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सरकार बदली, ‘विदेशी हाथ’ का आरोप नहीं! जेपी आंदोलन से NEET-SIR तक क्या है पूरा मामला?

CJP PROTEST: भारत में जब भी कोई बड़ा आंदोलन खड़ा होता है, तो विरोध की वजहों और सरकार की प्रतिक्रिया के साथ एक सवाल भी चर्चा में आ जाता है- क्या इसके पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है? 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण (जेपी) के आंदोलन से लेकर 2011 के अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और हाल के NEET पेपर लीक व मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ प्रदर्शनों तक, अलग-अलग राजनीतिक दौर में इस तरह के आरोप सामने आते रहे हैं। आखिर सरकारें आंदोलनों को विदेशी साजिश से जोड़कर क्यों देखती हैं? समझिए पूरी कहानी।

हाल के प्रदर्शनों पर क्यों उठे सवाल?

हाल के दिनों में NEET पेपर लीक और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए। इन मुद्दों पर राजनीतिक दलों, छात्रों और सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाए। प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों के समर्थन में संविधान और लोकतांत्रिक अधिकारों का हवाला दिया। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 अक्टूबर को विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि जब दुनिया नई व्यवस्था की तलाश कर रही है, तब कुछ लोग भारत में अव्यवस्था का सपना देख रहे हैं और देश की वैश्विक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी अपने एक संबोधन में फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में हुए विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए भारत में अस्थिरता पैदा करने की आशंका जताई। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने सोशल मीडिया पर प्रदर्शनकारियों के लिए ‘दिमागी नक्सली’, ‘अराजकतावादी’ और ‘देशद्रोही’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। वहीं, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने विपक्ष पर विदेशी ताकतों के इशारे पर देश में अस्थिरता फैलाने की साजिश रचने का आरोप लगाया। इन बयानों के बीच एक पुराना सवाल फिर चर्चा में है- क्या सरकारों के लिए विरोध प्रदर्शनों को विदेशी साजिश से जोड़ना राजनीतिक प्रतिक्रिया का एक तरीका बन गया है?

CJP PROTEST: 2011 का अन्ना आंदोलन: तब कांग्रेस सरकार ने क्या कहा था?

साल 2011 में केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। इसी दौरान सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून और मजबूत लोकपाल की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। अरविंद केजरीवाल समेत कई सामाजिक कार्यकर्ता भी इस आंदोलन से जुड़े थे। अन्ना हजारे के अनशन और देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए प्रदर्शनों को व्यापक जनसमर्थन मिला। आंदोलन के दबाव में लोकपाल के मुद्दे पर संसद में चर्चा हुई और सरकार को इस विषय पर अपना रुख स्पष्ट करना पड़ा।

हालांकि, आंदोलन के दौरान कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इसकी रणनीति और मंशा पर सवाल उठाए। इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दबाव बनाने वाला कदम बताया गया और विदेशी समर्थन को लेकर भी संदेह जताया गया। इससे स्पष्ट हुआ कि किसी आंदोलन को लेकर विवाद केवल उसकी मांगों तक सीमित नहीं रहता। उसकी फंडिंग, नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव भी बहस का हिस्सा बन सकते हैं।

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राशिद अल्वी ने अमेरिका को लेकर क्या सवाल उठाए थे?

अगस्त 2011 में कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने अन्ना हजारे के अनिश्चितकालीन अनशन पर सवाल उठाए थे। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें ऐसी ताकतों का जिक्र था जो भारत को उसका उचित वैश्विक स्थान हासिल करते नहीं देखना चाहतीं।अल्वी ने सवाल किया था कि आखिर ये ताकतें कौन हैं और अमेरिका को अन्ना आंदोलन जारी रहने की बात कहने की जरूरत क्यों पड़ी? उनके बयान का आशय आंदोलन के पीछे संभावित बाहरी समर्थन को लेकर संदेह जताना था।

हालांकि, अमेरिकी विदेश विभाग की तत्कालीन प्रवक्ता विक्टोरिया नुलैंड ने उन खबरों को खारिज कर दिया था, जिनमें कहा गया था कि अमेरिका भारत के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का समर्थन कर रहा है। उन्होंने ऐसी खबरों को गलत रिपोर्टिंग बताया था। अमेरिकी सीनेटर जॉन मैक्केन ने भी दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल देने के आरोपों को खारिज किया था। इसी दौर में कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने अन्ना हजारे और उनकी टीम पर तीखी टिप्पणी की थी। बाद में उन्होंने हजारे से लिखित रूप में माफी भी मांगी।यानी अन्ना आंदोलन के दौरान भी विदेशी समर्थन को लेकर राजनीतिक आरोप लगे, लेकिन इन आरोपों और उनके प्रमाणित होने के बीच अंतर करना जरूरी है।

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CJP PROTEST: जेपी आंदोलन और इंदिरा गांधी का ‘विदेशी हाथ’ वाला तर्क

1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार, महंगाई और तत्कालीन सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ। बिहार से शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख मुद्दा बन गया। जेपी ने छात्रों, युवाओं और विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश की।

