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सर्बिया में छात्र आंदोलन ने कैसे पलटी सत्ता? 14 साल बाद वुसिक की हार, भ्रष्टाचार विरोधी लहर से बदला पूरा खेल

Student movement: सर्बिया के संसदीय चुनाव में छात्र आंदोलन से जुड़ी ‘स्टूडेंट लिस्ट’ ने बड़ी जीत दर्ज कर देश की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। करीब 14 साल से सत्ता पर प्रभाव रखने वाली सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी (SNS) को बड़ा झटका लगा है। शुरुआती चुनावी अनुमानों में छात्र समर्थित सूची को स्पष्ट बहुमत मिलता दिखा, जिसके बाद अलेक्जेंडर वुसिक ने हार स्वीकार कर ली। नवंबर 2024 में रेलवे स्टेशन हादसे के बाद शुरू हुआ विरोध कैसे देशव्यापी आंदोलन बना और उसने चुनावी राजनीति को कैसे प्रभावित किया? जानिए 10 बड़ी बातें।

सर्बिया में क्या हुआ, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा?

सर्बिया में 25 अक्टूबर 2026 को मध्यावधि संसदीय चुनाव हुए। शुरुआती अनुमानों में छात्र आंदोलन से जुड़ी ‘स्टूडेंट लिस्ट’ को बढ़त मिली। इसके बाद अलेक्जेंडर वुसिक ने स्वीकार किया कि उनका गठबंधन चुनाव हार गया है। यह नतीजा इसलिए अहम है, क्योंकि लंबे समय तक सड़कों पर प्रदर्शन करने वाले छात्र आंदोलन ने चुनावी राजनीति में भी अपनी ताकत दिखाई है। हालांकि, वुसिक के बयान के समय आधिकारिक अंतिम परिणाम घोषित नहीं हुए थे।

Student movement: कौन हैं अलेक्जेंडर वुसिक और उनकी पार्टी को क्यों लगा झटका?

अलेक्जेंडर वुसिक सर्बिया की राजनीति के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे हैं। उनकी सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी (SNS) वर्ष 2012 से देश की राजनीति में प्रभावशाली रही। वुसिक प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, दोनों पदों पर रह चुके हैं। उनकी सरकार को आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे से जुड़े कामों के लिए समर्थन मिला, लेकिन साथ ही भ्रष्टाचार के आरोपों, सरकारी संस्थाओं की स्वतंत्रता और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। छात्र आंदोलन ने जवाबदेही और पारदर्शिता जैसे मुद्दों को उठाकर सरकार को चुनौती दी।

‘स्टूडेंट लिस्ट’ को कितनी सीटें मिलने का अनुमान है?

सर्बिया की संसद में कुल 250 सीटें हैं। बहुमत के लिए 126 सीटों की जरूरत होती है। वुसिक ने शुरुआती चुनावी आकलन के आधार पर कहा कि छात्र समर्थित ‘स्टूडेंट लिस्ट’ को 135 से 140 सीटें मिल सकती हैं, जबकि उनके गठबंधन को करीब 105 सीटें मिलने का अनुमान है। इन अनुमानों के मुताबिक, छात्र समर्थित सूची बहुमत के आंकड़े को पार करती दिख रही है। हालांकि, अंतिम सीटों की पुष्टि आधिकारिक परिणामों से ही होगी।

Student movement: छात्र आंदोलन को कितने वोट मिले?

वुसिक के साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, छात्र समर्थित सूची को करीब 22 लाख वोट, जबकि उनके गठबंधन को लगभग 17.2 लाख वोट मिले। रिपोर्टों में छात्र समर्थित सूची को करीब 52 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान भी सामने आया है। ये आंकड़े शुरुआती चुनावी आकलन पर आधारित हैं। अंतिम मतगणना के बाद ही वोटों और सीटों का आधिकारिक ब्योरा स्पष्ट होगा।

आखिर कैसे शुरू हुआ था छात्र आंदोलन?

इस आंदोलन की शुरुआत नवंबर 2024 में नोवी साद शहर के रेलवे स्टेशन पर हुए हादसे के बाद हुई थी। स्टेशन की छतरी गिरने से 16 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना ने निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, सरकारी जवाबदेही और कथित भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। हादसे के बाद छात्रों ने प्रदर्शन शुरू किए। उन्होंने घटना की निष्पक्ष जांच, संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने और जिम्मेदारी तय करने की मांग की। धीरे-धीरे ये प्रदर्शन विश्वविद्यालयों की नाकेबंदी और देशव्यापी आंदोलन में बदल गए।

Student movement: हादसे के विरोध से सरकार के खिलाफ व्यापक आंदोलन कैसे बना?

