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अरुणाचल प्रदेश से अक्साई चीन तक, जानें भारत-चीन सीमा विवाद का पूरा इतिहास और तनाव की वजहें

भारत-चीन सीमा विवाद के पीछे की असली वजह
भारत-चीन सीमा विवाद के पीछे की असली वजह

India China Dispute: अरुणाचल प्रदेश में भारत और चीन के बीच सीमा पर एक बार फिर तनाव बढ़ने की खबरें सामने आई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, चीनी सैनिकों ने गश्त कर रहे भारतीय जवानों और कुछ भारतीय नागरिकों को रोकने की कोशिश की। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के महानिदेशक शत्रुजीत सिन्हा ने 22 अक्टूबर को बताया कि सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच कई बार तनाव की स्थिति बनी है।यह स्थिति 25 अगस्त को दोनों देशों के बीच बनी सहमति से अलग है। उस दिन चीन के विदेश मंत्री वांग यी और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने बीजिंग में मुलाकात की थी। सीमा विवाद पर हुई 25वें दौर की वार्ता में दोनों देशों ने तनाव कम करने, सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने तथा आपसी संबंधों को बेहतर बनाने की प्रतिबद्धता जताई थी।

India China Dispute: रिश्तों में सुधार के बाद फिर बढ़ा तनाव

2020 में गलवान घाटी में हुए सैन्य टकराव के बाद भारत और चीन के संबंधों में काफी तनाव आ गया था। हालांकि, इस साल दोनों देशों के रिश्तों में सुधार के संकेत दिखाई दिए। अगस्त में दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने मुलाकात कर संबंधों को बेहतर बनाने पर चर्चा की। करीब छह साल के अंतराल के बाद भारत और चीन के बीच सीधी उड़ान सेवा भी दोबारा शुरू हुई। इसके अलावा, सितंबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आए थे। इन घटनाओं से दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की उम्मीद जगी थी, लेकिन सीमा पर तनाव की नई खबरों ने एक बार फिर स्थिति को चिंताजनक बना दिया है।

शिमला समझौता और मैकमोहन रेखा का विवाद

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को समझने के लिए 1914 में हुए शिमला समझौते को जानना जरूरी है। उस समय भारत पर ब्रिटिश शासन था, जबकि तिब्बत एक अलग क्षेत्र के रूप में मौजूद था। 1914 में शिमला सम्मेलन के दौरान भारत और तिब्बत के बीच मैकमोहन रेखा के जरिए सीमा निर्धारित की गई थी। अक्टूबर 1949 में माओत्से तुंग के नेतृत्व में चीन में नई सरकार बनने के बाद स्थिति बदल गई। करीब एक साल बाद चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया, जिससे भारत और चीन की सीमाएं एक-दूसरे के करीब आ गईं।चीन ने शिमला समझौते को मानने से इनकार कर दिया। उसका तर्क है कि तिब्बत को स्वतंत्र रूप से ऐसा समझौता करने का अधिकार नहीं था और ब्रिटिश सरकार ने यह समझौता तिब्बत पर थोपा था। चीन अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा बताता है, जबकि भारत इसे अपना अभिन्न हिस्सा मानता है।

India China Dispute: अक्साई चीन में सड़क निर्माण से बढ़ा विवाद

तिब्बत पर कब्जे के बाद चीन ने इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने और शिनजियांग को तिब्बत से जोड़ने के लिए सड़क निर्माण शुरू किया। 1951 में उसने अक्साई चीन से गुजरने वाली शिनजियांग-तिब्बत सड़क का निर्माण गुपचुप तरीके से शुरू किया था। यह सड़क आज जी219 राजमार्ग के नाम से जानी जाती है। अक्साई चीन से होकर गुजरने वाला यह मार्ग चीन के लिए रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र पर भारत अपना दावा करता है, जबकि चीन इसे अपने नियंत्रण में रखता है।

