Israeli Elections: इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव होने हैं। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान और ईरान में हुए संघर्षों के बाद यह देश का पहला राष्ट्रीय चुनाव है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह चुनाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रॉयटर्स की 29 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, कई सर्वेक्षणों में उनकी पार्टी को नुकसान होने के संकेत मिले थे। हालांकि, विपक्ष के सामने भी चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन जुटाने की चुनौती है।इजराइल की चुनावी व्यवस्था भारत से अलग है। यहां नागरिक सीधे प्रधानमंत्री को नहीं चुनते, बल्कि राजनीतिक पार्टियों को वोट देते हैं। चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए पार्टियों को दूसरी पार्टियों का समर्थन हासिल करना पड़ता है। इसी वजह से कम सीटें जीतने वाली पार्टियां भी सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
Israeli Elections: इजराइल में कैसे होते हैं चुनाव?
इजराइल का क्षेत्रफल पूर्वोत्तर भारत के मिजोरम राज्य के लगभग बराबर है। यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत संसदीय चुनाव होते हैं। पूरे देश को एक निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है और मतदाता अपनी पसंद की राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं। इस चुनाव के जरिए इजराइल की संसद यानी नेसेट के 120 सदस्यों का चयन किया जाता है।इजराइल की संसद का सामान्य कार्यकाल चार साल का होता है। हालांकि, राजनीतिक अस्थिरता या अन्य कारणों से संसद का कार्यकाल पूरा होने से पहले भी चुनाव कराए जा सकते हैं। देश में 18 साल या उससे अधिक उम्र के पात्र नागरिक मतदान कर सकते हैं। मतदाता किसी एक उम्मीदवार को चुनने के बजाय राजनीतिक पार्टी की सूची के पक्ष में वोट देते हैं।
पार्टियों को कैसे मिलती हैं संसद में सीटें?
इजराइल में चुनाव के दौरान किसी पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसी के अनुपात में उसे संसद में सीटें आवंटित की जाती हैं। हालांकि, संसद में प्रतिनिधित्व पाने के लिए पार्टी को देशभर में कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध वोट हासिल करना जरूरी होता है। इस सीमा को पार करने वाली पार्टियों को सीटों के बंटवारे में शामिल किया जाता है।इस व्यवस्था में किसी एक पार्टी को सबसे ज्यादा वोट मिलना सरकार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। उसे संसद में बहुमत का समर्थन भी जुटाना होता है। नेसेट में कुल 120 सीटें हैं, इसलिए सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है।

Israeli Elections: चुनाव के बाद प्रधानमंत्री कैसे चुना जाता है?
इजराइल में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी का नेता अपने आप प्रधानमंत्री नहीं बन जाता। चुनाव के नतीजे आने के बाद राष्ट्रपति प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत करते हैं। इसके बाद उस सांसद को सरकार बनाने का मौका दिया जाता है, जिसके पास संसद में बहुमत का समर्थन जुटाने की बेहतर संभावना होती है।सरकार बनाने की जिम्मेदारी मिलने के बाद संबंधित नेता को दूसरी पार्टियों के साथ बातचीत करके गठबंधन तैयार करना होता है। सामान्य प्रक्रिया के तहत उसे इसके लिए 28 दिन का समय मिलता है। जरूरत पड़ने पर इस अवधि को 14 दिन तक बढ़ाया जा सकता है। गठबंधन तैयार होने के बाद सरकार को संसद में आवश्यक समर्थन हासिल करना होता है।अगर पहला नेता सरकार बनाने में सफल नहीं होता, तो किसी दूसरे नेता को भी मौका दिया जा सकता है। यदि कोई भी नेता बहुमत जुटाने में नाकाम रहता है, तो राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ सकती है।
सरकार बनाने के लिए गठबंधन क्यों जरूरी है?
इजराइल की चुनावी व्यवस्था में गठबंधन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। अब तक किसी एक पार्टी को नेसेट की सभी 120 सीटों में से अपने दम पर बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में चुनाव के बाद पार्टियां मिलकर सरकार बनाने की कोशिश करती हैं।उदाहरण के लिए, अगर किसी पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिलती हैं, लेकिन उसके पास 61 सांसदों का समर्थन नहीं है, तो उसे अन्य दलों के साथ समझौता करना पड़ता है। इन समझौतों में मंत्री पदों का बंटवारा, सरकारी नीतियां और अलग-अलग मुद्दों पर सहमति बनाना शामिल हो सकता है।गठबंधन में शामिल छोटी पार्टियां भी इस कारण महत्वपूर्ण हो जाती हैं। अगर कोई सहयोगी दल सरकार से समर्थन वापस ले लेता है, तो बहुमत का आंकड़ा प्रभावित हो सकता है। इससे सरकार की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।
Israeli Elections: नेतन्याहू के सामने कौन-कौन से नेता हैं?