उस समय केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार थी। आंदोलन के बढ़ते प्रभाव और राजनीतिक टकराव के बीच सरकार की ओर से देश में अस्थिरता पैदा करने वाली ताकतों का जिक्र किया गया। विदेशी तत्वों की भूमिका को लेकर भी आशंकाएं जताई गईं। 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। इसके बाद विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर प्रतिबंध लगाए गए और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक अंकुश लगा। इंदिरा गांधी ने आपातकाल के पक्ष में दलील देते हुए देश की एकता, स्थिरता और सुरक्षा से जुड़े खतरों का उल्लेख किया था। सरकार का तर्क था कि देश में ऐसी परिस्थितियां बन रही थीं, जिनसे राष्ट्रीय व्यवस्था प्रभावित हो सकती थी। हालांकि, जेपी आंदोलन को विदेशी साजिश बताने के दावों को उस समय के राजनीतिक संदर्भ में समझना जरूरी है। किसी आंदोलन में विदेशी हस्तक्षेप की आशंका जताना और उसके समर्थन में ठोस सबूत पेश करना दो अलग-अलग बातें हैं।

रामचंद्र गुहा ने आपातकाल के संदर्भ में क्या लिखा?

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने आपातकाल के इतिहास पर लिखते हुए इंदिरा गांधी के उन तर्कों का उल्लेख किया, जिनमें विपक्षी आंदोलन को सरकार और देश की गतिविधियां ठप करने की कोशिश के रूप में पेश किया गया था। गुहा के लेख के मुताबिक, आपातकाल लागू होने के लगभग एक सप्ताह बाद इंदिरा गांधी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि विपक्षी दल सरकार का कामकाज रोककर सत्ता हासिल करना चाहते हैं। उन्होंने आशंका जताई थी कि हालात बिगड़ने पर देश की एकता और सुरक्षा के सामने खतरे पैदा हो सकते हैं। गुहा ने इंदिरा गांधी के एक रेडियो संबोधन का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने देश के बाहर मौजूद ऐसी ताकतों की बात कही थी, जिन्हें भारत का मजबूत और एकजुट होना पसंद नहीं था। इन बयानों से पता चलता है कि उस समय सरकार ने राजनीतिक विरोध को केवल घरेलू असहमति के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और बाहरी खतरों के नजरिए से भी पेश किया था।

CJP PROTEST: सरकारें आंदोलनों को विदेशी साजिश से क्यों जोड़ती हैं?

किसी आंदोलन के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ होने का दावा राजनीति में कई तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके पीछे कुछ संभावित कारण हैं।पहला, आंदोलन की विश्वसनीयता पर सवाल: जब सरकार किसी प्रदर्शन को विदेशी समर्थन से जोड़ती है, तो आंदोलन की मांगों और उसके नेतृत्व पर संदेह पैदा हो सकता है। दूसरा, राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क: सरकारें यह दलील दे सकती हैं कि कुछ ताकतें देश में अस्थिरता फैलाने के लिए असंतोष का फायदा उठा सकती हैं। हालांकि, ऐसे दावों के समर्थन में ठोस प्रमाण जरूरी हैं।

तीसरा, राजनीतिक विरोध को कमजोर करना: विदेशी साजिश का आरोप आंदोलन को जनसमर्थन से जुड़े सवाल के बजाय राष्ट्रहित और राष्ट्रविरोध की बहस में बदल सकता है। चौथा, वास्तविक चिंताओं और राजनीतिक आरोपों के बीच अंतर: किसी आंदोलन में बाहरी समर्थन की संभावना की जांच करना अलग बात है, जबकि बिना प्रमाण पूरे आंदोलन को विदेशी साजिश बताना अलग। दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

क्या विरोध प्रदर्शन करना देश को अस्थिर करना है?

लोकतंत्र में सरकार की नीतियों का विरोध करना, सवाल पूछना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों के अधिकारों का हिस्सा है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से, बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर संविधान में निर्धारित उचित प्रतिबंध भी लागू होते हैं। इसलिए किसी आंदोलन की प्रकृति का आकलन उसकी मांगों, तरीकों, उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के उल्लंघन जैसे पहलुओं के आधार पर किया जाना चाहिए।

यदि किसी प्रदर्शन में हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या किसी गैरकानूनी गतिविधि के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन केवल सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने से किसी आंदोलन को विदेशी साजिश या देशविरोधी गतिविधि करार नहीं दिया जा सकता। इसी तरह, किसी आंदोलन के आयोजकों को भी अपनी फंडिंग, नेतृत्व और गतिविधियों को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब तथ्यों के आधार पर देना चाहिए।

सरकारें बदलती हैं, लेकिन ‘विदेशी हाथ’ की बहस लौट आती है

जेपी आंदोलन से लेकर अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और हाल के NEET व SIR विरोध प्रदर्शनों तक, अलग-अलग राजनीतिक दौर में आंदोलनों की मंशा और उनके पीछे कथित बाहरी समर्थन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इन उदाहरणों में एक समानता यह है कि सत्ता और विरोध के बीच टकराव बढ़ने पर बहस अक्सर आंदोलन की मांगों से आगे बढ़कर उसकी मंशा और संभावित समर्थन तक पहुंच जाती है। लेकिन किसी आंदोलन को विदेशी साजिश बताने का दावा अपने आप में उसका प्रमाण नहीं है। लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह वास्तविक सुरक्षा खतरों की जांच करे और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित करे।

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