Yusuf Pathan: वडोदरा नगर निगम ने पूर्व भारतीय क्रिकेटर और सांसद यूसुफ पठान को 978 वर्ग मीटर जमीन देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। खास बात यह है कि जिस जमीन पर कथित अतिक्रमण के मामले में नगर निगम ने करीब दो साल पहले उन्हें नोटिस जारी किया था, अब उसी जमीन को आवंटित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।नगर निगम की स्थायी समिति ने 23 अक्टूबर की शाम इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से मंजूरी दी। समिति के सभी 12 सदस्य भाजपा के पार्षद हैं। हालांकि, अभी इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला होना बाकी है। अब इसे नगर निगम की सामान्य सभा में पेश किया जाएगा। सामान्य सभा की मंजूरी मिलने के बाद ही इस पर अंतिम मुहर लगेगी। सामान्य सभा नगर निगम की सर्वोच्च विधायी और निर्णय लेने वाली संस्था है।इस मामले में सबसे अहम बात यह है कि गुजरात सरकार ने स्पष्ट किया है कि यूसुफ पठान को जमीन देने के फैसले को भविष्य में दूसरे मामलों के लिए मिसाल नहीं माना जाएगा। गौरतलब है कि सरकार 2014 में ही जमीन आवंटित करने के उनके प्रस्ताव को खारिज कर चुकी थी। अब करीब 12 साल बाद उसी मामले में दोबारा पहल की गई है।
Yusuf Pathan: यूसुफ पठान को कितनी जमीन मिलेगी?
वडोदरा की टाउन प्लानिंग स्कीम-22 के फाइनल प्लॉट नंबर 90 में कुल 978 वर्ग मीटर जमीन है। यह जमीन यूसुफ पठान के बंगले के पास स्थित है। नगर निगम के प्रस्ताव के मुताबिक, इसमें से 500 वर्ग मीटर जमीन उन्हें उपहार के रूप में दी जाएगी, जबकि बाकी 478 वर्ग मीटर जमीन रियायती दर पर आवंटित की जाएगी। इसकी कीमत वडोदरा शहरी विकास प्राधिकरण (वुडा) की ओर से तय मूल्य के आधार पर निर्धारित होगी।यूसुफ पठान भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व ऑलराउंडर हैं। उन्होंने 2024 में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीता था। हालांकि, इस साल मई में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार जाने और भाजपा की सरकार बनने के बाद उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी।सरकार ने प्रस्ताव में साफ किया है कि इस फैसले को भविष्य के दूसरे मामलों में उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। लेकिन इससे सवाल उठ रहा है कि अगर किसी व्यक्ति को सरकारी जमीन इस तरह दी जा सकती है, तो दूसरे लोग भी ऐसी मांग क्यों नहीं कर सकते? अगर यह मामला विशेष है, तो इसे विशेष मानने का कानूनी आधार क्या है?
Yusuf Pathan: सरकारी जमीन देने के लिए क्या हैं नियम?
गुजरात सरकार ने 17 सितंबर, 2002 को शहरी और क्षेत्रीय विकास प्राधिकरणों की जमीन और दूसरी संपत्तियों के आवंटन से जुड़े नियम अधिसूचित किए थे। इन्हें शहरी/क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण (जमीन और दूसरी संपत्तियों का निपटारा) विनियम, 2002 कहा जाता है।इन नियमों के विनियम 3(1) में जमीन आवंटित करने के तीन तरीके बताए गए हैं। पहला, सरकारी जमीन बेची जा सकती है। दूसरा, इसे अधिकतम 99 साल की लीज पर दिया जा सकता है, जिसके बदले प्रीमियम, किराया या दोनों लिए जा सकते हैं। तीसरा, जमीन के विकास का अधिकार दिया जा सकता है।हालांकि, सरकारी अधिकारियों ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि नियमों में कुछ बदलाव होने के बाद अब जमीन को 99 साल की लीज पर देने के बजाय बेचने की व्यवस्था अपनाई जाती है।विनियम 3(2) में जमीन आवंटित करने की प्रक्रिया का भी उल्लेख है। इसके तहत सार्वजनिक नीलामी, विज्ञापन के माध्यम से निविदाएं आमंत्रित करना, सरकार और सरकारी संस्थाओं से जुड़े कुछ प्रस्तावों पर विचार करना और निर्धारित शर्तों के तहत सार्वजनिक विज्ञापन जारी कर आवेदन मंगाना शामिल है।लेकिन इन नियमों में किसी व्यक्ति को सरकारी जमीन मुफ्त में उपहार के रूप में देने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इसी वजह से अधिकारियों ने यूसुफ पठान को जमीन देने के फैसले को अपवाद बताया है। उनके मुताबिक, राज्य सरकार अपनी विवेकाधीन शक्तियों का इस्तेमाल करके यह आवंटन कर रही है। सरकार चाहती है कि भविष्य में कोई दूसरा व्यक्ति इस फैसले को आधार बनाकर अपने लिए भी ऐसी रियायत की मांग न करे।

Yusuf Pathan: क्या विनियम 13 के तहत दी जा सकती है जमीन?
