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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर क्यों उठ रहे सवाल? सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पुराने केस तक समझें पूरा विवाद

ज्ञानेश कुमार पर पांच बड़े आरोप
ज्ञानेश कुमार पर पांच बड़े आरोप

Gyanesh Kumar Controversy: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। दिल्ली से मुंबई तक उनके खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। इसी बीच केरल सरकार ने ज्ञानेश कुमार से जुड़े करीब 20 साल पुराने मामले की दोबारा जांच के आदेश दिए हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके खिलाफ दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई की और चुनाव आयोग से लगाए गए आरोपों पर जवाब मांगा है।आखिर ज्ञानेश कुमार पर इतने सवाल क्यों उठ रहे हैं? उनके खिलाफ मुख्य आरोप क्या हैं और क्या उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ सकता है? आइए, इस पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं।

Gyanesh Kumar Controversy: सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाओं पर सुनवाई

5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में ज्ञानेश कुमार से जुड़े दो मामलों पर सुनवाई हुई। पहली याचिका में मांग की गई कि उनके द्वारा कथित तौर पर अकेले लिए गए 14 फैसलों को रद्द किया जाए और पूरे मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल यानी एसआईटी बनाई जाए।दूसरी याचिका में मांग की गई कि जांच पूरी होने तक ज्ञानेश कुमार को निलंबित किया जाए। इसके अलावा चुनाव आयोग के दस्तावेजों की जांच करने और यह स्पष्ट करने की मांग की गई कि चुनाव आयोग के फैसले अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं ले सकते।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल अखबार में छपी खबर के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित नहीं किया जा सकता। ऐसा करने से आयोग का काम प्रभावित हो सकता है। उन्होंने सवाल किया कि ऐसी स्थिति में चुनाव कौन करवाएगा?हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। केंद्र सरकार से भी अपना पक्ष रखने को कहा गया है।

फॉर्म-6 में बदलाव पर भी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फॉर्म-6 में किए गए बदलाव उसकी मंजूरी से नहीं हुए हैं। फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नया नाम जुड़वाने के लिए किया जाता है।इस फॉर्म में एक सवाल जोड़े जाने का आरोप है। इसमें आवेदक से पूछा गया कि क्या उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर में शामिल था।

इलेक्शन कमिश्नर डॉ. सुखबीर संधू, चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार और इलेक्शन कमिश्नर डॉ. विवेक जोशी
इलेक्शन कमिश्नर डॉ. सुखबीर संधू, चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार और इलेक्शन कमिश्नर डॉ. विवेक जोशी
Gyanesh Kumar Controversy: 20 साल पुराने मामले की फिर जांच

केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने ज्ञानेश कुमार से जुड़े करीब 20 साल पुराने मामले में विजिलेंस एंड एंटी करप्शन ब्यूरो यानी वीएसीबी को जांच के आदेश दिए हैं। यह मामला सड़क परियोजना में कथित भ्रष्टाचार और मलेशियाई चीफ इंजीनियर ली सी बेन की आत्महत्या से जुड़ा है।ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं। साल 2006 में वह केरल के लोक निर्माण विभाग के सचिव थे। उस समय अंगामली से तिरुवनंतपुरम तक मुख्य सड़क के अपग्रेडेशन के लिए 215 करोड़ रुपये मंजूर किए गए थे।

इस प्रोजेक्ट का ठेका इंडो-मलेशियन कंपनी पाटी-बेल को मिला था। परियोजना साल 2003 में शुरू हुई थी और अगस्त 2006 तक इसे पूरा किया जाना था। हालांकि, तय समय तक सिर्फ 30 फीसदी काम ही पूरा हो पाया था। इसी दबाव के बीच ली सी बेन मलेशिया चले गए और वहां उन्होंने आत्महत्या कर ली।चेन्निथला के मुताबिक, ली सी बेन के सुसाइड नोट में ज्ञानेश कुमार का नाम लिखा था। उस समय जांच के दौरान कुमार को पीडब्ल्यूडी सचिव के पद से हटा दिया गया था। अब केरल सरकार ने इस मामले की दोबारा जांच शुरू करने का फैसला किया है।

