US-Saudi Deal: 22 जुलाई को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका-सऊदी अरब नागरिक परमाणु सहयोग समझौते को मंजूरी दी। इस समझौते का उद्देश्य सऊदी अरब को अमेरिकी तकनीक के जरिए परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम विकसित करने में मदद देना है। हालांकि, इस डील को लेकर परमाणु हथियारों के प्रसार की आशंकाएं भी तेज हो गई हैं।
US-Saudi Deal: ईरान के खिलाफ रणनीतिक कदम माना जा रहा समझौता-
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका इस डील के जरिए अपने पुराने सहयोगी सऊदी अरब को और मजबूत करना चाहता है। सऊदी अरब लंबे समय से पश्चिम एशिया में ईरान का सबसे बड़ा क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी माना जाता है।
US-Saudi Deal: यूरेनियम संवर्धन को लेकर बढ़ी चिंता-
रिपोर्टों के मुताबिक, नए समझौते में सऊदी अरब को अपने देश में यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) की अनुमति मिलने की संभावना जताई गई है। आलोचकों का कहना है कि इससे भविष्य में परमाणु हथियार बनाने की क्षमता विकसित हो सकती है। हालांकि, ट्रंप ने इस दावे से इनकार किया है।
क्या बदलेगी अमेरिका की परमाणु नीति-
अब तक अमेरिका जिन देशों के साथ परमाणु सहयोग समझौते करता रहा है, उनमें अतिरिक्त सुरक्षा प्रावधान और IAEA की कड़ी निगरानी शामिल होती थी। लेकिन इस डील में इन शर्तों के कमजोर होने की खबरों ने अमेरिकी सांसदों और विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।
ईरान-इजरायल तनाव के बीच नई बहस-
अमेरिका और इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध करते रहे हैं। ऐसे में सऊदी अरब को परमाणु तकनीक देने की खबरों ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या वॉशिंगटन अलग-अलग देशों के लिए अलग नीति अपना रहा है।
अब्राहम एकॉर्ड्स से भी जोड़ी गई शर्त-
ट्रंप प्रशासन ने इस समझौते के साथ यह शर्त भी रखी है कि सऊदी अरब को अब्राहम एकॉर्ड्स में शामिल होकर इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।
सऊदी अरब परमाणु ऊर्जा क्यों चाहता है-
दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक होने के बावजूद सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था में विविधता लाने, कार्बन उत्सर्जन कम करने और बिजली उत्पादन के लिए परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल करना चाहता है। इससे घरेलू तेल की खपत घटेगी और निर्यात बढ़ाने में मदद मिलेगी।
चीन और रूस भी दौड़ में शामिल-
अगर अमेरिका के साथ समझौता किसी वजह से आगे नहीं बढ़ता, तो चीन, रूस, दक्षिण कोरिया और फ्रांस जैसे देश भी सऊदी अरब के परमाणु ऊर्जा प्रोजेक्ट में साझेदारी करने के इच्छुक हैं। इससे इस डील का भू-राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।
कांग्रेस की मंजूरी होगी अहम-
ट्रंप प्रशासन के कांग्रेस में समझौता पेश करने के बाद सांसदों के पास इसे रोकने के लिए 90 सेशन-दिन का समय होगा। हालांकि, राष्ट्रपति के वीटो को पलटने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ेगी, जो आसान नहीं माना जा रहा है।
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