नगर निगम के प्रस्ताव में विनियम 13 का भी उल्लेख किया गया है। यह नियम विशेष मामलों में जमीन, भूखंड या विकास का अधिकार आवंटित करने से संबंधित है।इसके तहत विकास प्राधिकरण समाज के व्यापक हित में काम करने वाली संस्थाओं से प्रस्ताव मांग सकता है। इनमें धर्मार्थ ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थान, शोध संस्थान, सोसायटी और धार्मिक ट्रस्ट शामिल हैं। इसके अलावा दिव्यांग लोगों के लिए संस्थान, मूक-बधिर और दृष्टिबाधित लोगों के लिए सुविधाएं, खेल परिसर और इसी तरह की दूसरी जनहितकारी परियोजनाएं भी इसके दायरे में आती हैं।ऐसे मामलों में विकास प्राधिकरण को किसी विशेष संस्था को जमीन देने की सिफारिश राज्य सरकार के पास भेजनी होती है। इसके बाद सरकार की मंजूरी जरूरी होती है और उसका फैसला अंतिम माना जाता है।हालांकि, इस नियम में किसी व्यक्ति को सरकारी जमीन उपहार के रूप में देने की व्यवस्था नहीं है। इसका उद्देश्य समाज के व्यापक हित में काम करने वाली संस्थाओं और संगठनों को जमीन उपलब्ध कराना है।यूसुफ पठान के मामले में वडोदरा नगर निगम ने 2012 में राज्य सरकार से जमीन आवंटित करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन सरकार ने 2014 में इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। नगर निगम के अधिकारियों के मुताबिक, वडोदरा नगर निगम के इतिहास में किसी व्यक्ति को सरकारी जमीन उपहार में देने का यह पहला मामला है।
12 साल पहले खारिज हुआ प्रस्ताव अब क्यों लौटा?
यह सवाल इस पूरे विवाद के केंद्र में है। नागरिकों के समूह विश्वामित्री बचाओ समिति ने 22 अक्टूबर को नगर निगम को एक ज्ञापन सौंपकर जमीन आवंटित करने के प्रस्ताव पर आपत्ति जताई। समिति का कहना है कि यूसुफ पठान ने इस जमीन के लिए 3 मार्च, 2012 को आवेदन किया था, जिसे गुजरात सरकार ने 2014 में खारिज कर दिया था।समिति ने 9 जून, 2014 को जारी सरकारी पत्र का हवाला भी दिया है। इस पत्र में कहा गया था कि विशेष मामले के तौर पर जमीन आवंटित करने की अनुमति मांगने वाले प्रस्ताव पर विचार करने के बाद उसे अस्वीकार कर दिया गया था।समिति का तर्क है कि मूल आवेदन के करीब 14 साल बाद उसी मांग को नए सिरे से सामने लाया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि पहले खारिज किए जा चुके प्रस्ताव को अब दोबारा किस आधार पर मंजूरी दी जा रही है।
Yusuf Pathan: कथित अतिक्रमण पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
विश्वामित्री बचाओ समिति ने नगर निगम की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए हैं। समिति का कहना है कि अगर जमीन पर कथित अतिक्रमण था, तो नगर निगम ने इतने वर्षों तक उसे हटाने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए?समिति के मुताबिक, नगर निगम अपने क्षेत्र में दूसरे अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई करता रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि इस मामले में जमीन खाली कराने के लिए वैसी कार्रवाई क्यों नहीं की गई।समिति का मानना है कि इतने लंबे समय के बाद जमीन आवंटित करने का प्रस्ताव सामने आने से कानूनी समय-सीमा और संविधान में दिए गए समानता के अधिकार से जुड़े सवाल भी खड़े होते हैं।
पहले भी बड़े क्रिकेटर थे पठान, फिर अब रियायत क्यों?