इस चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के सामने विपक्ष के कई प्रमुख नेता और राजनीतिक दल हैं। इनमें इजराइल के पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट का नाम शामिल है। वह याशर पार्टी के नेता हैं और नेतन्याहू के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों में गिने जाते हैं।इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी चुनावी मुकाबले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वह पहले भी नेतन्याहू के विरोध में अलग-अलग विपक्षी दलों को एक साथ लाने में भूमिका निभा चुके हैं। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड भी विपक्ष के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं।अविग्दोर लिबरमैन भी नेतन्याहू के सामने चुनौती पेश कर रहे हैं। वह इजराइल के पूर्व रक्षा मंत्री रह चुके हैं और कभी नेतन्याहू के सहयोगी थे, लेकिन बाद में उनके आलोचक बन गए। इनके अलावा यायर गोलान के नेतृत्व वाला वामपंथी दल डेमोक्रेट्स और अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां भी चुनावी राजनीति का हिस्सा हैं।

नेतन्याहू की लोकप्रियता पर क्यों उठे सवाल?
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था और सरकार की जवाबदेही को लेकर सवाल उठे थे। इसके बाद गाजा में युद्ध शुरू हुआ और संघर्ष का विस्तार लेबनान तथा ईरान तक हुआ। इन घटनाओं के बीच नेतन्याहू सरकार की नीतियों और सुरक्षा से जुड़े फैसलों पर चर्चा होती रही है।रॉयटर्स की 29 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सर्वेक्षणों में नेतन्याहू की पार्टी को चुनाव में नुकसान होने के संकेत मिले थे। हमास के हमले के बाद देश की सुरक्षा को लेकर उनकी राजनीतिक छवि पर भी सवाल उठे। इसके अलावा धर्म और राज्य के संबंधों से जुड़ी सरकार की नीतियां भी इजराइल के कई नागरिकों के बीच विवाद का विषय रही हैं।हालांकि, नेतन्याहू इजराइल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल हैं। उन्हें राजनीतिक गठबंधन बनाने और सरकार चलाने का लंबा अनुभव है। वह 1996 से अलग-अलग अवधियों में लगभग 19 साल तक प्रधानमंत्री रह चुके हैं। इसलिए चुनाव में उनकी पार्टी की स्थिति का आकलन करते समय केवल सर्वेक्षणों के बजाय गठबंधन की संभावनाओं और चुनाव के बाद के राजनीतिक समीकरणों को भी समझना जरूरी है।
Israeli Elections: नेतन्याहू के समर्थन में कौन-कौन सी पार्टियां हैं?
नेतन्याहू के राजनीतिक खेमे में उनकी अपनी दक्षिणपंथी पार्टी लिकुड के अलावा बेजलेल स्मोट्रिच की धार्मिक राष्ट्रवादी पार्टी और इतामार बेन-ग्विर की यहूदी पावर पार्टी शामिल हैं। इन दलों की विचारधारा और नीतियां इजराइल की घरेलू राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली शास और यूनाइटेड टोरा जूडिज्म जैसी पार्टियां भी सरकार बनाने के समीकरण में अहम हैं। सैन्य सेवा से छूट की मांग को लेकर इन दलों और सरकार के बीच मतभेद सामने आते रहे हैं। इसलिए चुनाव के बाद इन पार्टियों का समर्थन सरकार के गठन और उसके कामकाज पर असर डाल सकता है।वहीं, विपक्षी खेमे में गादी आइजेनकोट, नफ्ताली बेनेट, यायर लैपिड, अविग्दोर लिबरमैन और अन्य दल शामिल हैं। विपक्ष के सामने चुनौती केवल चुनाव में नेतन्याहू की पार्टी का मुकाबला करना नहीं है, बल्कि अलग-अलग विचारधारा वाले दलों के बीच सहमति बनाकर बहुमत वाला गठबंधन तैयार करना भी है।
इजराइल के चुनाव से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सीटें हैं। संसद का सामान्य कार्यकाल चार साल का होता है और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। देश में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू है, जिसके तहत संसद में प्रवेश के लिए किसी पार्टी को कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध वोट हासिल करने होते हैं।यहां मतदाता सीधे प्रधानमंत्री को नहीं चुनते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। चुनाव के बाद राष्ट्रपति की भूमिका और पार्टियों के बीच बातचीत के जरिए सरकार बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। यदि कोई दल अकेले बहुमत हासिल नहीं करता, तो गठबंधन सरकार बनाने की जरूरत पड़ती है।
Israeli Elections: चुनाव के बाद किसके हाथ में होगी सत्ता?
इजराइल का चुनाव केवल इस बात से तय नहीं होता कि किस पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिलीं। चुनाव के बाद असली चुनौती संसद में बहुमत जुटाने और स्थिर सरकार बनाने की होती है। इसके लिए राजनीतिक दलों को अपने मतभेदों के बावजूद साझा मुद्दों पर सहमति बनानी पड़ती है।27 अक्टूबर 2026 के चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी लिकुड पार्टी के सामने विपक्षी दलों की चुनौती है। लेकिन अंतिम राजनीतिक तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि चुनाव के बाद कौन-से दल एक साथ आते हैं और कौन कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जुटा पाता है।