पंचशील समझौते के बाद भी नहीं सुलझे मतभेद

1954 में भारत और चीन के बीच पंचशील समझौता हुआ। इसका उद्देश्य शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों के आधार पर दोनों देशों के संबंधों को आगे बढ़ाना था। हालांकि, पश्चिमी क्षेत्र में अक्साई चीन और पूर्वी क्षेत्र में अरुणाचल प्रदेश को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बने रहे।1959 में तिब्बत में चीन के शासन के खिलाफ बड़ा विद्रोह हुआ। चीन ने इस विद्रोह को सख्ती से कुचल दिया। इसके बाद तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने मार्च 1959 में भारत में शरण ली। भारत के इस फैसले से चीन नाराज हो गया। उसे आशंका थी कि भारत तिब्बत में उसके खिलाफ हो रहे विद्रोह को समर्थन दे रहा है। इसके बाद सीमा पर दोनों देशों की सेनाओं के बीच छोटी-छोटी झड़पें शुरू हो गईं।

India China Dispute: भारत-चीन सीमा विवाद के पीछे की असली वजह
भारत-चीन सीमा विवाद के पीछे की असली वजह
India China Dispute: फॉरवर्ड पॉलिसी और 1962 का युद्ध

इस दौरान चीन सीमा के पास अपनी चौकियां बनाने और सड़कों का निर्माण करने में जुटा रहा। इससे उसके सैनिकों के लिए सीमा तक पहुंचना आसान हो गया। चीन की इन गतिविधियों के जवाब में भारत ने फॉरवर्ड पॉलिसी अपनाई। इसके तहत भारतीय सेना ने भी सीमा के नजदीक अपनी चौकियां बनानी शुरू कीं। भारत को उम्मीद थी कि इससे चीन की आगे बढ़ने की गतिविधियों पर रोक लगेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।20 अक्टूबर 1962 को चीन ने लद्दाख के पश्चिमी क्षेत्र और तत्कालीन नेफा, जिसे अब अरुणाचल प्रदेश कहा जाता है, में एक साथ हमला कर दिया। युद्ध के शुरुआती दौर में बढ़त हासिल करने के बाद चीन ने 21 नवंबर 1962 को युद्धविराम की घोषणा कर दी। इसके बाद चीनी सेना अरुणाचल प्रदेश की सीमा से पीछे हट गई, लेकिन अक्साई चीन पर अपना कब्जा बनाए रखा।

India China Dispute: भारत-चीन सीमा कितनी लंबी है?

भारत और चीन के बीच सीमा की लंबाई लगभग 3,488 किलोमीटर मानी जाती है। दोनों देशों के बीच सीमा को लेकर मतभेद हैं और कई जगहों पर वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी की स्थिति को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते हैं। इस सीमा को मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बांटा जाता है, जिनमें पश्चिमी क्षेत्र, मध्य क्षेत्र और पूर्वी क्षेत्र शामिल हैं। इन तीनों क्षेत्रों में विवाद की प्रकृति और संवेदनशीलता अलग-अलग है।

पश्चिमी क्षेत्र: अक्साई चीन पर विवाद

पश्चिमी क्षेत्र में करीब 2,152 किलोमीटर लंबी सीमा आती है। यहां विवाद का मुख्य केंद्र अक्साई चीन है। लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर के इस इलाके को भारत लद्दाख का हिस्सा मानता है, जबकि चीन इस पर अपना दावा करता है। फिलहाल इस क्षेत्र पर चीन का नियंत्रण है, जिसे भारत अवैध कब्जा मानता है।सीमा निर्धारण को लेकर भी दोनों देशों के विचार अलग हैं। भारत 1865 में प्रस्तावित जॉनसन रेखा को आधार मानता है, जबकि चीन 1893 की मैकडोनाल्ड रेखा का हवाला देता है। 2020 में गलवान घाटी में हुआ सैन्य टकराव भी इसी क्षेत्र में हुआ था। इसके अलावा, पैंगोंग त्सो झील, डेपसांग मैदान, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स और डेमचोक जैसे इलाकों को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद रहा है।

मध्य क्षेत्र: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश से लगी सीमा

मध्य क्षेत्र में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश से लगी लगभग 625 किलोमीटर लंबी सीमा शामिल है। तीनों क्षेत्रों की तुलना में इसे अपेक्षाकृत शांत माना जाता है। हालांकि, यहां भी कुछ इलाकों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद हैं। उत्तराखंड के बाराहोती मैदान और हिमाचल प्रदेश की कौरिक तथा नेलांग घाटी से जुड़े क्षेत्र विवादित हैं। इस हिस्से में सैन्य झड़पें दूसरे क्षेत्रों की तुलना में कम होती हैं।