विश्वामित्री बचाओ समिति का एक और सवाल है कि जब 2014 में यूसुफ पठान की जमीन आवंटित करने की मांग खारिज की गई थी, तब भी वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में एक जाना-पहचाना नाम थे। इसके बावजूद उस समय उनकी मांग स्वीकार नहीं की गई। अब इतने साल बाद उन्हें अलग शर्तों पर जमीन देने का प्रस्ताव क्यों लाया गया है?यूसुफ पठान ने भारत के लिए अपना आखिरी एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय और टी-20 मैच 2012 में खेला था। हालांकि, वह 2019 तक इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में खेलते रहे। वह 2011 से 2017 तक कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम का हिस्सा थे। इसके बाद 2018 और 2019 के सत्र में उन्होंने सनराइजर्स हैदराबाद के लिए खेला। आईपीएल में उनकी पहली टीम राजस्थान रॉयल्स थी, जिसके लिए वह 2008 से 2010 तक खेले थे।
Yusuf Pathan: दूसरे खिलाड़ियों के साथ भेदभाव का सवाल
समिति की ओर से मामले में पैरवी कर रहे अधिवक्ता शैलेश अमीन ने कहा कि इस फैसले से यूसुफ पठान के साथ दूसरे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों और खिलाड़ियों की तुलना में अलग व्यवहार किए जाने का सवाल उठ सकता है।उन्होंने कहा, “मौजूदा प्रस्ताव से पठान के साथ दूसरे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों और खिलाड़ियों के मुकाबले अलग व्यवहार होने का खतरा है। दूसरे खिलाड़ी भी ऐसी ही रियायत मांगना चाहेंगे, लेकिन सरकार ने पहले ही कह दिया है कि इस फैसले को मिसाल नहीं माना जा सकता।”शैलेश अमीन ने आगे कहा कि वडोदरा में कई ऐसे क्रिकेटर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल चुके हैं। शहर में अर्जुन पुरस्कार पाने वाले चार खिलाड़ी भी हैं। ऐसे में सवाल है कि किसी दूसरे खिलाड़ी को इस तरह जमीन का उपहार क्यों नहीं दिया गया?उन्होंने भारतीय महिला क्रिकेट टीम की खिलाड़ी यास्तिका भाटिया और पुरुष टीम के ऑलराउंडर हार्दिक पांड्या का उदाहरण देते हुए पूछा कि क्या सरकार इन खिलाड़ियों को भी भूखंड उपहार में देने पर विचार करेगी।समिति का कहना है कि इस फैसले के तहत करोड़ों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति रियायत के रूप में दी जा रही है। इसलिए सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि जिस मांग को पहले खारिज कर दिया गया था, उसे अब अलग नजरिए से क्यों देखा जा रहा है।
दूसरी जमीन मिलने से पहले नगर निगम अपनी जमीन क्यों छोड़े?
इस विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू जमीन के बदले दूसरी जमीन उपलब्ध कराने से जुड़ा है। राज्य सरकार के राजस्व विभाग ने नगर निगम को आश्वासन दिया है कि यूसुफ पठान को दी जाने वाली जमीन के बराबर मूल्य की दूसरी जमीन उपलब्ध कराई जाएगी।हालांकि, विश्वामित्री बचाओ समिति ने इस आश्वासन पर भी सवाल उठाए हैं। समिति का कहना है कि नगर निगम को केवल इस भरोसे पर अपनी जमीन नहीं छोड़नी चाहिए कि भविष्य में उसे दूसरी जमीन मिल जाएगी।समिति के मुताबिक, जब तक नगर निगम को बदले में दी जाने वाली जमीन वास्तव में नहीं मिल जाती, तब तक मौजूदा जमीन का हस्तांतरण नहीं किया जाना चाहिए।
Yusuf Pathan: जमीन आवंटन के फैसले पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
यूसुफ पठान को जमीन देने का मामला केवल एक पूर्व क्रिकेटर को जमीन आवंटित करने तक सीमित नहीं है। इससे सरकारी संपत्ति के इस्तेमाल, जमीन आवंटित करने की कानूनी प्रक्रिया, समानता के अधिकार और पहले खारिज किए गए प्रस्ताव को दोबारा मंजूरी देने के आधार जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे जुड़े हैं।सरकार ने इस फैसले को अपवाद बताया है और स्पष्ट किया है कि इसे भविष्य के मामलों में मिसाल नहीं माना जाएगा। वहीं, विश्वामित्री बचाओ समिति का सवाल है कि जब संबंधित नियमों में किसी व्यक्ति को सरकारी जमीन उपहार में देने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो इस फैसले को किस कानूनी आधार पर सही ठहराया जा सकता है।फिलहाल, प्रस्ताव पर नगर निगम की सामान्य सभा की मंजूरी बाकी है। ऐसे में आगे की प्रक्रिया और सरकार की ओर से दिए जाने वाले स्पष्टीकरण पर इस पूरे मामले की दिशा निर्भर करेगी।








