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आखिर क्यों बनते थे दो पल्लों वाले दरवाजे? इतिहास और विज्ञान दोनों हैं दिलचस्प

NEWS: आज के आधुनिक घरों में जहां सिंगल या स्लाइडिंग डोर आम हो चुके हैं, वहीं पुराने समय के घरों में दो पल्लों वाले लकड़ी के दरवाजे एक खास पहचान थे। यह सिर्फ डिजाइन नहीं, बल्कि उस दौर की बेहतरीन इंजीनियरिंग और जीवनशैली का हिस्सा थे।

पहले के दरवाजे में दो पल्ले का बनाते थे  

उस समय सागौन, शीशम और नीम जैसी मजबूत लकड़ी से भारी दरवाजे बनाए जाते थे। यदि इन्हें एक ही पल्ले में बनाया जाता, तो पूरा वजन एक तरफ पड़ने से दरवाजा जल्दी झुक या टूट सकता था। इसलिए इसे दो हिस्सों में बांटकर वजन बराबर वितरित किया जाता था, जिससे दरवाजे वर्षों तक मजबूत बने रहते थे।

NEWS: दरवाजे गोपनीयता बनाए रखने में भी मददगार थे

दो पल्लों वाले दरवाजे गोपनीयता बनाए रखने में भी मददगार थे। जरूरत पड़ने पर केवल एक पल्ला खोलकर बाहर के लोगों से बातचीत की जा सकती थी, जबकि घर का अंदरूनी हिस्सा सुरक्षित और निजी बना रहता था। संयुक्त परिवारों के दौर में शादी-ब्याह और बड़े आयोजनों के दौरान दोनों पल्ले खोल देने से चौड़ा रास्ता मिल जाता था। इससे भारी संदूक, अनाज के बोरे और अन्य बड़े सामान को आसानी से घर के अंदर लाया जा सकता था।

प्राकृतिक वेंटिलेशन का भी बेहतर माध्यम

इसके अलावा, ये दरवाजे प्राकृतिक वेंटिलेशन का भी बेहतर माध्यम थे। मौसम के अनुसार एक या दोनों पल्ले खोलकर हवा और रोशनी को नियंत्रित किया जा सकता था, जबकि तेज हवाओं के समय एक पल्ला बंद कर सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाती थी। यही वजह है कि पुराने दौर के दो पल्लों वाले दरवाजे सिर्फ लकड़ी के किवाड़ नहीं, बल्कि मजबूत निर्माण, व्यावहारिक सोच और भारतीय पारंपरिक वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं।

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