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मिडिल ईस्ट जंग का असर सूरत के टेक्सटाइल उद्योग पर, कच्चा माल महंगा और उत्पादन संकट में

Iran crisis: अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध और बढ़ते वैश्विक तनाव का असर अब भारत के प्रमुख कपड़ा हब सूरत के टेक्सटाइल उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। कच्चे माल की कीमतों में अचानक आई तेजी, कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की कमी और आयात पर निर्भरता के कारण उद्योग से जुड़े व्यापारी और फैक्ट्री मालिक दबाव में आ गए हैं। उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन बाजार में कपड़ों के दाम उसी अनुपात में नहीं बढ़ पा रहे हैं। ऐसे में छोटे और मध्यम उद्योगों के सामने बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।

यार्न और जरी की कीमतों में उछाल

कपड़ा कारोबारी महेंद्र रामोलिया के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय हालात का सीधा असर यार्न उद्योग पर पड़ा है। पिछले कुछ समय में यार्न की कीमतों में करीब 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है, जबकि यार्न निर्माण में इस्तेमाल होने वाली जरी के दामों में लगभग 50 प्रतिशत तक का उछाल दर्ज किया गया है। इससे वीवर्स और छोटे व्यापारियों की उत्पादन लागत अचानक काफी बढ़ गई है।

Iran crisis: महंगा उत्पादन, लेकिन बाजार भाव स्थिर

उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि बढ़ी कीमतों के बावजूद बाजार में पर्याप्त माल नहीं मिल पा रहा है। कई वीवर्स को समय पर यार्न और जरी उपलब्ध नहीं हो रही। अगर माल मिल भी जाता है तो एक साड़ी की लागत करीब 25 से 30 रुपये तक बढ़ जाती है, लेकिन व्यापारी उतना भाव देने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में उत्पादन करने वालों को लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है।

Iran crisis: आयात पर निर्भरता और गैस सिलेंडर की किल्लत

सूरत के टेक्सटाइल उद्योग में इस्तेमाल होने वाला ज्यादातर यार्न चीन से भारत की कंपनियों के जरिए आता है। फिलहाल यार्न के दाम में 40 से 50 रुपये तक की बढ़ोतरी हो चुकी है, जबकि जरी के भाव में 70 से 80 रुपये तक का इजाफा दर्ज किया गया है। इसके साथ ही उद्योग में इस्तेमाल होने वाले कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की कमी भी उत्पादन पर असर डाल रही है।

उत्पादन घटा, 15 दिन के बंद पर विचार

Iran crisis: बढ़ती लागत और कमजोर मांग के कारण कई कंपनियों ने अपना उत्पादन घटा दिया है। कई यूनिट्स में पूरे सप्ताह में केवल दो से तीन दिन ही काम कराया जा रहा है, ताकि खर्च कम किया जा सके। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो कई कंपनियों को मजबूरन उत्पादन बंद करना पड़ सकता है। ऐसे में एसोसिएशन स्तर पर 15 दिनों के स्वैच्छिक बंद पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि बढ़ते नुकसान को कुछ हद तक रोका जा सके।

 

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