Opinion: राजधानी दिल्ली में इस बीच हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने जो आचरण दिखाया, वह बड़ा हैरान करने वाला है। प्रदर्शनों के दौरान महिला पुलिसकर्मियों के साथ जो अभद्रता, गाली-गलौज और हाथापाई की गई, वह बेहद निराशाजनक है। कितनी दुखद बात है कि एक कांस्टेबल जो कि प्रदर्शन के दौरान अपना दायित्व निभा रहा था, उसे अकेला पाकर किसी ने उनका कॉलर पकड़ा, तो किसी ने उसकी वर्दी फाड़ डाली। एक कांस्टेबल को अस्पताल ले जाना पड़ा, तो इसी से समझा जा सकता है कि उसकी क्या हालत की गई होगी। कुछ प्रदर्शनकारियों को लेकर ये भी शिकायतें हैं कि उन्होंने महिला पुलिसकर्मियों के साथ अभद्रता, गाली-गलौज और हाथापाई की। किसी प्रदर्शनकारी का पुलिस पर लात मारना, गाली देना या वर्दी फाड़ना किसी भी दशा में जायज नहीं ठहराया जा सकता है। यह संविधान की मर्यादा और भावना के एकदम विपरीत है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब अराजकता नहीं
ठीक है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1) (ए) राष्ट्र के नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध-प्रदर्शन करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है, लेकिन विरोध-प्रदर्शन के नाम पर हिंसा और अराजकता का माहौल बनाने की कोशिश कदापि बर्दाश्त नहीं जानी चाहिए।हालांकि पुलिस द्वारा अनावश्यक बल प्रयोग किये जाने पर उसके खिलाफ हाय-हाय के नारे अवश्य लगाए जाने चाहिए, सरकार से उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग अवश्य की जानी चाहिए, लेकिन प्रदर्शनकारियों की ओर से गाली-गलौज और अभद्रता उचित नहीं है।
Opinion: प्रदर्शनकारी नहीं, असामाजिक तत्व
कोई बुरा माने या भला, लेकिन सच यही है कि किसी पुलिसकर्मी को पीछे से लात मारने वाला व्यक्ति प्रदर्शनकारी नहीं हो सकता। जो व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति हिंसक हो जाए, दूसरे की गरिमा का सम्मान ही न करे, आखिर उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह जन मुद्दों की समझ रखता हो। उसके बारे में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि वह विरोध-प्रदर्शन को अराजक और हिंसक बनाने की नीयत से काम करने वाला राष्ट्रद्रोही तत्व है। विरोध-प्रदर्शन के आयोजकों को अपने स्तर से ऐसे असामाजिक तत्वों की पहचान कर खुद उन्हें अलग कर देना चाहिए, क्योंकि ये असामाजिक तत्व माहौल खराब कर विरोध-प्रदर्शन को भी नुकसान पहुंचा देते हैं। इनके कारण जनता में विरोध-प्रदर्शन या आंदोलन की गलत छवि जाती है।









