Election Commission: चुनाव आयोग पर कथित ‘वोट चोरी’ के आरोपों को लेकर देश की राजनीति में लगातार बहस चल रही है। विपक्ष जहां चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है, वहीं सत्तापक्ष समर्थक इस पूरे मुद्दे को विपक्ष की राजनीतिक रणनीति बता रहे हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर समेत अलग-अलग जगहों पर हो रहे प्रदर्शनों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। खबर इंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में लोगों और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखने वाले लोगों से बात की गई, जिसमें चुनाव आयोग, एसआईआर, विपक्षी दलों के प्रदर्शन, वोट चोरी के आरोप और दिल्ली में ट्रैफिक की समस्या जैसे कई मुद्दों पर चर्चा हुई।
Election Commission: विपक्ष के पास मुद्दों की कमी का आरोप
चुनाव आयोग को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर एक पक्ष का कहना है कि विपक्ष के पास अब कोई ठोस राजनीतिक मुद्दा नहीं बचा है। पहले महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उसके केंद्र में रहते थे, लेकिन अब इन्हीं मुद्दों की जगह चुनाव आयोग और वोट चोरी का आरोप प्रमुख हो गया है। उनका दावा है कि विपक्ष सत्ता में वापस आने के लिए इस तरह के मुद्दों को उठा रहा है।इसी दौरान विपक्ष से यह सवाल भी पूछा गया कि अगर उसे चुनाव आयोग पर भरोसा नहीं है तो जिन सीटों पर उसके उम्मीदवार चुनाव जीतकर आए हैं, वहां के नतीजों पर भी सवाल क्यों नहीं उठाए जाते। तर्क दिया गया कि केरल और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में विपक्ष की जीत के बाद चुनाव आयोग सही माना जाता है, जबकि हार होने पर उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाते हैं।
इस्तीफे की मांग पर सवाल
चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर भी सवाल उठाए गए। कहा गया कि यदि विपक्ष को चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है तो राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और डिंपल यादव समेत उन नेताओं को पहले अपनी-अपनी सीटों से इस्तीफा देना चाहिए, जिन्होंने चुनाव आयोग की प्रक्रिया से हुए चुनाव में जीत हासिल की है।यह सवाल भी उठाया गया कि अगर चुनाव आयोग को गलत मानते हुए वोट चोरी से जीतने का आरोप लगाया जा रहा है, तो फिर उन राज्यों की सरकारों को भी इस्तीफा देना चाहिए जहां विपक्षी दल इसी चुनाव प्रक्रिया के जरिए सत्ता में आए हैं।
Election Commission: चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर चर्चा
चुनाव आयोग को लेकर यह तर्क दिया गया कि यह किसी सरकार के नियंत्रण में काम करने वाली संस्था नहीं है। इसे एक संवैधानिक संस्था बताते हुए कहा गया कि आयोग संविधान के तहत अपनी जिम्मेदारी निभाता है और उसके कामकाज में सरकार का सीधा हस्तक्षेप नहीं होता।इस संदर्भ में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों का भी उल्लेख किया गया। एमएस गिल, बीएस रमा देवी, सुकुमार सेन और टीएन शेषन जैसे नामों का जिक्र करते हुए कहा गया कि अलग-अलग दौर में चुनाव आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। यह भी कहा गया कि पूर्व चुनाव आयुक्तों को बाद में अलग-अलग संवैधानिक या सरकारी पद मिलने के उदाहरण रहे हैं।
एसआईआर को लेकर भी उठे सवाल
एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भी चर्चा हुई। इसमें कहा गया कि इससे पहले भी कई वर्षों में एसआईआर की प्रक्रिया अपनाई जा चुकी है। 1952, 1957, 1961, 1965 और 1983-84 में भी ऐसी प्रक्रिया का जिक्र किया गया।इस तर्क के जरिए सवाल उठाया गया कि पहले एसआईआर होने पर किसी तरह की आपत्ति क्यों नहीं जताई गई और अब इस प्रक्रिया को लेकर विरोध क्यों किया जा रहा है। आरोप लगाया गया कि मौजूदा एसआईआर के दौरान फर्जी या गलत मतदाताओं के नाम हटाए जाने की वजह से विपक्ष इसका विरोध कर रहा है।हालांकि, ये सभी बातें कार्यक्रम में रखे गए पक्ष और दावों के रूप में सामने आईं।
Election Commission: सोनिया गांधी और नवीन चावला का भी जिक्र