रेलवे स्टेशन हादसे के बाद शुरू हुआ विरोध केवल एक घटना तक सीमित नहीं रहा। प्रदर्शनकारियों ने इसे सरकारी पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थाओं की कार्यप्रणाली से जुड़े व्यापक सवालों से जोड़ दिया। आंदोलन का दायरा बढ़ने के साथ सरकार की नीतियों और शासन के तरीके को लेकर असंतोष भी सामने आया। छात्रों ने रैलियों, प्रदर्शनों और विश्वविद्यालयों की नाकेबंदी के जरिए अपनी मांगें उठाईं। करीब दो साल तक चले इस आंदोलन ने वुसिक के राजनीतिक वर्चस्व को बड़ी चुनौती दी।

Student movement: छात्र आंदोलन की प्रमुख मांगें क्या थीं?

आंदोलन से जुड़े छात्रों ने सरकारी संस्थाओं में पारदर्शिता, कानून के शासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई पर जोर दिया। उनकी मांग थी कि रेलवे स्टेशन हादसे की निष्पक्ष जांच हो और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए। बाद में आंदोलन का एजेंडा व्यापक हुआ। इसमें संस्थागत सुधार और सरकारी कामकाज को अधिक पारदर्शी बनाने जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए। चुनावी सफलता के बाद इन मांगों को नीतियों और प्रशासनिक फैसलों में बदलना आंदोलन के सामने बड़ी चुनौती होगी।

‘स्टूडेंट लिस्ट’ ने पारंपरिक राजनीतिक दलों को कैसे चुनौती दी?

छात्र आंदोलन ने केवल विरोध प्रदर्शन करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि चुनाव में उतरकर राजनीतिक विकल्प पेश किया। उसकी सूची में विश्वविद्यालयों से जुड़े लोगों के अलावा अलग-अलग क्षेत्रों के उम्मीदवार भी शामिल थे। इस रणनीति के जरिए आंदोलन ने सड़क पर जुटे जनसमर्थन को वोटों में बदलने की कोशिश की। शुरुआती अनुमानों में मिली बढ़त बताती है कि आंदोलन पारंपरिक राजनीतिक दलों के सामने मजबूत चुनौती बनकर उभरा। अब उसके सामने एकजुट नेतृत्व और प्रभावी शासन व्यवस्था तैयार करने की जिम्मेदारी होगी।

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Student movement: वुसिक ने राष्ट्रपति पद क्यों छोड़ा था?

सर्बिया की सरकारी सूचना के मुताबिक, अलेक्जेंडर वुसिक ने 27 सितंबर 2026 को राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने कहा था कि वह आगामी मध्यावधि संसदीय चुनाव में अपनी राजनीतिक सूची का नेतृत्व करना चाहते हैं। इसके बाद संसद की अध्यक्ष एना ब्रनाबिच ने कार्यवाहक राष्ट्रपति की जिम्मेदारी संभाली। वुसिक ने दिसंबर के अंत तक नए राष्ट्रपति का चुनाव कराने की बात भी कही थी। इस तरह संसदीय चुनाव से पहले ही देश में राजनीतिक बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो गई थी।

अब सर्बिया की राजनीति में आगे क्या होगा?

वुसिक ने चुनाव में हार स्वीकार करते हुए कहा कि उनका राजनीतिक गठबंधन संसद में विपक्ष की भूमिका निभाएगा। दूसरी ओर, छात्र आंदोलन से जुड़े उम्मीदवारों के सामने सरकार बनाने और अपने चुनावी वादों को लागू करने की चुनौती होगी। अगर शुरुआती अनुमान अंतिम परिणामों में बदलते हैं, तो नई राजनीतिक व्यवस्था से भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई, संस्थागत सुधार और सरकारी पारदर्शिता के मामले में ठोस कदम उठाने की अपेक्षा की जाएगी। सरकार चलाना आंदोलन करने से अलग चुनौती है। नई राजनीतिक टीम को अर्थव्यवस्था, विदेश नीति, न्याय व्यवस्था और प्रशासन जैसे मुद्दों पर भी फैसले लेने होंगे। इसलिए चुनावी जीत के बाद असली परीक्षा अपने वादों को पूरा करने की होगी।

Student movement: सड़क से संसद तक पहुंचा छात्र आंदोलन

सर्बिया में छात्र आंदोलन ने दिखाया कि किसी हादसे के बाद उठी जवाबदेही की मांग व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकती है। नवंबर 2024 में नोवी साद रेलवे स्टेशन हादसे के बाद शुरू हुआ विरोध करीब दो साल में चुनावी चुनौती बन गया। शुरुआती अनुमानों में छात्र समर्थित ‘स्टूडेंट लिस्ट’ को बहुमत मिलता दिखा और अलेक्जेंडर वुसिक ने हार स्वीकार कर ली। अब देश की राजनीति की अगली दिशा आधिकारिक चुनाव परिणामों, सरकार गठन और आंदोलन की मांगों पर अमल से तय होगी।

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