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क्या डेटा प्रोटेक्शन कानून से पत्रकारिता पर लगेगी लगाम? सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, केंद्र को नोटिस

DPDP Act Explained: डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के कई प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। 21 मीडिया संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी रिपोर्टिंग, गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा और सार्वजनिक हित से जुड़ी खबरों की पड़ताल प्रभावित हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। सहमति की शर्त से लेकर खबरें हटाने की आशंका और RTI कानून में बदलाव तक, जानिए इस विवाद के 7 बड़े सवालों के जवाब।

मीडिया संस्थान ने सुप्रीम कोर्ट का किया रुख

डिजिटल दौर में लोगों की निजी जानकारी की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। वेबसाइट, मोबाइल ऐप और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लोगों का व्यक्तिगत डेटा इस्तेमाल होता है। इस जानकारी के इस्तेमाल और सुरक्षा के लिए नियम तय करने के उद्देश्य से डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून बनाया गया। इस कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर मीडिया संस्थानों ने सवाल उठाए हैं। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) का तर्क है कि व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल पर लागू होने वाली शर्तें पत्रकारों के लिए भ्रष्टाचार, कॉर्पोरेट अनियमितताओं और अन्य सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की जांच करना मुश्किल बना सकती हैं।

संगठन ने कानून के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब इस मामले में निजता के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर कानूनी बहस होगी।

DPDP Act Explained: 1. DPDP एक्ट क्या है और इसे क्यों बनाया गया?

DPDP एक्ट का पूरा नाम डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 है। इसका उद्देश्य डिजिटल माध्यमों में लोगों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा करना और उसका इस्तेमाल करने वाली संस्थाओं की जिम्मेदारियां तय करना है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति किसी वेबसाइट या मोबाइल ऐप पर अपना नाम, फोन नंबर, ईमेल या अन्य निजी जानकारी साझा करता है, तो उस जानकारी के इस्तेमाल और सुरक्षा से जुड़े नियम लागू हो सकते हैं।

इस कानून का उद्देश्य लोगों की निजी जानकारी के दुरुपयोग को रोकना और डेटा के इस्तेमाल में जवाबदेही सुनिश्चित करना है। लेकिन पत्रकारिता के दौरान कई बार ऐसी जानकारी की पड़ताल करनी पड़ती है, जिसका संबंध किसी व्यक्ति के निजी डेटा से हो सकता है। भ्रष्टाचार या सरकारी योजनाओं में कथित गड़बड़ी की जांच करते समय पत्रकारों को दस्तावेजों, रिकॉर्ड और दूसरे स्रोतों से मिली जानकारी का विश्लेषण करना पड़ सकता है। DNPA की चिंता है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट कानूनी छूट नहीं होने से ऐसी जांच प्रभावित हो सकती है। संगठन ने इसी आधार पर कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी है।

2. सुप्रीम कोर्ट में मामला क्यों पहुंचा?

DNPA ने 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें DPDP एक्ट के कई प्रावधानों और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन नियम, 2025 के कुछ नियमों को चुनौती दी गई है। 27 अक्टूबर को मामले पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। संगठन ने चुनौती दिए गए प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग भी की है। अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित बताई गई है।

DNPA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने दलील दी कि कानून के कुछ प्रावधानों से न्यूजरूम का कामकाज प्रभावित हो सकता है। संगठन का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था खोजी पत्रकारिता और सार्वजनिक हित में रिपोर्टिंग के सामने कानूनी मुश्किलें खड़ी कर सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का नोटिस जारी करना कानून को असंवैधानिक घोषित करने के बराबर नहीं है। फिलहाल अदालत ने केंद्र से जवाब मांगा है। कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय आना बाकी है।

DPDP Act Explained: 3. DNPA को कानून के किन प्रावधानों पर आपत्ति है?

