Bastar Dussehra: जब देशभर में दशहरे पर रावण के पुतले जलाए जाते हैं, तब छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक विशाल लकड़ी का रथ हजारों लोगों के साथ आगे बढ़ता है। यहां न रामलीला होती है और न ही रावण का वध किया जाता है। बस्तर का दशहरा भगवान राम के बजाय आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को समर्पित है। करीब 600 साल पुरानी यह परंपरा अपनी अनूठी रस्मों और आदिवासी संस्कृति के लिए जानी जाती है। खास बात यह है कि बस्तर में दशहरा उत्सव पूरे 76 दिनों तक चलता है। इस उत्सव में अलग-अलग आदिवासी समुदायों और गांवों की भूमिका निर्धारित है। कोई रथ के लिए लकड़ी लाता है, कोई उसे तैयार करता है, तो कोई रथ खींचने के लिए रस्सियों की व्यवस्था करता है। इस तरह बस्तर का दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां की सांस्कृतिक एकता और सामुदायिक भागीदारी का प्रतीक भी है।
Bastar Dussehra: 600 साल पुरानी है बस्तर दशहरे की परंपरा-

मान्यता के अनुसार, बस्तर दशहरे की शुरुआत करीब 600 साल पहले चालुक्य वंश के राजा पुरुषोत्तम देव के समय हुई थी। कहा जाता है कि राजा जगन्नाथपुरी की यात्रा पर गए थे। इस दौरान मुरिया, भतरा, गोंड, धाकड़ और माहरा सहित कई समुदायों के मुखिया भी उनके साथ थे। राजा ने यह यात्रा पैदल पूरी की थी। कहा जाता है कि पुरी के राजा ने उन्हें 16 पहियों वाला एक रथ भेंट किया था। बस्तर लौटने पर राजा पुरुषोत्तम देव ने रथ के चार पहिए भगवान जगन्नाथ और 12 पहिए देवी दंतेश्वरी को समर्पित कर दिए। तभी से बस्तर दशहरे में देवी दंतेश्वरी के छत्र को रथ पर विराजमान कर उसकी परिक्रमा करने की परंपरा चली आ रही है।
Bastar Dussehra: हर समुदाय की तय है भूमिका, गांवों से आता है रथ का सामान-
बस्तर दशहरे की सबसे बड़ी विशेषता इसमें अलग-अलग समुदायों की भागीदारी है। रथ बनाने से लेकर उसे खींचने तक की जिम्मेदारियां विभिन्न गांवों और आदिवासी समुदायों के बीच बंटी हुई हैं। रथ के निर्माण के लिए लकड़ी अलग-अलग गांवों से लाई जाती है। झारउमरगांव और बेड़ाउमरगांव के कारीगर पारंपरिक औजारों की मदद से रथ तैयार करते हैं। वहीं, रथ खींचने के लिए इस्तेमाल होने वाली रस्सी पेड़ों की छाल से बनाई जाती है, जिसे पोटानार क्षेत्र के ग्रामीण लाते हैं। विजय रथ को खींचने का पारंपरिक अधिकार किलेपाल परगना के माड़िया आदिवासियों के पास है। इसके अलावा, उत्सव के दौरान नौ दिनों तक गड्ढे में बैठकर प्रार्थना करने वाले जोगी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बस्तर के सांसद और बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप के मुताबिक, इस पर्व की खासियत यह है कि इसमें बस्तर के हर समाज के लोगों की भागीदारी होती है। उन्होंने बताया कि इस उत्सव को देखने के लिए भारत के अलावा विदेशों से भी लोग पहुंचते हैं।
‘पाठ जात्रा’ से शुरू होती है रथ निर्माण की प्रक्रिया-
बस्तर दशहरे की शुरुआत हरेली अमावस्या के दिन होने वाली ‘पाठ जात्रा’ से होती है। इस दौरान जगदलपुर में मां दंतेश्वरी मंदिर के सामने जंगल से लाई गई लकड़ी का एक बड़ा कुंदा रखा जाता है, जिसे ‘ठुरलू खोटला’ कहा जाता है। इस लकड़ी और रथ निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक औजारों की पूजा की जाती है। इसके बाद रथ बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। कारीगर बसूला, कुल्हाड़ी और बिंधना जैसे पारंपरिक औजारों की मदद से करीब दस दिनों में लगभग 40 फीट ऊंचा रथ तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया में आधुनिक मशीनों के बजाय पारंपरिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। रथ निर्माण से जुड़ी जिम्मेदारियां पीढ़ियों से एक गांव से दूसरे गांव तक चली आ रही हैं।
कांटों के झूले पर बैठकर दी जाती है दशहरा शुरू करने की अनुमति-
बस्तर दशहरे की सबसे अनूठी रस्मों में से एक ‘काछिन जात्रा’ है। पितृमोक्ष अमावस्या की शाम जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछिनगुड़ी में यह रस्म निभाई जाती है। इस परंपरा के तहत पनका समुदाय की एक कुंवारी बालिका को काछिन देवी का प्रतिनिधि माना जाता है। मान्यता है कि देवी की उपस्थिति के बाद बालिका कांटों के झूले पर बैठकर दशहरा उत्सव शुरू करने की अनुमति देती है। काछिन देवी को मिरगान, चंडार और तिकड़ा जैसे आदिवासी समुदायों की कुलदेवी माना जाता है। इस रस्म के बाद उत्सव की आगे की परंपराएं शुरू होती हैं।
काछिन देवी की प्रतिनिधि पीहू बनना चाहती हैं कलेक्टर-
