Reservation Reform Protest: दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और यूजीसी से जुड़े नियमों के विरोध में प्रदर्शन के बाद इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। प्रदर्शनकारी आरक्षण को जाति के बजाय आर्थिक आधार से जोड़ने, क्रीमी लेयर लागू करने और मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं। वहीं राजनीतिक दलों के नेताओं के रुख इस मुद्दे पर पूरी तरह अलग-अलग नजर आ रहे हैं।
अखिलेश यादव ने बताया ‘गहरी साजिश’
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आरक्षण सुधार के नाम पर हो रही मांगों को लेकर भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने इसे ‘आरक्षण समाप्ति’ का षड्यंत्र बताते हुए कहा कि आरक्षण पीडीए समाज का अधिकार है। अखिलेश ने कहा कि ‘समीक्षा’, ‘सुधार’, ‘क्रीमी लेयर’ और ‘आरक्षण त्यागने’ जैसे शब्दों के जरिए आरक्षण के अधिकार को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि आरक्षण को लेकर किसी भी तरह का बदलाव वंचित और पिछड़े वर्गों के अधिकारों को प्रभावित करेगा।
स्वामी आनंद स्वरूप बोले- ‘लड़ाई योग्यता के लिए’
दूसरी ओर स्वामी आनंद स्वरूप ने आरक्षण व्यवस्था को ही खत्म करने की मांग की। उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई योग्यता और समानता के लिए है और चयन का आधार केवल योग्यता होना चाहिए। उन्होंने आरक्षण के साथ-साथ एससी/एसटी एक्ट और यूजीसी से जुड़े मुद्दों को भी आंदोलन की मांगों में शामिल किया और कहा कि जब तक इन मुद्दों पर सरकार फैसला नहीं लेती, आंदोलन जारी रहेगा।
चिराग पासवान ने बातचीत का रास्ता खोला
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान का रुख दूसरे नेताओं से अलग रहा। उन्होंने कहा कि अगर प्रदर्शनकारी अपनी मांगें व्यवस्थित तरीके से सरकार के सामने रखते हैं तो सरकार उनसे बातचीत करेगी। आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार पहले ही ईडब्ल्यूएस के लिए 10 फीसदी आरक्षण लागू कर चुकी है। साथ ही उन्होंने कहा कि आरक्षण को लेकर किसी भी तरह की गलतफहमी समाज के बड़े वर्ग में नाराजगी पैदा कर सकती है।

रामदास आठवले ने कहा- ‘आरक्षण संवैधानिक अधिकार’
केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने आरक्षण खत्म करने की मांग को असंवैधानिक बताया। उन्होंने कहा कि आरक्षण संविधान से मिला अधिकार है और इसे समाप्त नहीं किया जा सकता। आठवले ने आरक्षण खत्म करने की मांग करने वालों पर बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए उन्हें ‘राष्ट्रद्रोही’ तक कहा।
बृजेश पाठक ने दिया बातचीत का भरोसा
उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने आरक्षण सुधार आंदोलन से जुड़े छात्रों और युवाओं से बातचीत की। उन्होंने कहा कि उनकी मांगों को केंद्रीय नेतृत्व के सामने रखा जाएगा और प्रतिनिधिमंडल की केंद्रीय मंत्री के साथ बैठक कराने का प्रयास किया जाएगा। इससे संकेत मिलता है कि भाजपा के भीतर इस मुद्दे पर आंदोलनकारियों से सीधे संवाद का रास्ता खुला रखा जा रहा है।
संजय निषाद ने अपनी ही सरकार से पूछे सवाल
योगी सरकार में मंत्री और निषाद पार्टी प्रमुख संजय निषाद ने आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा से ही जवाब मांगा। निषाद समुदाय के आरक्षण की मांग को लेकर उन्होंने कहा कि यह भाजपा के अपने वादों और एजेंडे का हिस्सा रहा है। उन्होंने कहा कि जब भाजपा विपक्ष में थी, तब वह इस मुद्दे की वकालत करती थी और अब सत्ता में होने के कारण उसकी जवाबदेही भी बनती है।
आरक्षण पर तीन अलग-अलग सियासी लाइन
जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद सामने आए बयानों को देखें तो आरक्षण पर राजनीति मुख्य रूप से तीन धाराओं में बंटी नजर आती है। पहली धारा आरक्षण को सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकार मानते हुए इसमें किसी भी बदलाव का विरोध कर रही है। अखिलेश यादव और रामदास आठवले के बयान इसी तरफ संकेत करते हैं। दूसरी धारा आरक्षण को जाति के बजाय आर्थिक आधार से जोड़ने और मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव की मांग कर रही है। तीसरी धारा आंदोलनकारियों से बातचीत कर उनकी मांगों को सुनने के पक्ष में है। चिराग पासवान और बृजेश पाठक के बयान इसी दिशा में हैं।
बड़ा सवाल: क्या आरक्षण 2027 का बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा?
उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में आने वाले चुनावों को देखते हुए आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। एक तरफ पिछड़े, दलित और आदिवासी वर्ग आरक्षण को अपने संवैधानिक अधिकार से जोड़कर देखते हैं, वहीं दूसरी तरफ आरक्षण व्यवस्था में सुधार और आर्थिक आधार की मांग करने वाला वर्ग भी अपनी आवाज बुलंद कर रहा है।ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा सामाजिक न्याय बनाम मेरिट, जातिगत आरक्षण बनाम आर्थिक आधार और संवैधानिक अधिकार बनाम सुधार की बहस को और तेज कर सकता है।