DNPA ने अपनी याचिका में DPDP एक्ट की धारा 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3) को चुनौती दी है। इसके अलावा, DPDP नियम, 2025 के नियम 16, 17 और 23 को भी चुनौती दी गई है। संगठन की आपत्तियां मुख्य रूप से इन मुद्दों से जुड़ी हैं: व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल के लिए सहमति की शर्त। सहमति वापस लेने और डेटा मिटाने के अनुरोध का प्रकाशित खबरों पर संभावित असर। सरकार की ओर से जानकारी मांगने की शक्तियां। पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान सुरक्षित रखने का सवाल। RTI कानून में व्यक्तिगत जानकारी से जुड़े प्रावधानों में बदलाव। सरकारी संस्थाओं को मिलने वाली छूट और पत्रकारिता के लिए स्पष्ट सुरक्षा का अभाव। DNPA का तर्क है कि इन प्रावधानों का संयुक्त प्रभाव प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार पर पड़ सकता है। ये याचिकाकर्ता की आपत्तियां हैं।

4. सहमति की शर्त से खोजी पत्रकारिता कैसे प्रभावित हो सकती है?

DNPA की प्रमुख आपत्तियों में व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल से पहले सहमति लेने की शर्त शामिल है। संगठन को आशंका है कि पत्रकारिता में इस शर्त का सख्ती से इस्तेमाल होने पर किसी मामले की जांच प्रभावित हो सकती है। इसे एक उदाहरण से समझिए। मान लीजिए, किसी पत्रकार को सरकारी योजना में कथित अनियमितता की जानकारी मिलती है। वह दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर मामले की पड़ताल कर रहा है। यदि जांच के दौरान संबंधित व्यक्ति को पहले ही पता चल जाए कि उसकी गतिविधियों की जांच हो रही है, तो वह सबूत नष्ट करने या संभावित गवाहों पर दबाव डालने की कोशिश कर सकता है।

DPDP Act Explained
                                                             DPDP Act Explained

DNPA का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में सहमति की शर्त खोजी पत्रकारिता के कामकाज को कठिन बना सकती है। संगठन को आशंका है कि पत्रकारों को जांच से जुड़े व्यक्तियों की सहमति लेने की बाध्यता का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि कानून के तहत हर पत्रकार को हर खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति लेनी ही होगी। वास्तविक स्थिति संबंधित प्रावधानों, उनके लागू होने और अदालत की व्याख्या पर निर्भर करेगी।

DPDP Act Explained: 5. क्या कानून के कारण प्रकाशित खबरें हटाने का दबाव बन सकता है?

DNPA ने डेटा मिटाने के अनुरोध से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन को आशंका है कि कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत डेटा को मिटाने की मांग करके पहले से प्रकाशित खबरों को हटवाने या उनमें बदलाव कराने का दबाव बना सकता है। उदाहरण के लिए, किसी खबर में सार्वजनिक हित से जुड़े तथ्य प्रकाशित किए गए हों। बाद में संबंधित व्यक्ति अपनी निजी जानकारी हटाने की मांग करे, तो मीडिया संस्थान के सामने सवाल खड़ा हो सकता है कि उस जानकारी को हटाना जरूरी है या खबर को सुरक्षित रखना अधिक महत्वपूर्ण है। DNPA का तर्क है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट सुरक्षा नहीं होने से ऐसे अनुरोधों का इस्तेमाल खबरों पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि DPDP एक्ट के तहत प्रकाशित हर खबर हटाना अनिवार्य है। डेटा मिटाने के अधिकार का किसी खबर पर क्या असर होगा, यह संबंधित कानूनी प्रावधानों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसी स्पष्टता और सुरक्षा की मांग को लेकर मीडिया संस्थानों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

6. पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा क्यों?

खोजी पत्रकारिता में गोपनीय सूत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कई बार सरकारी विभागों, कंपनियों या अन्य संस्थानों के भीतर काम करने वाले लोग कथित गड़बड़ियों से जुड़े दस्तावेज और जानकारी पत्रकारों तक पहुंचाते हैं। पहचान सार्वजनिक होने के डर से ऐसे लोग जानकारी साझा करने में हिचक सकते हैं।

DNPA ने सरकार को संस्थाओं से जानकारी मांगने की शक्तियां दिए जाने पर सवाल उठाए हैं। संगठन की आशंका है कि इन शक्तियों के इस्तेमाल से पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान सामने आ सकती है। यदि किसी सूत्र को अपनी पहचान उजागर होने का डर हो, तो वह भ्रष्टाचार, कॉर्पोरेट अनियमितताओं या चुनावी गड़बड़ियों से जुड़ी जानकारी देने से बच सकता है। इससे सार्वजनिक हित की पड़ताल प्रभावित होने की आशंका है।