बस्तर दशहरे में काछिन देवी की प्रतिनिधि बनने वाली 10 वर्षीय पीहू भी चर्चा में रहती हैं। पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली पीहू पिछले पांच वर्षों से इस परंपरा का हिस्सा बन रही हैं। उनका सपना बड़ा होकर कलेक्टर बनने का है। पीहू के मुताबिक, जब वह काछिन देवी की भूमिका निभाती हैं, तो उन्हें ऐसा महसूस होता है कि वह खुद पीहू नहीं हैं, बल्कि देवी के रूप में लोगों को दर्शन दे रही हैं। उन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। दूसरे क्षेत्रों से देवी-देवताओं को भी उनके पास लाया जाता है। यह परंपरा बस्तर दशहरे में धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं के महत्व को भी दर्शाती है।
फूलों से सजे रथ की परिक्रमा और देवी दंतेश्वरी को सलामी-
बस्तर दशहरे के दौरान आश्विन शुक्ल द्वितीया से सप्तमी तक हर दिन फूलों से सजे रथ की परिक्रमा की जाती है। इस दौरान हजारों ग्रामीण छाल से बनी मोटी रस्सियों की मदद से रथ खींचते हैं। रथ पर विराजमान देवी दंतेश्वरी को पुलिस के जवान सशस्त्र सलामी देते हैं। वहीं, महिलाएं रथ की नजर उतारती हैं और पुष्प वर्षा करती हैं। इन रस्मों में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदायों के लोग शामिल होते हैं। उत्सव के दौरान हर दिन अलग-अलग पारंपरिक अनुष्ठान किए जाते हैं, जिनके जरिए बस्तर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाया जाता है।
‘निशा जात्रा’ और ‘भीतर रैनी’ हैं खास रस्में-
बस्तर दशहरे में अष्टमी की आधी रात ‘निशा जात्रा’ की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान मां दंतेश्वरी मंदिर से देवी की डोली निकालकर निशा जात्रा मंदिर ले जाई जाती है। यह मंदिर साल में केवल एक बार खुलता है। यहां पारंपरिक रूप से बलि देने की रस्म भी होती है, जबकि भोग-प्रसाद राजपुरोहित परिवार तैयार करता है। विजयादशमी के दिन आठ पहियों वाला विजय रथ निकाला जाता है। परिक्रमा पूरी होने के बाद देर रात रथ को प्रतीकात्मक रूप से चुरा लिया जाता है और कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा दिया जाता है। इस रस्म को ‘भीतर रैनी’ कहा जाता है। कुम्हड़ाकोट में ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित कई क्षेत्रों से तीन हजार से अधिक देवी-देवताओं को लाए जाने की परंपरा है। अगले दिन राज परिवार के प्रतिनिधि नए अन्न का भोग लगाते हैं और स्थानीय लोगों के साथ नवाखानी मनाते हैं। इसके बाद रथ वापस लाया जाता है।
मुरिया दरबार में सामने रखी जाती हैं लोगों की समस्याएं-
बस्तर दशहरे के अंतिम चरण में ‘मुरिया दरबार’ आयोजित किया जाता है। पुराने दस्तावेजों के अनुसार, इस दरबार की शुरुआत 8 मार्च 1876 को हुई थी। रियासत काल में आदिवासी समुदायों की पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े मांझी, मुखिया, चालकी और नाईक अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याएं सीधे राजा के सामने रखते थे। समय के साथ व्यवस्था बदली, लेकिन इस परंपरा को जारी रखा गया। आज मुरिया दरबार में राजा की जगह जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी लोगों की समस्याएं सुनते हैं। इस तरह यह आयोजन बस्तर की पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था और आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बना हुआ है।
रावण दहन नहीं, परंपराओं और एकता का उत्सव है बस्तर दशहरा-
मुरिया दरबार के बाद दूसरे क्षेत्रों से आए देवी-देवताओं को सम्मान के साथ विदा किया जाता है। दंतेवाड़ा से आई मावली माता की डोली और देवी दंतेश्वरी का छत्र सशस्त्र सलामी के बीच शोभायात्रा के साथ लौटते हैं। इसके साथ ही 76 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरे का समापन होता है। रथ लौट जाता है, देवी अपने धाम पहुंच जाती हैं और दूर-दराज के गांवों से आए लोग अपने घर लौटने लगते हैं। हालांकि, यह परंपरा अगले साल फिर उसी उत्साह के साथ लौटती है। जंगलों से लकड़ी लाई जाती है, कारीगर अपने औजार निकालते हैं, रस्सियां तैयार की जाती हैं और हजारों लोग एक बार फिर रथ खींचने के लिए जुटते हैं।
देश के कई हिस्सों में दशहरा रावण दहन के लिए जाना जाता है, लेकिन बस्तर में यह उत्सव देवी दंतेश्वरी के प्रति आस्था, आदिवासी संस्कृति और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। यहां किसी पुतले का दहन नहीं होता, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं को हर साल नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है।
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