CJP PROTEST NEWS: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो और इंटरनेट सेवाएं बहाल रखने, लोगों की आवाजाही सामान्य करने और कानूनी प्रक्रिया के बिना हिरासत नहीं लेने के निर्देश दिए। CJP के तीन नेता करीब 23 घंटे बाद रिहा हुए। जानिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार क्या है, पुलिस किन परिस्थितियों में कार्रवाई कर सकती है और BNSS की धाराएं 126, 163 और 170 क्या कहती हैं।
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन को लेकर पुलिस की कार्रवाई और मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। प्रदर्शन के दौरान लोगों को हिरासत में लेने, इंटरनेट सेवाएं रोकने और आवाजाही पर पाबंदियां लगाने को लेकर दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि दिल्ली में मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए, इंटरनेट बहाल रहना चाहिए और लोगों की आवाजाही कानून के मुताबिक जारी रहनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी को हिरासत में न लिया जाए। खासकर उन लोगों के मामले में, जो प्रतिबंधित क्षेत्र से बाहर शांतिपूर्ण और बिना हथियार के प्रदर्शन कर रहे हों। दूसरी ओर, CJP के नेता अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को करीब 23 घंटे हिरासत में रखने के बाद रविवार सुबह रिहा कर दिया गया। ऐसे में सवाल है कि संविधान शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है, तो पुलिस प्रदर्शनकारियों को हिरासत में कब ले सकती है?
1. क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है?
भारतीय संविधान नागरिकों को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार मिलता है। इसका अर्थ है कि नागरिक सरकार की नीतियों, प्रशासनिक फैसलों या संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठा सकते हैं। वे अपनी मांगों के समर्थन में धरना, सभा या मार्च भी कर सकते हैं।
हालांकि, यह अधिकार असीमित नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 19(3) सार्वजनिक व्यवस्था सहित निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है। इसलिए प्रदर्शन का अधिकार होने का मतलब यह नहीं है कि किसी भी स्थान पर, किसी भी समय और किसी भी तरीके से प्रदर्शन किया जा सकता है। किसी प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने या प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए लागू कानून और परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं। केवल सरकार या किसी अधिकारी की आलोचना करना अपने आप में हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
CJP PROTEST NEWS: 2. फिर पुलिस प्रदर्शनकारियों को हिरासत में क्यों लेती है?
पुलिस सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और संभावित हिंसा को रोकने के लिए कार्रवाई कर सकती है। यदि किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा की आशंका हो, कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा हो या किसी वैध आदेश का उल्लंघन किया जा रहा हो, तो परिस्थितियों के अनुसार पुलिस हस्तक्षेप कर सकती है। लेकिन एहतियातन हिरासत का इस्तेमाल केवल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि कोई व्यक्ति सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है। पुलिस को संबंधित कानून की शर्तों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है।
दिल्ली मामले में पुलिस के मुताबिक, CJP के नेता अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 170 के तहत एहतियातन हिरासत में लिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार पर सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट में इन कार्रवाइयों की वैधता और पहले दिए गए आदेश के पालन को लेकर सवाल उठे हैं। हालांकि, अदालत का नोटिस जारी करना अपने आप में अधिकारियों को अवमानना का दोषी ठहराना नहीं है। इस पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही निकलेगा।

3. BNSS की धारा 163 क्या है? क्या इससे प्रदर्शन रोका जा सकता है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत सक्षम कार्यकारी मजिस्ट्रेट कुछ परिस्थितियों में तत्काल खतरे, सार्वजनिक शांति भंग होने या अन्य निर्धारित जोखिमों को रोकने के लिए आदेश जारी कर सकते हैं। ऐसे आदेशों का दायरा, क्षेत्र और अवधि परिस्थितियों तथा कानून के मुताबिक तय होते हैं। इस धारा के तहत किसी इलाके में लोगों के एकत्र होने या कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि धारा 163 लागू होने की सूचना मिलते ही पूरे शहर में हर प्रकार का प्रदर्शन स्वतः गैरकानूनी हो जाता है। यह देखना जरूरी है कि आदेश किस क्षेत्र में लागू है, उसमें क्या प्रतिबंध लगाए गए हैं और संबंधित व्यक्ति की गतिविधि उस आदेश के दायरे में आती है या नहीं।
दिल्ली मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने परिसर और आसपास धारा 163 लागू होने की सूचना देने वाले बोर्ड या नोटिस, यदि अब तक लगे हों, तो उन्हें हटाने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि प्रतिबंधित क्षेत्र से बाहर शांतिपूर्ण और बिना हथियार के प्रदर्शन कर रहे लोगों को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए।
CJP PROTEST NEWS: 4. BNSS की धाराएं 126 और 170 का क्या मतलब है?
