Poverty Report News: देश की गरीबी के आंकड़ों में सुधार हुआ है, लेकिन करोड़ों लोगों के लिए घर, साफ पानी, स्वच्छता और बेहतर इलाज आज भी चुनौती हैं। सवाल यह है कि गरीबी रेखा पार करने के बाद भी लोगों की जिंदगी में मुश्किलें क्यों बनी हुई हैं?
भारत में गरीबी घटने के आंकड़े सामने आ रहे हैं। विश्व बैंक और नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, बीते वर्षों में आय आधारित और बहुआयामी गरीबी में गिरावट दर्ज की गई है। लेकिन गरीबी की दर कम होने का मतलब यह नहीं कि हर परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो गई है। बड़ी आबादी आज भी कम आय, महंगाई, अस्थिर रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रही है।
वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक से जुड़े आंकड़ों में भी भारत में बड़ी आबादी के सामने मौजूद चुनौतियों का जिक्र है। रिपोर्ट में करीब 23.8 करोड़ लोगों के बुनियादी सुविधाओं से वंचित होने की बात कही गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब गरीबी घट रही है, तो आम लोगों की मुश्किलें क्यों खत्म नहीं हो रहीं?
1. भारत में गरीबी घटने के दावे का आधार क्या है?
गरीबी में गिरावट को समझने के लिए तीन तरह के आंकड़े अहम हैं।विश्व बैंक के आंकड़े: प्रस्तुत रिपोर्ट के मुताबिक, 4.20 डॉलर प्रतिदिन की गरीबी रेखा के आधार पर भारत में गरीबी की दर 2011-12 के 57.7 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 16.1 प्रतिशत रह गई। चरम गरीबी: विश्व बैंक की तीन डॉलर प्रतिदिन वाली अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा के आधार पर 2022-23 में भारत में चरम गरीबी की दर 5.3 प्रतिशत बताई गई। बहुआयामी गरीबी: नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में बहुआयामी गरीबी की दर 2005-06 के 55.3 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत रह गई।
ये आंकड़े गरीबी में आए बदलाव को समझने में मदद करते हैं। हालांकि, अलग-अलग गरीबी रेखाओं और सूचकांकों के आधार पर निकाले गए आंकड़ों की आपस में तुलना करते समय उनके मानक और समयावधि को ध्यान में रखना जरूरी है।
Poverty Report News: 2. गरीबी रेखा पार करने के बाद भी मुश्किलें क्यों?
गरीबी रेखा एक तय मानक है। कोई व्यक्ति इस मानक से ऊपर आ जाए, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी सभी बुनियादी जरूरतें पूरी होने लगी हैं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की आमदनी बढ़ने से वह निर्धारित गरीबी रेखा से ऊपर आ सकता है। लेकिन अगर उसकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन, किराए, बिजली और परिवहन पर खर्च हो जाता है, तो उसके पास इलाज, बच्चों की पढ़ाई और बचत के लिए बहुत कम पैसा बच सकता है। यानी गरीबी रेखा पार करना और आर्थिक रूप से सुरक्षित होना दो अलग-अलग बातें हैं।
3. कमाई और महंगाई के बीच फंसा आम आदमी
रोजगार के आंकड़ों में सुधार होने के बावजूद कमाई और खर्च के बीच का अंतर कई परिवारों के लिए चुनौती बना हुआ है। प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक, नियमित वेतन पाने वाले कर्मचारियों की महंगाई के हिसाब से समायोजित दैनिक आय 2017-18 और 2023-24 में 381 रुपये पर स्थिर रही। इसी अवधि में स्वरोजगार करने वालों की आय 246 रुपये से घटकर 242 रुपये बताई गई, जबकि आकस्मिक श्रमिकों की आय 189 रुपये से बढ़कर 227 रुपये हुई। इन आंकड़ों का संकेत है कि रोजगार में भागीदारी बढ़ने के साथ-साथ आमदनी की गुणवत्ता और वास्तविक क्रय शक्ति पर भी ध्यान देना जरूरी है।
महंगाई बढ़ने पर कम आय वाले परिवारों के पास खर्च घटाने के सीमित विकल्प होते हैं। कई बार उन्हें इलाज, पौष्टिक भोजन या बच्चों की शिक्षा जैसे जरूरी खर्चों में कटौती करनी पड़ती है। इससे गरीबी रेखा से ऊपर आने के बाद भी जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाता।

Poverty Report News: 4. असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की परेशानी क्या है?
