भाजपा से क्यों हुआ मोहभंग ?
दरअसल, अन्नामलाई तमिलनाडु में AIADMK के साथ गठबंधन के पक्ष में नहीं थे। वे चाहते थे कि राज्य में भाजपा अकेले चुनाव लड़े।पार्टी ने उनकी यह बात नहीं मानी और साथ ही उन्हें राज्य ईकाई के अध्यक्ष पद से भी हटा दिया। उन्हें विधानसभा टिकट न देकर एक तरह से हाशिये पर डाल दिया गया। ऐसे में उनका नाराज होना स्वाभाविक ही था। नाराज अन्नामलाई ने नई दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और संगठन महामंत्री बीएल संतोष से मुलाकात की।पार्टी नेतृत्व ने यह कहकर मनाया है कि उन्हें उनकी क्षमता के अनुसार जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, लेकिन वे नहीं माने तो जाहिर है कि वे राज्य की राजनीति में कुछ नया करना चाहते हैं।
अच्छी राजनीति की तलाश में
के. अन्नामलाई ने शुक्रवार को कहा भी कि उनका लक्ष्य तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति में बड़ा और निर्णायक बदलाव लाना है। इसी के साथ उन्होंने अपने एक्स प्रोफाइल को बदलकर खुद को “अच्छी राजनीति की तलाश में एक आम आदमी” बताया है।
पूर्व पुलिस अधिकारी से नेता बने अन्नामलाई ने साफ किया है कि वह पारंपरिक राजनीतिक तरीकों से अलग जनता के समर्थन पर आधारित एक आंदोलन को आगे बढ़ाने पर ध्यान देंगे। उनका कहना है कि यह पहल राज्य की जाति-आधारित राजनीति को बदलने और पिछले कई दशकों से तमिलनाडु की राजनीति पर प्रभाव रखने वाली द्रविड़ विचारधारा को चुनौती देने का प्रयास होगी।
New Delhi: ‘सिंघम’ को बेहतर उम्मीदें
अपने पुलिस करियर के दौरान अन्नामलाई को उनके सख्त और अलग कार्यशैली के कारण ‘सिंघम’ कहा जाने लगा था। अब उन्हें उम्मीद है कि वह राजनीति में भी उसी तरह अपनी छाप छोड़ेंगे और सफलता हासिल करेंगे।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में अपने छह साल के कार्यकाल के दौरान अन्नामलाई की यह सोच कई बार दिखाई दी। उन्होंने तमिलनाडु में भाजपा का जनाधार बढ़ाने के लिए जोरदार अभियान चलाए। यह ऐसा राज्य है, जहां पिछले करीब पांच दशकों से द्रविड़ दलों का राजनीतिक दबदबा रहा है।
New Delhi: बदलाव का अभियान
भाजपा से औपचारिक रूप से अलग होने के बाद अन्नामलाई अब जनता के समर्थन के आधार पर अपना अभियान आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि उनके इस प्रयास से राज्य की पारंपरिक राजनीति में बड़ा बदलाव आएगा।
जानकारों के अनुसार अन्नामलाई की “आम आदमी” वाली छवि और संदेश का लोगों पर असर पड़ सकता है। देश के कुछ अन्य राज्यों में भी इस तरह के प्रयोग पहले किए जा चुके हैं। हालांकि, किसी मजबूत संगठन और पार्टी ढांचे के बिना यह पहल कितनी सफल होगी, यह आने वाले समय में ही पता चलेगा।फिर राज्य की पारंपरिक राजनीति को बदलना काफी चुनौतीपूर्ण है। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जरूरी नहीं कि अब जिस नई राह पर वे चलना चाहते हैं, वह उनके लिए आसान हो। नई राह रपटीली भी हो सकती है और कदम-कदम पर इसमें कांटे भी मिल सकते हैं।