यहां भी अंतर समझना जरूरी है। DNPA ने सरकार की शक्तियों के संभावित इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई है। अदालत ने अभी यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि कानून के इन प्रावधानों से पत्रकारों के सूत्रों की पहचान निश्चित रूप से उजागर होगी।

7. RTI कानून में बदलाव को लेकर क्या विवाद है?

DNPA ने DPDP एक्ट की धारा 44(3) को भी चुनौती दी है। यह प्रावधान सूचना का अधिकार (RTI) कानून की धारा 8(1)(j) में बदलाव से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे पर लागू होने वाली व्यवस्था में बदलाव से सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में सूचना प्राप्त करना कठिन हो सकता है।

इसे एक उदाहरण से समझिए। यदि कोई नागरिक किसी सरकारी अधिकारी के कामकाज, सरकारी योजना या सार्वजनिक धन के इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी मांगता है, तो संबंधित रिकॉर्ड में व्यक्तिगत जानकारी भी हो सकती है। ऐसे मामलों में सवाल उठता है कि निजी जानकारी की सुरक्षा और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। DNPA की चिंता है कि RTI कानून में बदलाव और डेटा सुरक्षा के नियम मिलकर पत्रकारों तथा नागरिकों की सार्वजनिक हित की जानकारी तक पहुंच को प्रभावित कर सकते हैं।

DPDP Act Explained: 8. DNPA क्या है और इसमें कौन-कौन से मीडिया संस्थान शामिल हैं?

DNPA यानी डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन डिजिटल समाचार प्रकाशकों का संगठन है। यह 21 मीडिया संस्थानों के डिजिटल समाचार कारोबार का प्रतिनिधित्व करता है। इसके सदस्यों में नेटवर्क18, NDTV, द इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट समेत कई बड़े मीडिया समूह शामिल हैं। इनमें मुकेश अंबानी और गौतम अडाणी से जुड़े मीडिया समूह भी हैं। डिजिटल मीडिया संस्थानों को समाचार प्रकाशित करने के साथ-साथ डेटा सुरक्षा, कानूनी अनुपालन और ऑनलाइन सामग्री से जुड़े नियमों का भी ध्यान रखना पड़ता है। DNPA की याचिका इसी संदर्भ में मीडिया संस्थानों की चिंताओं को अदालत के सामने रखती है।

9. क्या DPDP एक्ट लागू होने से पत्रकारिता पर रोक लग जाएगी?

फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। DNPA ने कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी है और उनके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अभी इन प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है। कानून का उद्देश्य व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा करना है। दूसरी ओर, मीडिया संस्थानों का कहना है कि पत्रकारिता के कामकाज की प्रकृति को देखते हुए सार्वजनिक हित की जांच-पड़ताल के लिए पर्याप्त कानूनी सुरक्षा होनी चाहिए। इसलिए विवाद का मूल सवाल यह है कि निजता के अधिकार की रक्षा करते हुए पत्रकारों को सार्वजनिक हित की खबरों की पड़ताल करने और उन्हें प्रकाशित करने की स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित की जाए। कानून के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों को मई 2027 से लागू किए जाने का कार्यक्रम है। ऐसे में अदालत की कार्यवाही और सरकार का जवाब महत्वपूर्ण होंगे।

DPDP Act Explained: 10. अब सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने DNPA की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। संगठन ने चुनौती दिए गए प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग भी की है। आगे की सुनवाई में अदालत याचिकाकर्ताओं की दलीलों, केंद्र के जवाब और संबंधित कानूनी प्रावधानों पर विचार कर सकती है। दी गई जानकारी के अनुसार, मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित है। अदालत के सामने प्रमुख सवाल यह होगा कि चुनौती दिए गए प्रावधान संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप हैं या उनमें किसी तरह की सुरक्षा अथवा बदलाव की जरूरत है। अभी तक इस याचिका पर कानून को रद्द करने या चुनौती दिए गए प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने का अंतिम फैसला नहीं आया है। आगे की स्थिति अदालत की सुनवाई और आदेशों से स्पष्ट होगी।

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