देश में बड़ी संख्या में लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनमें दिहाड़ी मजदूर, घरेलू कामगार, छोटे दुकानदार और कई तरह के स्वरोजगार करने वाले लोग शामिल हैं। ऐसे कामगारों को नियमित वेतन, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और नौकरी की सुरक्षा जैसी सुविधाएं अक्सर नहीं मिल पातीं। काम उपलब्ध न होने या बीमारी की स्थिति में उनकी आमदनी अचानक रुक सकती है।
ई-श्रम पोर्टल से जुड़े प्रस्तुत आंकड़ों में पंजीकृत असंगठित श्रमिकों की बड़ी संख्या की मासिक आय 10,000 रुपये से कम बताई गई है। हालांकि, इन आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि पंजीकृत श्रमिकों की आय के आंकड़े पूरे असंगठित क्षेत्र की आय का प्रतिनिधित्व जरूरी नहीं करते। इस तरह कम आमदनी और सामाजिक सुरक्षा की कमी परिवारों को दोबारा गरीबी में जाने के जोखिम में डाल सकती है।
5. 23.8 करोड़ लोगों के बुनियादी सुविधाओं से दूर होने का क्या मतलब है?
गरीबी सिर्फ कम आमदनी का नाम नहीं है। इसका संबंध रहने की स्थिति, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं से भी है। किसी परिवार के पास नियमित आय हो सकती है, लेकिन अगर उसे साफ पीने का पानी, सुरक्षित शौचालय, पक्का घर, बिजली या स्वच्छ ईंधन उपलब्ध नहीं है, तो उसके जीवन स्तर पर इसका असर पड़ता है। इसी वजह से बहुआयामी गरीबी सूचकांक में आय के साथ-साथ कई तरह के अभावों को भी देखा जाता है।
Poverty Report News: 6. क्या गरीबी घटने के बावजूद आर्थिक असुरक्षा बनी हुई है?
हां, गरीबी के आंकड़ों में सुधार और आर्थिक असुरक्षा का एक साथ बने रहना संभव है। अगर किसी परिवार की आय थोड़ी बढ़ती है, लेकिन उसके खर्च, रोजगार की अनिश्चितता और इलाज जैसी जरूरतों का बोझ भी बढ़ता है, तो उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर बनी रह सकती है।
इसी तरह कुपोषण, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और सामाजिक सुरक्षा जैसे संकेतक बताते हैं कि जीवन स्तर को केवल आय के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इसलिए गरीबी में गिरावट के आंकड़ों के साथ यह देखना भी जरूरी है कि लोगों की वास्तविक आय कितनी बढ़ी, रोजगार कितना सुरक्षित हुआ और बुनियादी सुविधाओं तक उनकी पहुंच में कितना सुधार आया।
गरीबी घटने के साथ जीवन स्तर में सुधार भी जरूरी
भारत में गरीबी घटने के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे पूरी तस्वीर नहीं दिखाते। किसी परिवार का गरीबी रेखा से ऊपर आना एक सकारात्मक बदलाव हो सकता है, मगर स्थायी आर्थिक सुरक्षा के लिए पर्याप्त आय, नियमित रोजगार, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं, बेहतर शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता भी जरूरी है। असली चुनौती केवल लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर लाने की नहीं, बल्कि उन्हें दोबारा गरीबी में जाने से बचाने और बेहतर जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराने की भी है।
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