Home » ग्राउंड रिपोर्ट » जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में पहुंचे बुजुर्ग की बातें सुनकर रह जाएंगे हैरान, देश के प्रति उनकी सोच ने खींचा सबका ध्यान!

जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में पहुंचे बुजुर्ग की बातें सुनकर रह जाएंगे हैरान, देश के प्रति उनकी सोच ने खींचा सबका ध्यान!

Jantar Mantar Protest
SIR और चुनाव आयोग पर जंतर-मंतर में बहस

Jantar Mantar Protest: जंतर-मंतर पर वोट चोरी के आरोपों और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर हुए प्रदर्शन के दौरान अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों के बीच तीखी बहस देखने को मिली। प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की हिरासत और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कई लोगों ने अपनी राय रखी। इस दौरान कुछ लोगों ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया, जबकि कुछ ने इसे राजनीतिक एजेंडा और देश की छवि खराब करने की कोशिश बताया। मौके पर मौजूद लोगों के बीच कई मुद्दों पर बहस हुई, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्र, चुनाव आयोग की भूमिका और विरोध करने के तरीके पर भी सवाल उठाए गए।

Jantar Mantar Protest: प्रदर्शनकारियों और विरोधियों के बीच तीखी बहस

प्रदर्शन के दौरान एक पक्ष ने कहा कि अगर सरकार लोगों की बात नहीं सुनेगी और तानाशाही रवैया अपनाएगी, तो देश में भी बांग्लादेश, नेपाल और अफगानिस्तान जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। इस पर दूसरे पक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि भारत को दूसरे देशों जैसा बनाने की बात करना देशहित के खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के नाम पर देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं। उनके मुताबिक, ऐसी गतिविधियों से देश की अर्थव्यवस्था और व्यवस्था को नुकसान पहुंच सकता है।

वोट चोरी के आरोपों पर अलग-अलग राय

प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने चुनाव में वोट चोरी होने का आरोप लगाया और सरकार से जवाब मांगा। वहीं, विरोध कर रहे लोगों ने इन आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि वोट चोरी नहीं हुई है और कुछ राजनीतिक दल अपने एजेंडे के तहत प्रदर्शन कर रहे हैं। एक व्यक्ति ने कहा कि प्रदर्शन में शामिल लोग पैसों के लिए ऐसा कर रहे हैं। हालांकि, इस दावे के समर्थन में कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

इस दौरान एक व्यक्ति ने कहा कि सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले हर व्यक्ति को देशविरोधी कहना गलत है। वहीं, दूसरे पक्ष ने आरोप लगाया कि कुछ लोग राजनीतिक फायदे के लिए युवाओं को प्रदर्शन में शामिल कर रहे हैं। बहस के दौरान प्रदर्शनकारियों को लेकर आपत्तिजनक शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया।

Jantar Mantar Protest: बीजेपी और विपक्षी दलों को लेकर भी हुई बहस

प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोगों ने बीजेपी, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। एक पक्ष ने आरोप लगाया कि कुछ प्रदर्शनकारी वामपंथी विचारधारा से जुड़े हैं और उन्हें बाहर से आर्थिक मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि युवाओं को अपनी पढ़ाई और नौकरी पर ध्यान देना चाहिए, न कि ऐसे प्रदर्शनों में शामिल होकर अपना भविष्य जोखिम में डालना चाहिए।

दूसरी ओर, कुछ लोगों ने कहा कि सरकार से सवाल पूछना और अपनी मांगों को सामने रखना लोकतंत्र का हिस्सा है। इस दौरान मीडिया की भूमिका पर भी बहस हुई। कुछ लोगों ने मीडिया के एक वर्ग को सरकार का समर्थक बताया, जबकि दूसरे पक्ष ने विपक्ष के समर्थन में काम करने वाले मीडिया पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि पत्रकारों को किसी भी राजनीतिक पक्ष का समर्थन करने के बजाय जिम्मेदारी से अपनी बात रखनी चाहिए।

