New Delhi: किसी का दुर्भाग्य किसी के लिए भाग्य के द्वार खोल सकता है।ममता बनर्जी एवं उनकी पार्टी टीएमसी की हार के बाद कई कांग्रेसी खुश हुए कि राहुल गांधी की राह में अब कोई रोड़ा नहीं रहा।यदि भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ कोई बड़ी मोर्चाबंदी होती है, तो राहुल विपक्षी दलों के एक सर्वमान्य नेता हो सकते हैं, क्योंकि बंगाल की शेरनी, आयरन लेडी जैसे नामों से पुकारी जाती रही ममता की महत्वाकांक्षा बंगाल में ही दम तोड़ चुकी है। यह बात काफी हद तक सही है।पूर्व में ममता ने बंगाल से बाहर अपनी पार्टी के विस्तार की कोशिशें की थी। यदि वे चौथी बार बंगाल की सत्ता में आती, तो केंद्र में गैर भाजपा दलों के लिए एक बड़ा चेहरा होती। ऐसे में राहुल गांधी को न चाहते हुए भी इंडिया गठबंधन के दबाव में उनका नेतृत्व स्वीकार करना पड़ता, लेकिन अब ममता केंद्र की राजनीति में सक्रिय होती भी हैं, तो इंडिया गठबंधन में उन्हें वह सम्मान नहीं मिलेगा, जिसकी कि उम्मीदें थी।
राहुल के नाम पर क्यों सहमत हो सकते हैं अखिलेश ?
यह अलग बात है कि असम और बंगाल में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, लेकिन केरल में उसकी जीत पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने वाली है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार राहुल गांधी आज इस स्थिति में हैं कि यदि आगामी लोकसभा चुनाव के लिए राष्ट्रीय स्तर पर गैर भाजपा दलों का मोर्चा बनाने या इंडिया गठबंधन को मजबूत करने की बात आती है, तो उन्हें नेता स्वीकार किया जा सकता है। राहुल को इंडिया गठबंधन का नेता स्वीकार करने में सपा मुखिया अखिलेश यादव अवश्य असहमति जता सकते हैं, लेकिन अखिलेश के सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ भाजपा ने जो व्यूह रचना की, वैसे ही वह उत्तर प्रदेश में भी कर सकती है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ी समस्या समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के लिए हो जाएगी।अखिलेश को जब लगेगा कि भाजपा उत्तर प्रदेश में ठोस रणनीति अपना रही है, तो उस स्थिति से निपटने के लिए वे कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों की एकजुटता की बात कर सकते हैं। ऐसे में वे कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ते हैं, तो सीटों के बंटवारे में राहुल गांधी पर हावी नहीं हो सकेंगे, बल्कि उस स्थिति में राहुल गांधी कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने का दबाव बना सकेंगे।
New Delhi: कांग्रेस कार्यकर्ताओं को नसीहत के मायने
खास बात यह है कि राहुल गांधी ने भी इस बात के संकेत दिये हैं कि वे एक परिपक्व राजनेता हैं और गैर भाजपा की बात करने वाले दलों का नेतृत्व करने में सक्षम हैं। उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद अपनी ही पार्टी के नेताओं को कड़ी नसीहत दी है। उन्होंने एक परिपक्व राजनेता की तरह कांग्रेस के उन नेताओं की आलोचना की, जो तृणमूल कांग्रेस की हार पर खुशी जता रहे थे। राहुल गांधी ने साफ कहा कि ‘छोटी राजनीति’ छोड़कर बड़े मुद्दे को समझने की जरूरत है।राहुल गांधी ने इससे पहले ममता बनर्जी के ‘वोट चोरी’ के आरोपों का समर्थन भी किया था। उन्होंने कहा, “असम और बंगाल में भाजपा ने चुनाव आयोग के सहयोग से वोट चुराए हैं। हम ममता बनर्जी से सहमत हैं। बंगाल में 100 से ज्यादा सीटें छीनी गई हैं। हमने यह तरीका पहले भी मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और लोकसभा 2024 में देखा है ” ऐसा लगता है कि राहुल गांधी ने अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं को फटकार लगाकर या नसीहत देकर देश के तमाम भाजपा विरोधी दलों को संदेश दिया है कि आज जरूरत छोटी-छोटी लड़ाइयों में उलझने की नहीं, बल्कि एकजुट होकर बड़ी लड़ाई लड़ने की है।अब देखना है कि गैर भाजपा वाद की बात करने वाले दल उनके संदेश को कितना समझ पाते हैं? भविष्य में उन्हें अपना नेता स्वीकार कर पाते हैं या नहीं? बहरहाल राहुल गांधी ने अपने इरादे जता दिये हैं कि वे बड़ी लड़ाई लड़ना चाहते हैं। कांग्रेस भाजपा विरोधी मोर्चे का नेतृत्व करने में सक्षम है।