पूर्वी क्षेत्र: अरुणाचल प्रदेश पर चीन का दावा

पूर्वी क्षेत्र में सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से लगी लगभग 1,140 किलोमीटर लंबी सीमा आती है। यह हिस्सा भारत और चीन के बीच सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। चीन शिमला समझौते के तहत तय की गई मैकमोहन रेखा को स्वीकार नहीं करता। वह अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत बताकर इस पर अपना दावा करता है। भारत चीन के इस दावे को खारिज करता है और अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा मानता है। इस क्षेत्र में नाथू ला और नाकु ला जैसे दर्रों को लेकर भी तनाव की स्थिति बनती रही है।

India China Dispute: डोकलाम विवाद में 73 दिनों तक आमने-सामने रहीं सेनाएं

2017 में भारत, चीन और भूटान की सीमाओं के मिलन बिंदु के पास स्थित डोकलाम पठार में बड़ा सैन्य गतिरोध हुआ था। उस समय चीन इस इलाके में सड़क बना रहा था। यह क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर के करीब है, जो पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। चीन की सड़क निर्माण गतिविधियों का भारत ने विरोध किया। इसके बाद दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आ गईं। यह गतिरोध करीब 73 दिनों तक चला था।

1993 में शांति और स्थिरता समझौता

सीमा पर शांति बनाए रखने और विवाद को सुलझाने के लिए भारत और चीन ने पिछले कई दशकों में कई समझौते किए हैं। 1993 में दोनों देशों ने सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता किया। इसके तहत तय हुआ कि सीमा विवाद का अंतिम समाधान होने तक दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करेंगे और सीमा पर सैनिकों की संख्या सीमित रखने की दिशा में काम करेंगे।

India China Dispute: 1996 में सैन्य गतिविधियों पर नियंत्रण

1996 में दोनों देशों ने विश्वास बहाली के उपायों के तहत सीमा पर बल प्रयोग नहीं करने पर सहमति जताई। इसके अलावा, वास्तविक नियंत्रण रेखा के दो किलोमीटर के दायरे में गोलीबारी और खतरनाक हथियारों के इस्तेमाल पर रोक लगाने का फैसला किया गया।

2005 में सीमा समाधान की राजनीतिक रूपरेखा

2005 में भारत और चीन सीमा विवाद के समाधान के लिए राजनीतिक मानकों और मार्गदर्शक सिद्धांतों पर सहमत हुए। इसका उद्देश्य विवाद सुलझाने के लिए एक व्यापक रूपरेखा तैयार करना था, ताकि दोनों देशों के बीच सीमा निर्धारण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके।

India China Dispute: 2013 में सीमा रक्षा सहयोग समझौता

2013 में दोनों देशों ने सीमा रक्षा सहयोग समझौता किया। इसका मकसद सीमा पर गश्त के दौरान अचानक होने वाली झड़पों को रोकना और दोनों सेनाओं के बीच बातचीत तथा संचार को बेहतर बनाना था। इसके अलावा, किसी गलतफहमी या स्थानीय टकराव को बढ़ने से रोकने के लिए दोनों देशों के स्थानीय सैन्य कमांडरों के बीच हॉटलाइन की व्यवस्था भी की गई।

सैन्य वार्ताओं से तनाव कम करने की कोशिश

सीमा विवाद पर बातचीत के लिए भारत और चीन के बीच विशेष प्रतिनिधि तंत्र बनाया गया है। इसके तहत अब तक 25 दौर की वार्ता हो चुकी है। 2020 में गलवान घाटी में हुए टकराव के बाद से दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच कमांडर स्तर की बैठकें होती रही हैं। इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य विवादित इलाकों से सैनिकों को पीछे हटाना और सीमा पर तनाव कम करना रहा है।

India China Dispute: 2024 में गश्त को लेकर बनी सहमति

अक्टूबर 2024 में भारत और चीन के बीच सीमा पर गश्त को लेकर एक समझौता हुआ। इसके तहत डेपसांग और डेमचोक जैसे विवादित क्षेत्रों में सैनिकों की तैनाती को 2020 से पहले की स्थिति के अनुरूप करने और गश्त दोबारा शुरू करने पर सहमति बनी।हालांकि, सीमा पर तनाव की ताजा खबरें बताती हैं कि दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने के प्रयासों के बावजूद विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सीमा पर स्थायी शांति के लिए दोनों देशों के बीच बातचीत, आपसी सहमति और वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर मतभेदों का समाधान जरूरी बना हुआ है।