदस्यों की अलग-अलग राय होना सामान्य बात है और सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

कहीं बेसुरा साबित न हो जाए ये राग?

हालांकि राहुल गांधी जिस मुद्दे को चुनावी हथियार बनाने की रणनीति में दिखाई देते हैं, उसकी धार आगामी चुनावों तक कितनी पैनी रह पाएगी, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन सवाल अभी से उठने लगे हैं कि जब मुख्य चुनाव आयुक्त ने दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां नहीं सुनी थी, तो उन्होंने क्यों अपनी तरफ से ठोस कदम नहीं उठाए? जब वे बहुमत में थे, तो उनके बिना अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त कैसे कोई महत्वपूर्ण फैसले ले पाते? क्या चुप रहने के अलावा उनके पास कोई और रास्ता नहीं था? जानकार तो यह भी कह रहे हैं कि यदि उनकी आपत्तियां दरकिनार की गई थी, तो वे राष्ट्रपति के पास जा सकते थे। जाहिर है कि चुनाव आयोग के भीतर की सहमतियों या असहमतियों को मुद्दा बनाकर चुनाव मैदान में जाने की रणनीति तभी सफल हो पाएगी जब इसके लिए प्रामाणिक साक्ष्यों के साथ बात रखी जाए? क्या कांग्रेस के रणनीतिकार ऐसा कर पाएंगे? यदि नहीं तो ‘वोट चोरी’ का राग बेसुरा साबित होना निश्चित है।राग बेसुरा ही साबित नहीं होगा, बल्कि कांग्रेस पर चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की छवि धूमिल करने का आरोप भी चस्पा हो जाएगा।