TMC Party Crisis: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में उभरे सियासी संकट के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) ने बागी सांसदों के मामले में जल्दबाजी में कोई फैसला न लेने का संकेत दिया है। सूत्रों के अनुसार, स्पीकर पहले दोनों पक्षों की दलीलें सुनेंगे और सभी तथ्यों की समीक्षा करने के बाद ही अंतिम निर्णय लेंगे।
बागी सांसदों को भेजा गया ईमेल
जानकारी के मुताबिक, टीएमसी के बागी सांसदों के गुट को लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर से ईमेल भेजकर बैठक के लिए बुलाया गया है। इस दौरान सांसदों से उनके विलय संबंधी दावे और संवैधानिक आधार पर चर्चा की जाएगी। स्पीकर कार्यालय का मानना है कि इतने महत्वपूर्ण मामले में निष्पक्षता और संसदीय परंपराओं का पालन आवश्यक है, इसलिए दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा।
TMC Party Crisis: 20 सांसदों ने किया था विलय का दावा
हाल ही में टीएमसी के बागी गुट के 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर एक ज्ञापन सौंपा था। सांसदों ने दावा किया था कि उनका समूह एनसीपीआई (NCPI) में विलय करना चाहता है और इसके लिए संसदीय मान्यता की मांग की थी। अब इस दावे की वैधानिकता और दल-बदल कानून के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया जाएगा।
संसद में बदल सकते हैं राजनीतिक समीकरण
तृणमूल कांग्रेस में संभावित टूट को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बड़ी संख्या में सांसद अलग होते हैं तो संसद में सत्तारूढ़ गठबंधन की स्थिति और मजबूत हो सकती है। विशेष रूप से संवैधानिक संशोधन विधेयकों के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत के संदर्भ में इस घटनाक्रम पर सभी दलों की नजर बनी हुई है।
TMC Party Crisis: राज्यसभा में भी असर संभव
सूत्रों के अनुसार, राज्यसभा में भी टीएमसी के कुछ सांसदों के इस्तीफे की चर्चाएं चल रही हैं। यदि ऐसा होता है तो उच्च सदन में भी राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। हालांकि अभी तक टीएमसी नेतृत्व की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सीमित रही है, लेकिन पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी और बगावत की चर्चाओं ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल तेज कर दी है।
स्पीकर के फैसले पर टिकी निगाहें
फिलहाल सभी की नजरें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के अगले कदम पर टिकी हैं। संसदीय नियमों, दल-बदल कानून और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर लिया जाने वाला फैसला न केवल टीएमसी की राजनीति बल्कि संसद के शक्ति संतुलन पर भी असर डाल सकता है।
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