US Tariff News: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े कानून को फिलहाल रोकने का फैसला किया है। इस कदम को भारत के लिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिका की ओर से लगाए जाने वाले संभावित शुल्क का दबाव कम हो सकता है। भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और अपनी जरूरत का 88% से अधिक तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में रूस से तेल की आपूर्ति भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
US Tariff News: रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता
कमोडिटी बाजार का विश्लेषण करने वाली कंपनी केपलर के टैंकर आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में भारत ने रूस से प्रतिदिन करीब 19 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया। यह उस महीने भारत के कुल तेल आयात का 35% से अधिक था। इससे पहले जुलाई में रूस से भारत का तेल आयात बढ़कर प्रतिदिन 28 लाख बैरल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था।
कच्चे तेल की कीमतों को लेकर अमेरिका का दबाव
इस घटनाक्रम से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी डीजल के निर्यात पर रोक लगाने की धमकी दी थी। इसके जरिए उन्होंने जी-7 देशों पर अपने आपातकालीन पेट्रोलियम भंडार से 10 करोड़ बैरल तेल बाजार में जारी करने का दबाव बनाया था।इसके बाद पिछले सप्ताह ट्रंप ने एक अप्रत्याशित कूटनीतिक कदम उठाते हुए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ डीजल से जुड़ा समझौता करने की घोषणा की। इस फैसले ने रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
US Tariff News: अमेरिका की व्यापार नीति में अनिश्चितता
थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, रूस को दी गई अमेरिकी छूट से उसकी व्यापार नीति में मौजूद अनिश्चितता सामने आती है। उनका कहना है कि अमेरिका पहले दूसरे देशों को कड़े प्रतिबंध लगाने की चेतावनी देता है, लेकिन जब इन प्रतिबंधों को लागू करना मुश्किल या नुकसानदेह लगने लगता है, तो वह अपने रुख में बदलाव करने से पीछे नहीं हटता।अजय श्रीवास्तव ने बताया कि ग्राहम एक्ट नाम का कानून 18 सितंबर को आधिकारिक रूप से लागू हो गया था। हालांकि, 9 अक्टूबर को अमेरिका और रूस के बीच हुए डीजल समझौते ने दूसरे देशों के रूसी तेल खरीदने पर अमेरिकी जुर्माना लगाने के फैसले को उचित ठहराना मुश्किल बना दिया है। उनके अनुसार, ऐसे कदम वैश्विक व्यापार व्यवस्था में दोहरे मापदंडों को उजागर करते हैं।

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से तेल आयात बढ़ा
भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद तेजी से बढ़ाई। उस समय पश्चिमी देशों ने रूसी तेल से दूरी बनानी शुरू कर दी थी। इसके बाद रूस ने अपना तेल रियायती कीमतों पर बेचना शुरू किया।भारतीय तेल रिफाइनरियों ने इस अवसर का फायदा उठाया और रूस जल्द ही भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। इससे भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल खरीदने के नए विकल्प मिले।अजय श्रीवास्तव ने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि उसके पास 10 जनवरी तक अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी के खिलाफ सुरक्षा का प्रावधान पहले से मौजूद था। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका प्रतिबंध और जुर्माने लागू करने का फैसला अपने हितों को ध्यान में रखकर करता है। जिन देशों के पास अमेरिकी कदमों का जवाब देने की क्षमता होती है, वे अपने हितों की रक्षा करने की बेहतर स्थिति में रहते हैं।
US Tariff News: यूरोपीय संघ से भारत को अब भी खतरा
विशेषज्ञ अर्पिता मुखर्जी के अनुसार, रूस से तेल खरीदने के मामले में भारत के सामने वास्तविक खतरा यूरोपीय संघ की ओर से है। यूरोपीय संघ भारत, तुर्की और चीन जैसे देशों की कुछ कंपनियों के नाम प्रतिबंधित सूची में शामिल कर रहा है। इसके बाद इन कंपनियों को यूरोपीय संघ के दायरे में आने वाले व्यावसायिक लेन-देन से बाहर कर दिया जाता है।खास बात यह है कि कुछ अमेरिकी कंपनियां भी यूरोपीय संघ की प्रतिबंधित सूची में शामिल भारतीय कंपनियों के साथ काम करती हैं। इसके बावजूद अमेरिका ने रूस के मामले में अपना रुख नरम किया है।अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले ईंधन की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण करना ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। ऐसे में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतों को काबू में रखने के लिए रूस के साथ डीजल समझौता करना अमेरिकी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से जरूरी हो गया था।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील की राह हुई आसान
रूस से तेल खरीदने के मामले में भारत पर 100% टैरिफ लगाए जाने का खतरा कम होने से दोनों देशों के बीच व्यापक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की संभावनाएं बढ़ी हैं।भारत और अमेरिका के बीच व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत होने वाली जांच के कई पहलुओं पर व्यापक सहमति बन चुकी है। यह जांच मुख्य रूप से विभिन्न उद्योगों में जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता यानी ओवरकैपेसिटी से संबंधित है।इससे पहले भारत जबरन या बंधुआ मजदूरी के जरिए बनाए गए सामानों के आयात पर प्रतिबंध लगा चुका है। यह कदम भी धारा 301 के तहत हुई एक पिछली जांच से जुड़ा था।इसके अलावा, इसी महीने भारत समेत प्रमुख जी-20 देशों ने कई उद्योगों में जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता से निपटने के लिए सख्त कदम उठाने की संयुक्त प्रतिबद्धता जताई है। इन उद्योगों में ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, रसायन, सेमीकंडक्टर और सोलर पैनल शामिल हैं।
US Tariff News: भारत की ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता
धारा 301 के तहत लगने वाले अमेरिकी टैरिफ के दायरे से भारत के बाहर रहने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं। ऐसे में रूसी तेल का आयात दोनों देशों के बीच नीतिगत मतभेद का सबसे बड़ा मुद्दा रह गया था।पश्चिम एशिया में अस्थिर हालात और हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति बाधित होने की आशंका के बीच रूस से मिलने वाला तेल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे समय में रूसी तेल का आयात अचानक बंद करना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकता था।इसी वजह से भारत सरकार ने रूसी तेल खरीद पूरी तरह बंद करने के अमेरिकी दबाव को स्वीकार नहीं किया। विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया था कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसे सुनिश्चित करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से तेल की आपूर्ति बनाए रखना और बाजार की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
ईंधन की बढ़ती कीमतों से अमेरिका की मुश्किलें बढ़ीं
दुनियाभर में ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर आम लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। अमेरिका और भारत, दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं में इसके संकेत दिखाई दे रहे हैं।काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के मुताबिक, अमेरिका में डीजल की खुदरा कीमतें काफी ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। इससे आम उपभोक्ताओं पर खर्च का बोझ बढ़ा है।अमेरिका के ताजा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के अनुसार, वहां सालाना महंगाई दर बढ़कर 3.7% हो गई है। महंगाई का यह बढ़ता दबाव आगामी मध्यावधि चुनावों में सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
US Tariff News: भारत में भी खुदरा और खाद्य महंगाई बढ़ी
भारत में भी महंगाई का असर साफ दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54% हो गई है।इस बढ़ोतरी में खाद्य पदार्थों की कीमतों की अहम भूमिका रही है। प्याज, लहसुन, अदरक और नींबू जैसी रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के महंगे होने से खाद्य महंगाई दर बढ़कर 7.74% पहुंच गई है।इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य एवं कृषि संगठन का मूल्य सूचकांक भी बढ़ा है। यह स्थिति बताती है कि खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में महंगाई की समस्या को और गंभीर बना रही हैं।