दिल्ली से मुंबई तक विरोध प्रदर्शन

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन भी हो रहे हैं।मुंबई के शिवाजी पार्क में 2 अक्टूबर को सीजेपी की ओर से उनके इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया गया। इसमें नसीरुद्दीन शाह और विशाल भारद्वाज समेत कई सेलिब्रिटी और हजारों लोग शामिल हुए।दीपके ने कहा है कि अगर ज्ञानेश कुमार ने इस्तीफा नहीं दिया तो 10 अक्टूबर को देशभर से कॉकरोच दिल्ली पहुंचेंगे।

Gyanesh Kumar Controversy: दिल्ली में भी निकला सिटिजन्स मार्च

दिल्ली के जंतर-मंतर पर अक्टूबर में सिटिजन्स मार्च आयोजित किया गया। इसमें एसएफआई और आइसा जैसे छात्र संगठनों के अलावा आम आदमी पार्टी के नेता तथा योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे एक्टिविस्ट भी शामिल हुए।2 से 8 अक्टूबर तक हर जिले में मजिस्ट्रेट कार्यालय के सामने इंडिया ब्लॉक की ओर से सेव डेमोक्रेसी मार्च निकाला जा रहा है। 6 अक्टूबर को विपक्षी दलों के सांसद चुनाव आयोग के कार्यालय तक मार्च निकालने वाले हैं।

Gyanesh Kumar Controversy: 14 फैसलों को लेकर भी उठे सवाल

23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के दो आयुक्तों डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने एसआईआर को लेकर पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की थी। इनमें दो बार उन्होंने कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को भी पत्र लिखा था।इन आपत्तियों के आधार पर ज्ञानेश कुमार पर पांच बड़े आरोप लगाए जा रहे हैं।

पहला आरोप: फॉर्म-6 में कथित गैरकानूनी बदलाव

नए मतदाता पंजीकरण फॉर्म में बिना कानूनी नियमों में बदलाव किए एसआईआर से जुड़ा सवाल जोड़े जाने का आरोप है। इसमें पूछा गया कि आवेदक या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर में था या नहीं।13 अगस्त को संधू ने कहा था कि फॉर्म-6 में जोड़ा गया यह सवाल अनधिकृत और गैरकानूनी है और इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। हालांकि, 21 सितंबर तक यह सवाल फॉर्म में मौजूद रहा।फॉर्म-6 मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 से जुड़ा कानूनी फॉर्म है। इसमें बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।

दूसरा आरोप: बाकी आयुक्तों की जानकारी के बिना फैसले

आरोप है कि एसआईआर के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और दोबारा बहाल करने से जुड़े कुछ फैसले डॉ. संधू और डॉ. जोशी की जानकारी के बिना लिए गए।इसके चलते 30 प्रदेशों में 13 करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए जाने की बात कही गई है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुसार, आयोग को जहां तक संभव हो, अपने फैसले सर्वसम्मति से लेने चाहिए। अगर आयुक्तों की राय अलग हो तो फैसला बहुमत के आधार पर लिया जाता है। तीनों आयुक्तों के वोट का अधिकार बराबर होता है।इस समय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त डॉ. विवेक जोशी हैं।

तीसरा आरोप: स्थानीय अधिकारियों की डेटाबेस तक पहुंच घटाई

चुनाव आयोग की दिल्ली स्थित आईटी डिवीजन के जरिए मतदाता सूची के डेटाबेस ईसीआईनेट, जिसे पहले ईआरओनेट कहा जाता था, को ज्यादा केंद्रीकृत करने का आरोप लगाया गया है।आरोप है कि इससे जमीनी स्तर पर काम करने वाले इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर यानी ईआरओ की डेटाबेस तक पहुंच सीमित हो गई।मई में विवेक जोशी ने लिखा था कि मतदाता सूची का डेटाबेस धीरे-धीरे केंद्रीकृत किया जा रहा है। अगस्त में संधू ने कहा कि कई राज्यों के चुनाव अधिकारियों को ईआरओनेट पोर्टल की पूरी पहुंच नहीं मिल रही है।संधू ने आयोग की आईटी डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना पर डेटाबेस की पहुंच और अधिकारियों की कानूनी शक्तियां कम करने का आरोप भी लगाया।

Gyanesh Kumar Controversy: मुंबई में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जुटे हजारों लोग
मुंबई में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जुटे हजारों लोग
चौथा आरोप: पश्चिम बंगाल में 16.1 लाख अपीलें किसने दायर कीं?

पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान करीब 60 लाख मतदाताओं की जानकारी का मिलान नहीं हो पाया था। इनमें से 27 लाख नाम हटाए गए। इन मामलों की सुनवाई कर रहे ट्रिब्यूनल्स के पास पिछले महीने तक 38 लाख अपीलें लंबित थीं।इनमें 22.21 लाख अपीलें मतदाताओं की ओर से अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए की गई थीं। वहीं 16.1 लाख अपीलें उन मतदाताओं के खिलाफ थीं, जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने मतदाता सूची में शामिल किया था। यानी इन अपीलों के जरिए इन मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई थी।संधू, जोशी और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल को इन 16.1 लाख अपीलों के बारे में जानकारी नहीं थी। संधू ने सवाल उठाया कि ये अपीलें चुनाव आयोग की ओर से किसने दायर कीं और इसकी अनुमति किसने दी थी।

पांचवां आरोप: गोवा में योग्य मतदाताओं के नाम हटे

सुप्रीम कोर्ट ने लॉजिकल गड़बड़ी वाले मतदाताओं को दस्तावेज जमा करने और अंतिम मतदाता सूची जारी होने से पहले अपना पक्ष रखने का मौका देने का आदेश दिया था।गोवा में ऐसे 97 मतदाता मिले, जो अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के योग्य थे। लेकिन सॉफ्टवेयर में उनके नाम दोबारा जोड़ने का कोई विकल्प नहीं था।11 से 17 फरवरी के बीच गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने आठ बार पत्र लिखकर सॉफ्टवेयर में रोलबैक का विकल्प उपलब्ध कराने की मांग की। हालांकि, ऐसा नहीं किया जा सका।

Gyanesh Kumar Controversy: चुनाव आयोग ने आरोपों पर क्या कहा?

चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को जारी प्रेस नोट में कहा कि उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि एसआईआर के लिए फॉर्म-6 के साथ लगाए गए घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है।

Gyanesh Kumar Controversy: इंडिया ब्लॉक का 8 अक्टूबर तक सेव डेमोक्रेसी मार्च
इंडिया ब्लॉक का 8 अक्टूबर तक सेव डेमोक्रेसी मार्च
क्या ज्ञानेश कुमार को हटाया जा सकता है?

साल 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से जुड़ा एक कानून बनाया गया था। इसके तहत चुनाव आयुक्तों को कानूनी सुरक्षा दी गई है। पद पर रहते हुए उनके किसी काम या बयान को लेकर उनके खिलाफ आपराधिक मामला चलाने से उन्हें सुरक्षा मिलती है।ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया अपनानी होगी। अप्रैल 2026 में विपक्ष ने इसके लिए नोटिस दिया था, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने इसे स्वीकार नहीं किया था।

अब विपक्ष एक बार फिर इसकी तैयारी कर रहा है। अगर महाभियोग का नोटिस स्वीकार होता है तो सबसे पहले एक जांच समिति बनाई जाएगी। समिति की रिपोर्ट के आधार पर सदन में वोटिंग होगी।अगर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दो-तिहाई बहुमत से वोट पड़ते हैं, तभी महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़कर उन्हें पद से हटाने तक पहुंच सकती है। फिलहाल विपक्ष के पास दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत नहीं है।

Gyanesh Kumar Controversy: कानूनी विशेषज्ञ ने क्या कहा?

केरल में शुरू हुई जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट मयंक अरोरा का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त या इस तरह के किसी पद को मिली कानूनी सुरक्षा केवल उन कामों पर लागू होती है, जो उन्होंने अपनी आधिकारिक जिम्मेदारी निभाते हुए किए हों।उनके मुताबिक, अगर किसी गंभीर अपराध का मामला है और उसमें तीन साल से ज्यादा की सजा का प्रावधान है, तो उस मामले में सजा हो सकती है।सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर मयंक अरोरा ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले पूरा चुनाव आयोग नहीं होते। अगर कोई असंवैधानिक काम हुआ है तो सुप्रीम कोर्ट उस मामले में कार्रवाई कर सकता है।