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अखिलेश के ‘चवन्नी से रुपया’ वाले बयान में कितना दम? पिछले चार चुनावों के आंकड़े बताते हैं सहयोगियों को कितना फायदा, जानिए विस्तार से….

UP POLITICS 2027: समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के ‘चवन्नी से रुपया बना दिया’ वाले बयान ने यूपी की गठबंधन राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अखिलेश ने 16 अगस्त को सहयोगी दलों पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि उन्होंने गठबंधन में शामिल दलों को राजनीतिक रूप से मजबूत किया, लेकिन इसके बावजूद कुछ साथी उन्हें छोड़कर चले गए।

अखिलेश के इस बयान को राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी पर तंज माना गया। जयंत के समर्थकों के विरोध के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने भी अखिलेश पर निशाना साधा और उनसे जाट समाज से माफी मांगने की मांग की। अब सवाल यह है कि क्या सपा के साथ गठबंधन करने वाले दलों का चुनावी प्रदर्शन वास्तव में बेहतर हुआ? पिछले चार चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं, लेकिन कई बड़े सहयोगियों के मामले में अखिलेश के दावे को आंकड़ों से समर्थन मिलता दिखाई देता है।

2024: कांग्रेस 1 से 6, सपा को भी मिला बड़ा फायदा

2024 लोकसभा चुनाव में सपा ने यूपी की 62 सीटों पर चुनाव लड़ा और 37 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं कांग्रेस ने गठबंधन के तहत 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6 सीटें जीत लीं।2019 में कांग्रेस यूपी में सिर्फ एक सीट जीत सकी थी। रायबरेली से सोनिया गांधी जीती थीं, जबकि अमेठी में राहुल गांधी को हार का सामना करना पड़ा था। इस लिहाज से 2024 में कांग्रेस का प्रदर्शन निश्चित तौर पर बेहतर रहा। इसी चुनाव में जन अधिकार पार्टी के अध्यक्ष बाबू सिंह कुशवाहा को जौनपुर से सपा के सिंबल पर चुनाव लड़ाया गया। उन्होंने जीत दर्ज की और पहली बार लोकसभा पहुंचे। हालांकि तृणमूल कांग्रेस को गठबंधन का फायदा नहीं मिला। भदोही से उसके उम्मीदवार ललितेश पति त्रिपाठी चुनाव हार गए।

UP POLITICS 2027:  2019: बसपा को सबसे बड़ा फायदा

2019 का लोकसभा चुनाव अखिलेश के ‘चवन्नी से रुपया’ दावे के लिए सबसे मजबूत उदाहरणों में से एक है। करीब ढाई दशक बाद सपा और बसपा एक साथ चुनाव मैदान में उतरे। बसपा ने 38 और सपा ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा। नतीजों में बसपा ने 10 सीटें जीतीं, जबकि सपा को सिर्फ 5 सीटें मिलीं।

2014 में बसपा का लोकसभा में खाता तक नहीं खुला था। ऐसे में 2019 में 10 सीटों तक पहुंचना उसके लिए बड़ा सुधार था। हालांकि चुनाव के बाद सपा-बसपा गठबंधन टूट गया। यानी यहां गठबंधन से बसपा को स्पष्ट चुनावी बढ़त मिली, लेकिन यह गठबंधन लंबे समय तक नहीं चल सका।

2022: जयंत और राजभर की पार्टियां मजबूत हुईं

2022 विधानसभा चुनाव में सपा ने कई छोटे-बड़े दलों को साथ लेकर चुनाव लड़ा। इनमें जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल और ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी प्रमुख थीं। RLD ने 33 सीटों पर चुनाव लड़कर 8 सीटें जीतीं। 2017 में पार्टी सिर्फ एक सीट जीत पाई थी। वहीं SBSP ने 19 सीटों पर चुनाव लड़कर 6 सीटें जीतीं। 2017 में भाजपा के साथ गठबंधन में उसे 4 सीटें मिली थीं। इस लिहाज से राजभर की पार्टी के प्रदर्शन में भी सुधार हुआ।

UP POLITICS 2027: लेकिन हर सहयोगी की किस्मत नहीं चमकी

सपा के साथ गठबंधन करने वाले सभी दलों को सफलता मिली, ऐसा कहना सही नहीं होगा। अपना दल (कमेरावादी) ने 6 सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ सिराथू सीट जीत सकी। हालांकि इस सीट पर पल्लवी पटेल ने तत्कालीन डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया। दूसरी ओर महान दल को सपा गठबंधन में 8 सीटें मिलीं, लेकिन उसका कोई उम्मीदवार नहीं जीत सका। जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) भी गठबंधन में चुनाव लड़कर अपना खाता नहीं खोल सकी।यानी गठबंधन से चुनाव लड़ने का मौका मिलना और चुनावी सफलता मिलना दो अलग बातें हैं।

2017 में कांग्रेस को गठबंधन से फायदा नहीं मिला

2017 विधानसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था। कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 7 सीटों पर जीत हासिल कर सकी। 2012 में कांग्रेस के 28 विधायक थे। यानी 2017 में पार्टी को 21 सीटों का नुकसान हुआ। इसलिए अगर अखिलेश के दावे की चार चुनावों के आधार पर पड़ताल की जाए तो 2017 का उदाहरण उनके दावे के खिलाफ जाता है।

एक्सपर्ट का क्या कहना है?

वरिष्ठ पत्रकार समीरात्मज मिश्र के मुताबिक, पिछले तीन चुनावों 2019 लोकसभा, 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा में सपा के साथ गठबंधन करने वाली बड़ी पार्टियों को कुल मिलाकर फायदा मिला।उनका कहना है कि भाजपा की तुलना में सपा ने अपने सहयोगियों को कई बार ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका दिया। हालांकि चुनाव में जीत या हार अलग विषय है। सपा प्रवक्ता मनोज काका भी पार्टी के गठबंधन रिकॉर्ड को इसी नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस 2019 में एक सीट पर थी और 2024 में सपा के साथ आने के बाद 6 सीटों तक पहुंची। बसपा भी 2014 के शून्य से 2019 में 10 सीटों पर पहुंची।

UP POLITICS 2027: तो क्या अखिलेश का ‘चवन्नी से रुपया’ दावा सही है?

आंकड़ों को देखें तो कई बड़े सहयोगियों के मामले में अखिलेश के दावे में दम दिखाई देता है, खासकर कांग्रेस और बसपा के प्रदर्शन में स्पष्ट सुधार हुआ। 2022 में RLD और SBSP ने भी अपने पिछले प्रदर्शन की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया। लेकिन पूरी तस्वीर में कुछ अपवाद भी हैं। महान दल और जनवादी पार्टी जैसे सहयोगियों को गठबंधन के बावजूद चुनावी सफलता नहीं मिली। 2017 में कांग्रेस का प्रदर्शन भी कमजोर रहा।

इसलिए आंकड़ों के आधार पर यह कहना ज्यादा सही होगा कि सपा के साथ गठबंधन ने कई सहयोगियों को चुनावी और राजनीतिक विस्तार का मौका दिया, लेकिन इसे हर सहयोगी के लिए ‘चवन्नी से रुपया’ बनने की गारंटी नहीं कहा जा सकता। और यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम राजनीतिक पहलू है- गठबंधन में सीटों का बंटवारा, वोट ट्रांसफर और चुनावी सफलता तीनों अलग-अलग चीजें हैं। अखिलेश के बयान ने अब इसी पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है कि यूपी की गठबंधन राजनीति में कौन किसे मजबूत करता है और चुनाव के बाद किसका राजनीतिक पलड़ा भारी होता है।

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