Mobile Ban Policy: सोशल मीडिया के इस दौर में आजकल के युवा, खासकर 15 से 20 साल के बच्चे, काफी व्यस्त हैं। वे पढ़ाई या अन्य गतिविधियों में नहीं बल्कि डिजिटल और सोशल मीडिया पर व्यस्त हैं। आज हालात इतने बिगड़ गए हैं कि अगर कोई इन समस्याओं पर ध्यान भी देता है तो उसकी कड़ी निंदा की जाती है। लेकिन कर्नाटक सरकार ने इन हालातों को सुधारने का एक कठिन लेकिन प्रभावी रास्ता निकाला है।

कर्नाटक सरकार 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मोबाइल उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का विचार कर रही है, क्योंकि सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया का गलत प्रभाव मानसिक स्वास्थ्य और पढ़ाई पर सीधा असर डालता है। इन समस्याओं को देखते हुए सरकार डिजिटल अनुशासन की नई नीतियों पर काम कर रही है।
कम उम्र में डिजिटल असर खतरनाक
विशेषज्ञों का कहना है कि जरूरत से ज्यादा सोशल मीडिया का इस्तेमाल बच्चों में चिंता, अवसाद, नींद की कमी और पढ़ाई में गिरावट का कारण बन सकता है। बार-बार स्क्रीन देखने से दिमाग लगातार तुलना करने लगता है। दूसरे बच्चों की “परफेक्ट” दिखने वाली जिंदगी देखकर उनमें हीन भावना पैदा होती है। साइबर बुलिंग भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई है। कम उम्र में मिलने वाली नकारात्मक टिप्पणियां बच्चों के आत्मविश्वास को गहरा नुकसान पहुंचाती हैं।

सिर्फ प्रतिबंध नहीं, जिम्मेदार डिजिटल उपयोग पर जोर
राज्य सरकार केवल प्रतिबंध लगाने की दिशा में ही नहीं सोच रही है, बल्कि तकनीक का संतुलित उपयोग कैसे सिखाया जाए, इस पर भी काम चल रहा है। राज्य के आईटी और बीटी मंत्री प्रियांक खरगे ने विधानसभा में बताया कि बच्चों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया के जिम्मेदार इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए विशेषज्ञों और शिक्षण संस्थानों से चर्चा की जा रही है।
इस मुद्दे को विधानसभा में उठाने वाले वरिष्ठ विधायक सुरेश कुमार ने कहा कि बहुत कम उम्र में बच्चे ऐसे कंटेंट तक पहुंच रहे हैं जो उनके लिए ठीक नहीं है। उन्होंने इसे स्कूलों और परिवारों के भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय बताया।
Mobile Ban Policy: दूसरे राज्य भी उठा रहे हैं ऐसे कदम
यह चिंता सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं है। गोवा पहले ही इस दिशा में कदम उठा चुका है, जबकि आंध्र प्रदेश भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध पर विचार कर रहा है। गौरतलब है कि यह एक राष्ट्रीय बहस का रूप ले सकता है, क्योंकि डिजिटल निर्भरता अब शिक्षा व्यवस्था को भी प्रभावित कर रही है।

यह मुद्दा वैश्विक स्तर पर भी उठ रहा है। फिनलैंड ने स्कूलों में डिजिटल अनुशासन से जुड़े कई नियम लागू किए हैं, जबकि यूके भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर नए नियमों पर विचार कर रहा है। 19 फरवरी 2026 को आयोजित इंडिया एआई इंपैक्ट समिट में इमैनुएल माइक्रो ने भारत से अपील की कि बच्चों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस पर आयु सीमा तय करने पर गंभीरता से विचार किया जाए।
किन प्लेटफॉर्म्स पर असर पड़ सकता है
सरकार तकनीक को पूरी तरह नकारने के पक्ष में नहीं है। आईटी विभाग ने मेटा के साथ मिलकर एक “डिजिटल डिटॉक्स” कार्यक्रम शुरू किया है, जिससे अब तक 3 लाख से ज्यादा छात्र और 1 लाख शिक्षक जुड़ चुके हैं। इस कार्यक्रम में बच्चों को यह सिखाया जा रहा है कि मोबाइल का इस्तेमाल कैसे सीमित करें, पढ़ाई और स्क्रीन टाइम में संतुलन कैसे रखें और वास्तविक दुनिया के अनुभवों को कैसे महत्व दें।
यदि आयु आधारित प्रतिबंध लागू होते हैं, तो इसका असर लोकप्रिय प्लेटफॉर्म जैसे यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक और स्नैपचैट पर सीधे तौर पर पड़ सकता है, क्योंकि इनका प्रयोग बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे करते हैं।