BNSS की धारा 126 का संबंध शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र या मुचलका भरवाने की कार्यवाही से है। सक्षम मजिस्ट्रेट कानून में निर्धारित प्रक्रिया के तहत किसी व्यक्ति से शांति बनाए रखने का बंधपत्र भरवा सकते हैं, यदि आवश्यक कानूनी शर्तें पूरी होती हों। वहीं, धारा 170 कुछ परिस्थितियों में संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए एहतियातन गिरफ्तारी से संबंधित है। इसके लिए भी कानून में निर्धारित आधार और शर्तें पूरी होनी चाहिए। दिल्ली पुलिस के अनुसार, तीनों CJP नेताओं को संबंधित कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। उन्होंने एक साल तक शांति बनाए रखने और अच्छे व्यवहार के लिए 50 हजार रुपये का जमानती मुचलका भरा, जिसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। इसका मतलब यह भी नहीं है कि किसी नए अपराध के आरोप में कार्रवाई नहीं हो सकती। यदि कोई व्यक्ति मुचलके की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो कानून के मुताबिक अलग कार्यवाही हो सकती है।
5. क्या पुलिस मेट्रो बंद और इंटरनेट सेवाएं रोक सकती है?
कानून-व्यवस्था से जुड़ी गंभीर परिस्थितियों में प्रशासन नियमों के तहत परिवहन या संचार सेवाओं पर अस्थायी प्रतिबंध लगा सकता है। लेकिन ऐसे कदमों के लिए कानूनी आधार, सक्षम प्राधिकारी का आदेश और परिस्थितियों के अनुरूप कार्रवाई जरूरी है। दिल्ली में CJP के प्रदर्शन के दौरान 45 मेट्रो स्टेशन बंद किए जाने की खबर सामने आई। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) से बंद और खुले स्टेशनों का नक्शा मांगा। अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि यदि किसी रूट के बीच के स्टेशन बंद कर दिए जाएं, जबकि दोनों छोर खुले रहें, तो यात्रियों के लिए मेट्रो का इस्तेमाल कैसे संभव होगा।

सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि शनिवार रात तक सभी मेट्रो स्टेशन और इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी गई थीं। अदालत ने सेवाएं सामान्य रखने और लोगों की आवाजाही सुचारू बनाए रखने पर जोर दिया। इससे यह सिद्धांत सामने आता है कि सुरक्षा के नाम पर लगाए गए प्रतिबंधों का भी कानूनी आधार होना चाहिए। उनकी आवश्यकता और दायरे पर सवाल उठाए जा सकते हैं।
CJP PROTEST NEWS: 6. सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को नोटिस क्यों दिया?
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए आदेश का शनिवार को पालन नहीं हुआ। इस संबंध में दायर अवमानना याचिका पर अदालत ने केंद्र और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। अदालत ने अधिकारियों से हलफनामा दाखिल करने और पहले के आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट देने को कहा। उनसे यह भी पूछा गया कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए। अंतरिम जवाब देने के लिए मंगलवार तक का समय दिया गया।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कई निहत्थे नागरिकों को हिरासत में लिया गया और कुछ लोगों के साथ मारपीट हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने सुनवाई में अपने साथ कथित दुर्व्यवहार का भी जिक्र किया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और न्यायिक जांच के निष्कर्ष अलग विषय हैं। नोटिस जारी होने का अर्थ यह है कि अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है; इसे अवमानना पर अंतिम फैसला नहीं समझना चाहिए।
7. क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों पर कार्रवाई नहीं हो सकती?
शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार नागरिकों को मनमानी कार्रवाई से सुरक्षा देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रदर्शन के दौरान होने वाले हर काम को कानूनी संरक्षण मिल जाता है। यदि कोई व्यक्ति हिंसा करता है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है, पुलिस पर हमला करता है या किसी वैध आदेश का उल्लंघन करता है, तो परिस्थितियों के अनुसार उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
दिल्ली पुलिस के सूत्रों के मुताबिक, शनिवार के प्रदर्शन को लेकर 20 से अधिक FIR दर्ज की गईं। पुलिस ने कानून हाथ में लेने, सरकारी काम में बाधा डालने और पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट जैसे आरोपों का उल्लेख किया। वहीं, प्रदर्शनकारियों के साथ कथित मारपीट के वायरल वीडियो से जुड़े मामले में चार लोगों की गिरफ्तारी की खबर भी सामने आई।
इन मामलों में किस व्यक्ति की क्या भूमिका थी और कौन-सा आरोप प्रमाणित होता है, इसका फैसला संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा। किसी प्रदर्शन में शामिल होना अपने आप में किसी व्यक्ति को अपराधी साबित नहीं करता।
प्रदर्शन का अधिकार और कानून का पालन, दोनों जरूरी
दिल्ली में CJP के प्रदर्शन से जुड़ा मामला शांतिपूर्ण विरोध, पुलिस की शक्तियों और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल उठाता है। संविधान नागरिकों को अपनी बात रखने और शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार देता है। वहीं, प्रशासन को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून के दायरे में कार्रवाई करने की शक्ति भी प्राप्त है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का प्रमुख संदेश यही है कि लोगों की आवाजाही, मेट्रो और इंटरनेट सेवाओं को सामान्य रखने तथा हिरासत में लेने जैसी कार्रवाई में कानून और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों को भी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए और लागू वैध प्रतिबंधों का पालन करना चाहिए।
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