पुलिस की कार्रवाई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल

प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ पत्रकारों को भी हिरासत में लिया। उन्होंने सवाल उठाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई क्यों की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से हिरासत में लिए जाने के तरीके पर चिंता जताए जाने की बात भी चर्चा में आई।इसके जवाब में एक वकील ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर उपद्रव करे या कानून का उल्लंघन करे। उन्होंने कहा कि पत्रकार, वकील या किसी अन्य पेशे से जुड़े व्यक्ति को भी कानून का पालन करना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति कानून-व्यवस्था बिगाड़ता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।

Jantar Mantar Protest: जंतर-मंतर के आसपास अदालत के आदेश का जिक्र

बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एक वकील ने बताया कि अदालत ने जंतर-मंतर के आसपास के 4 किलोमीटर के क्षेत्र को लेकर अंतरिम आदेश पारित किया है। उनके अनुसार, इस क्षेत्र में लागू प्रतिबंधों के तहत पुलिस की अनुमति के बिना किसी भी प्रकार की गैरकानूनी सभा या बंद आयोजित नहीं किया जा सकता।उन्होंने यह भी बताया कि मेट्रो सेवा रात 9 बजे से फिर शुरू कर दी गई थी और हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा कर दिया गया था। इस दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने और पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल पूछे गए। वकील ने कहा कि पत्रकार होने का मतलब यह नहीं है कि किसी को कानून का उल्लंघन करने की छूट मिल जाती है।

उमर खालिद और शरजील इमाम का भी उठा मुद्दा

बहस के दौरान उमर खालिद और शरजील इमाम का जिक्र भी हुआ। एक पक्ष ने सवाल उठाया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार क्या सभी लोगों को समान रूप से मिलता है या इसे किसी खास विचारधारा तक सीमित रखा जाता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सभी पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए।वहीं, दूसरे पक्ष ने कहा कि देश में कानून और संविधान के तहत ही सभी को अपने विचार रखने चाहिए। बातचीत के दौरान राजनीतिक नेताओं, उनके इस्तीफे और सरकार की जवाबदेही को लेकर भी कई सवाल उठाए गए।

Jantar Mantar Protest: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर भी चर्चा

प्रदर्शन के दौरान धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भी बहस हुई। एक व्यक्ति ने कहा कि उनका इस्तीफा मांगना गलत है और इस तरह की मांगों से देश चलाने की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क था कि अगर हर मुद्दे पर दबाव बनाकर नेताओं से इस्तीफा मांगा जाने लगे, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के कामकाज पर असर पड़ेगा।दूसरी ओर, कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि अगर किसी मंत्री या अधिकारी के खिलाफ आरोप लगते हैं, तो उनसे जवाब क्यों नहीं मांगा जाना चाहिए। इसी क्रम में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर भी चर्चा हुई।

SIR प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया पर बहस के दौरान एक व्यक्ति ने कहा कि उन्हें वोट चोरी होने के आरोपों पर विश्वास नहीं है, लेकिन SIR लागू करने के तरीके को लेकर कुछ गंभीर सवाल हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2003 में यह प्रक्रिया लगभग 6 महीने में पूरी हुई थी, जबकि इस बार इसे लगभग 3 महीने में पूरा किया गया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कुछ राज्यों में चुनाव से ठीक पहले यह प्रक्रिया क्यों कराई जा रही है।उनका कहना था कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया और चुनाव की तारीखों के बीच पर्याप्त समय होना चाहिए, ताकि लोगों को अपील करने और अपनी शिकायतों का समाधान कराने का मौका मिल सके। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले अपीलों का निपटारा पूरा होना जरूरी है, जिससे किसी भी पात्र मतदाता का मतदान का अधिकार प्रभावित न हो।