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर चर्चा के दौरान सोनिया गांधी और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला का भी जिक्र किया गया। आरोप लगाया गया कि करीब 15-16 वर्ष पहले सोनिया गांधी की भूमिका को लेकर नवीन चावला की नियुक्ति पर सवाल उठाए गए थे।इस बात पर जोर दिया गया कि सोनिया गांधी उस समय केंद्र सरकार में किसी संवैधानिक पद पर नहीं थीं, बल्कि कांग्रेस की अध्यक्ष थीं। इसी आधार पर यह सवाल उठाया गया कि किसी चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में उनकी भूमिका किस आधार पर बताई गई।
बैलेट पेपर की मांग पर भी चर्चा
विपक्ष की ओर से बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग को लेकर भी सवाल उठाए गए। कहा गया कि महाराष्ट्र में पिछली बार बैलेट पेपर से चुनाव होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली थी। इसलिए केवल बैलेट पेपर को वोट चोरी की समस्या का समाधान बताना उचित नहीं है।यह भी कहा गया कि 2004 से पहले और उससे भी पहले देश में बैलेट पेपर के जरिए चुनाव होते रहे हैं और उस समय भी अलग-अलग दल चुनाव जीतते रहे हैं।
Election Commission: राहुल गांधी के बयानों पर निशाना
कार्यक्रम में राहुल गांधी के कई राजनीतिक बयानों को लेकर भी टिप्पणी की गई। उन पर कभी ‘वोट चोरी’, कभी संविधान खतरे में होने और कभी दूसरे मुद्दों को लेकर बयान देने का आरोप लगाया गया।इसी संदर्भ में इंदिरा गांधी के चुनाव को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रद्द किए जाने और उसके बाद देश में लगाई गई इमरजेंसी का भी उल्लेख किया गया। कहा गया कि उस समय बड़े पैमाने पर लोगों को जेल में डाला गया था, फिर भी उस दौर को संविधान के लिए खतरे के तौर पर उसी तरह नहीं देखा गया जैसा आज के राजनीतिक विवादों में कहा जा रहा है।कार्यक्रम में राहुल गांधी के परिवार की राजनीतिक विरासत का जिक्र करते हुए यह टिप्पणी भी की गई कि विरासत से सत्ता या पद मिल सकता है, लेकिन बुद्धि नहीं मिलती।
दिल्ली के प्रदर्शन से आम लोगों को परेशानी
जंतर-मंतर और दिल्ली में हो रहे प्रदर्शनों को लेकर भी सवाल उठाए गए। प्रदर्शन को संवैधानिक अधिकार मानते हुए कहा गया कि हर नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए कानून और प्रशासन की अनुमति का पालन करना जरूरी है।कहा गया कि यदि किसी इलाके में धारा 163 लागू है या प्रशासन की अनुमति नहीं मिली है, तो वहां लगातार प्रदर्शन करने से आम लोगों को परेशानी हो सकती है। बार-बार सड़कें बाधित होने से ट्रैफिक जाम, नौकरी पर जाने वाले लोगों और बच्चों समेत आम नागरिकों को दिक्कत होने की बात कही गई।
Election Commission: प्रदर्शन के तरीके पर आपत्ति
प्रदर्शनकारियों के खिलाफ यह तर्क भी दिया गया कि पुलिस से अनुमति लेकर निर्धारित समय और स्थान पर प्रदर्शन किया जा सकता है। लेकिन रोजाना सड़कों को रोकना, कानून व्यवस्था प्रभावित करना या पुलिस के साथ टकराव की स्थिति पैदा करना संवैधानिक अधिकार की सीमा में नहीं आता।यह भी कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से किसी स्थान पर अनावश्यक धरने को लेकर आदेश दिए जाने के बावजूद वहां लगातार प्रदर्शन करना उचित नहीं है।
प्रदर्शन में शामिल संगठनों पर आरोप
चर्चा में सीजेपी से जुड़े प्रदर्शन और उसमें शामिल लोगों को लेकर भी कई आरोप लगाए गए। कुछ लोगों को विपक्ष का ‘मोहरा’ बताते हुए दावा किया गया कि वे राजनीतिक दलों के समर्थन में काम कर रहे हैं।नेहा बोरा और अभिजीत देवके जैसे नामों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उनके प्रदर्शनों के समय को लेकर भी एकरूपता नहीं दिखाई देती। किसी पोस्ट में दोपहर 3 बजे तो किसी में 5 बजे प्रदर्शन के लिए बुलाए जाने का दावा किया गया। इसी आधार पर प्रदर्शन के आयोजन और तालमेल पर सवाल उठाए गए।इन लोगों पर विदेशी फंडिंग और राजनीतिक समर्थन से काम करने जैसे आरोप भी लगाए गए, हालांकि कार्यक्रम में इन आरोपों के समर्थन में कोई दस्तावेज या स्वतंत्र प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।
Election Commission: जंतर-मंतर प्रदर्शन में भीड़ को लेकर दावा
जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन में करीब 10 हजार लोगों के शामिल होने का दावा किया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि इनमें से लगभग 2,873 लोगों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें हत्या और मारपीट जैसे आरोपों वाले मामले भी शामिल हैं।यह दावा भी कार्यक्रम में मौजूद पक्ष की ओर से किया गया और इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए जाने की जानकारी नहीं दी गई।
चुनावी जीत और वोट चोरी पर सवाल
वोट चोरी के आरोप को लेकर यह सवाल भी उठाया गया कि अगर चुनाव में धांधली हुई है तो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दलों की जीत कैसे हुई। उदाहरण के तौर पर केरल में कांग्रेस की सरकार बनने और तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी की जीत का उल्लेख किया गया।इसी तर्क के आधार पर कहा गया कि एक ही चुनाव प्रणाली से किसी जगह जीत मिलने पर आयोग को सही और किसी जगह हारने पर गलत बताना दोहरा रवैया है।
Election Commission: छात्र चुनावों को लेकर भी टिप्पणी
कॉलेज और विश्वविद्यालय के चुनावों को लेकर भी ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर कटाक्ष किया गया। कहा गया कि अगर हर चुनाव में वोट चोरी हो रही है तो छात्र संगठनों के चुनावों में भी इसी तरह के आरोप लगाए जा सकते हैं।कार्यक्रम में ज्ञानेश कुमार के समर्थन में यह दावा किया गया कि वह किसी एक संगठन के नहीं, बल्कि जनता के साथ हैं। यह भी कहा गया कि उन्हें विपक्ष की ओर से केवल राजनीतिक मुद्दा बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का मुद्दा
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का भी उल्लेख किया गया। इस पर कहा गया कि उनका इस्तीफा किसी छात्र संगठन के दबाव में नहीं, बल्कि उनकी अपनी जिम्मेदारी और सरकार के निर्णय के तहत हुआ।यह दावा भी किया गया कि सरकार ने शिक्षा मंत्री के पद पर अपनी पसंद के व्यक्ति को नियुक्त किया, जबकि विरोध करने वाले संगठनों को उस नियुक्ति पर भी आपत्ति थी।
Election Commission: विपक्ष पर सत्ता की राजनीति का आरोप
कार्यक्रम में यह आरोप लगाया गया कि विपक्ष का मुख्य उद्देश्य सत्ता में वापस आना है। इसके लिए अलग-अलग मुद्दों को उठाया जा रहा है और चुनाव आयोग पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।विपक्षी दलों के गठबंधन को लेकर भी टिप्पणी की गई और कहा गया कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी तथा अन्य विपक्षी दल अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही राजनीतिक अभियान का हिस्सा हैं। इसी संदर्भ में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और आने वाले चुनावों में संभावित राजनीतिक प्रचार का भी उल्लेख किया गया।
प्रदर्शन और आम जनता की परेशानी
दिल्ली में लगातार प्रदर्शन होने से आम लोगों की परेशानी पर भी चर्चा हुई। कहा गया कि जंतर-मंतर जैसे इलाकों में बार-बार सड़कें बाधित होने से यातायात प्रभावित होता है। लोगों को अपने काम पर जाने, आने-जाने और रोजमर्रा की गतिविधियों में परेशानी का सामना करना पड़ता है।यह भी कहा गया कि प्रदर्शन का अधिकार सभी को है, लेकिन इसे कानून के दायरे में रहकर किया जाना चाहिए। बिना अनुमति के लगातार प्रदर्शन करने से आम नागरिकों को होने वाली परेशानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
Election Commission: राजनीतिक आरोपों के बीच अलग-अलग दावे
पूरे मामले में एक पक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे वोट चोरी के आरोप राजनीतिक उद्देश्य से लगाए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर विपक्ष इन आरोपों के आधार पर चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े सवाल उठा रहा है।कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि एसआईआर के जरिए मृत मतदाताओं और कथित फर्जी मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। इसी वजह से विपक्ष के विरोध करने का आरोप लगाया गया। हालांकि, इन दावों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं।









