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पंजाब में भाईचारे की मिसाल: मुस्लिम ने मंदिर के लिए जमीन दी तो हिंदू परिवार ने मुसलमानों के लिए बनवाई मस्जिद

पंजाब में गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

Punjab News: पंजाब हमेशा से ही अपनी गंगा-जमुनी तहजीब के लिए जाना जाता रहा है, जहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से एक-दूसरे के त्योहारों, रीति-रिवाजों और धार्मिक स्थलों का आदर करते आए हैं। इस परंपरा की ताजगी आज भी देखने को मिल रही है। हाल ही में मोहाली और संगरूर जिले में ऐसे दो घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने राज्य भर में लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

मंदिर निर्माण के लिए जमीन दी दान

मोहाली के झामपुर इलाके में एक मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति ने मंदिर निर्माण के लिए अपनी जमीन दान में दे दी। इस नेक काम का उद्देश्य था कि स्थानीय हिंदू भाइयों के पास अपने धार्मिक स्थल के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी। मोहम्मद इमरान हैप्पी ने बताया कि जब हिंदू भाईयों ने उन्हें यह समस्या बताई, तो उन्होंने तुरंत पंजाब के शाही इमाम मौलाना मोहम्मद उस्मान रहमानी लुधियानवी से संपर्क किया और इस पर चर्चा की। इसके बाद इमरान ने अपनी जमीन में से 325 गज जगह, जिसकी कीमत लगभग 80 लाख रुपए आंकी गई, मंदिर निर्माण के लिए दान में दे दी।

Punjab News: पंजाब में नफरत और धार्मिक द्वेष के लिए जगह नहीं

इस अवसर पर शाही इमाम मौलाना मोहम्मद उस्मान रहमानी लुधियानवी ने कहा कि पंजाब में नफरत और धार्मिक द्वेष के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारी समाज में विविधता में एकता की भावना सर्वोपरि है। उन्होंने याद दिलाया कि कुछ दिन पहले ही दो हिंदू भाइयों और एक सिख बुजुर्ग महिला ने मस्जिद निर्माण के लिए अपनी जमीन दान में दी थी। मौलाना ने कहा, “यह हमारी सबसे बड़ी ताकत है कि हम अपनी अनेकता में एकता बनाए रखते हैं। यही असली गंगा-जमुनी तहजीब है।”

सिर्फ मोहाली ही नहीं, बल्कि संगरूर जिले के गांव पुणेवाल में भी धर्मों के बीच भाईचारे की मिसाल देखने को मिली। यहां एक हिंदू पंडित परिवार ने अपने गांव के मुसलमानों के लिए मस्जिद का निर्माण कराया और उसे मुस्लिम समुदाय को दान में सौंप दिया। पंडित पाल रामजी और पंडित विजय कुमार ने बताया कि गांव के मुस्लिम लोगों के पास नमाज पढ़ने के लिए कोई उचित जगह नहीं थी। इस कमी को देखते हुए उन्होंने अपनी जमीन पर मस्जिद का निर्माण कराया और मुसलमानों को सौंप दिया।

गंगा-जमुनी तहजीब अब भी जीवित

इन दोनों ही घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि पंजाब में गंगा-जमुनी तहजीब अब भी जीवित है। धर्म और जाति के नाम पर किसी भी प्रकार की कट्टरता या असहिष्णुता के लिए यहां कोई जगह नहीं है। शाही इमाम ने कहा, “हमारे समाज की महानता यही है कि हम अपने पड़ोसियों की धार्मिक जरूरतों का सम्मान करते हैं और मदद के लिए आगे आते हैं। यह केवल दान या निर्माण की बात नहीं है, बल्कि इंसानियत और भाईचारे की पहचान है।”

विशेष रूप से यह घटनाएँ इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि आजकल देश के कई हिस्सों में धार्मिक भेदभाव और कट्टरता की खबरें अधिक सुनने को मिलती हैं। मोहाली और संगरूर की ये मिसाल बताती हैं कि अगर समुदाय आपसी समझ और सहयोग के भाव के साथ आगे आएं, तो धर्मों और जातियों के बीच दूरी नहीं रह सकती। यही असली गंगा-जमुनी तहजीब है—जहां एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हैं और उन्हें पूरा करने में मदद करते हैं।

वहीं कुछ लोगों का कहना है कि इस तरह के उदाहरण न केवल सामाजिक समरसता बढ़ाते हैं बल्कि नए पीढ़ी को भी इंसानियत और भाईचारे का सबक देते हैं। धर्म का अर्थ केवल पूजा या अनुष्ठान नहीं है, बल्कि दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना भी है। मोहाली में जमीन दान करने वाले मुस्लिम और संगरूर में मस्जिद बनवाने वाले हिंदू पंडित परिवार ने यह संदेश साफ कर दिया कि हमारे देश की असली ताकत इसकी विविधता में है, और जब विविध समुदाय एक-दूसरे के लिए कदम बढ़ाते हैं, तो समाज मजबूत बनता है।

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