Jantar Mantar Protest: 2003 और 2024 की चुनावी प्रक्रिया का भी जिक्र

बहस के दौरान वर्ष 2003 में हुए SIR और वर्ष 2024 के चुनाव से जुड़ी परिस्थितियों पर भी चर्चा हुई। एक व्यक्ति ने कहा कि 2003 में भी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल हो रहा था और उस समय प्रक्रिया को लेकर इतनी आपत्तियां सामने नहीं आई थीं। वहीं, दूसरे पक्ष ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया के अलग-अलग समय और परिस्थितियों की तुलना करते समय सभी तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए।इस दौरान ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति और चुनाव आयोग में उनकी भूमिका पर भी सवाल उठाए गए। हालांकि, बातचीत में इस विषय पर सभी लोग एकमत नहीं थे और अलग-अलग दावे सामने आए।

पश्चिम बंगाल में अपील और मतदाता सूची का मुद्दा

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और बाद में अपील के जरिए नाम बहाल होने के मुद्दे पर भी बहस हुई। एक व्यक्ति ने दावा किया कि चुनाव के बाद गठित ट्रिब्यूनल में बड़ी संख्या में अपीलों पर फैसला होने के बाद मतदाताओं के नाम बहाल किए गए। उन्होंने 91 प्रतिशत अपीलों का जिक्र करते हुए कहा कि यदि पात्र मतदाताओं के नाम चुनाव से पहले बहाल हो जाते, तो वे अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकते थे।उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी आपत्ति इस बात पर नहीं है कि संबंधित मतदाता किस राजनीतिक दल को वोट देते, बल्कि इस बात पर है कि चुनाव से पहले उनका मतदान का अधिकार प्रभावित हुआ। उनके अनुसार, चुनाव आयोग को SIR और चुनाव की समय-सीमा इस तरह तय करनी चाहिए कि अपीलों का निपटारा मतदान से पहले हो सके।

Jantar Mantar Protest: नागरिकता तय करने के अधिकार पर सवाल

बहस के दौरान यह सवाल भी उठा कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार किस संस्था के पास है। एक पक्ष ने कहा कि चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने के बजाय मतदाता सूची से संबंधित अपनी जिम्मेदारियों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने गृह मंत्रालय की भूमिका का भी उल्लेख किया।वहीं, दूसरे पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का जिक्र करते हुए कहा कि मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए स्वीकार किए जाने वाले दस्तावेजों के संबंध में अदालत ने दिशानिर्देशों का दायरा बढ़ाया था। उनका कहना था कि दस्तावेजों से जुड़े नियमों और प्रक्रिया को समझे बिना चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोपों पर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का भी हुआ जिक्र

एक वकील ने बताया कि वह SIR से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में मौजूद थे। उन्होंने कहा कि इस विषय पर हुई बहस में कई कानूनी पहलुओं को समझना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदर्शन और SIR से संबंधित अदालती कार्यवाही अलग-अलग मुद्दे हैं, इसलिए दोनों को एक ही विषय मानकर चर्चा नहीं करनी चाहिए।इस पर दूसरे व्यक्ति ने सवाल उठाया कि जब प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, तो अदालत के निर्देशों और चुनाव आयोग की जिम्मेदारियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

Jantar Mantar Protest: चुनाव आयोग के फैसलों और संवैधानिक प्रक्रिया पर चर्चा

बातचीत के दौरान चुनाव आयोग के फैसलों, अधिकारियों की जवाबदेही और संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर भी सवाल पूछे गए। एक पक्ष ने कहा कि किसी अधिकारी को पद से हटाने या उसके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि केवल सार्वजनिक दबाव के आधार पर किसी अधिकारी का इस्तीफा मांगना उचित नहीं है।दूसरी ओर, कुछ लोगों ने कहा कि लोकतंत्र में जनता को सवाल पूछने और सरकार तथा संवैधानिक संस्थाओं से जवाब मांगने का अधिकार है। बहस के अंत तक प्रदर्शन, SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची, पुलिस कार्रवाई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने रहे।