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कैसे विदेश नीति में पड़ोसी देश भारत के साथ रहें?

मोदी

PM Modi: बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान और चीन हमसे दूर क्यों जा रहे हैं ? एक ताजा उदाहरण है बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने जब पद संभाला था, तब भारत के प्रधानमंत्री ने तारिक रहमान को भारत आने का न्यौता दिया था। मोदीजी ने अन्य देशों से पहले ढ़ाका में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को शपथग्रहण समारोह में अपना प्रतिनिधि भेजा था; लेकिन प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भारत आने के बजाय पहले चीन जाना उचित समझा। पर यह क्यों हुआ? जबकि बांग्लादेश को बनाने में भारत की मुख्य भूमिका रही थी, पाकिस्तान के 90 हजार से ऊपर सैनिकों को घुटने टेकने के लिए भारतीय सेना ने मजबूर कर दिया था। यह विश्व इतिहास में दुश्मन सेना को इतनी संख्या में आत्मसर्मपण करवाने का गौरव भारत की सेना को है।

तारिक रहमान क्यों कन्नी काट गये?

ढ़ाका भारत के साथ किसी अल्प समय वाले समझौते के पक्ष में नहीं है, वह इस बात पर जोर दे रहा है कि गंगा के पानी को बांटने वाली संधि को नये ढ़ग से शुरू किया जाए और वह संधि लंबे समय के लिए होनी चाहिए।
चीन यात्रा का बांग्लादेश के प्रधानमंत्री का खास मकसद यह है कि लंबे समय से तीस्ता नदी के प्रोजेक्ट का लंबे समय से लंबित रहने का कारण धन का अभाव रहा है, धन के उस अभाव को पूरा करने के लिए तारिक रहमान चीन की ओर पहले मुड़े हैं। इसलिए भारत की यात्रा उनके लिए गौण हुई है। बांग्लादेश में चीन के राजदूत ने स्पष्ट किया है कि बांग्लादेश के विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए चीन खड़ा है। नई ऊंचाइयों को प्राप्त करने के लिए आनेवाले समय में बांग्लादेश और चीन मिलकर कार्य करने पर समझौते के लिए तैयार हैं। नदी के प्रोजेक्ट के अलावा चीन और बांग्लादेश उच्च गुणवत्ता के कार्य जैसे सड़क कार्पोरेशन के लिए सहमत हो गए हैं। और आपसी व्यापार को मजबूत करने के लिए एक दूसरे को समय-समय पर उद्योग, निवेश पर ध्यान दिया जाएगा। साथ ही डिजिटल अर्थव्यवस्था, जल स्रोतों, स्वास्थ्य और एक दूसरे के नागरिकों के साथ समन्वय बनाये रखने के कार्य पर भी ध्यान दिया जाएगा।

हालांकि विदेशी मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर कहते हैं कि अभी चीन जाने का समय तय नहीं किया गया है, पर तैयारियां पूरी हो रखी हैं। भारत के साथ पड़ोसी का यह अलगाव आने वाले समय के लिए अच्छा नहीं है। बांग्लादेश की पिछली महमूद यूनुस की कार्यकारी सरकार ने पाकिस्तान के पक्ष में भारत की अपेक्षा ज्यादा तवज्जो दिया है। नेपाल भी एकदम भारत के पक्ष में नहीं दिख रहा है। इसलिए भारत की विदेश नीति में पड़ोसियों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए,- जैसे लक्षण बांग्लादेश के इस वक्त दिख रहे हैं, वैसे नहीं होने चाहिए।

चीन का रुख बड़ी तेजी से भारत के साथ स्पर्धा करने का बन रहा है। वह हर क्षेत्र में एशिया की ही नहीं विश्व की बड़ी शक्ति बनने के पूरे प्रयास कर रहा है। ट्रंप का भी चीन जाना और गलबहियां डालना भी बहुत कुछ नये समीकरणों की ओर इशारा कर रहा है। ऐसे समय में भारत को अपने अस्तित्त्व को मजबूत करने की जरूरत है क्योंकि ट्रंप पाकिस्तान को अपना सबसे बड़ा हितैशी मान रहा है, वह ईरान के साथ समझौता करने के बहुत सारे प्रयास कर चुका है, ऐसे लक्षणों से पता चलता है कि आने वाले समय में भारत को घेरने की तैयारी भी चल रही है। ट्रंप की विदेश नीति एशियाई देशों के साथ किस तरह के गुल खिलाएगी, वह आने वाला समय ही बतायेगा।

लेखक: भगवती प्रसाद डोभाल

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