US Midterm Elections: अमेरिका में 3 नवंबर को मिडटर्म चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। भारत में भी लोग इनके नतीजों को करीब से देखेंगे, क्योंकि इस बार भारतीय मूल के कई अमेरिकी नागरिक अलग-अलग पदों के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।इनमें कुछ उम्मीदवार अमेरिकी कांग्रेस में अपनी सीट बचाने की कोशिश कर रहे हैं, तो कुछ राज्य और स्थानीय राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए मैदान में हैं। ओहायो में विवेक रामास्वामी की गवर्नर पद की दावेदारी से लेकर कैलिफोर्निया और वॉशिंगटन में भारतीय मूल के उम्मीदवारों के बीच मुकाबले तक, कई चुनाव चर्चा में हैं।भारतीय मूल के लोगों की पहचान अब केवल कारोबार, टेक्नोलॉजी और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गई है। वे अमेरिकी कांग्रेस, राज्य सरकारों और बड़े शहरों के प्रशासन में भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं।2026 के मिडटर्म चुनाव में भारतीय मूल के उम्मीदवार डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन, दोनों पार्टियों से चुनाव लड़ रहे हैं। इनमें कुछ मौजूदा सांसद हैं, जो दोबारा जीतकर अपनी सीट बरकरार रखना चाहते हैं। वहीं, कुछ उम्मीदवार पहली बार बड़े राजनीतिक पद पर पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
रो खन्ना: छठी बार कांग्रेस पहुंचने की कोशिश
डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार रो खन्ना (Ro Khanna) कैलिफोर्निया के 17वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से चुनाव लड़ रहे हैं। वह सिलिकॉन वैली के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं और छठी बार अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। उनका मुकाबला रिपब्लिकन उम्मीदवार रितेश टंडन से है।रो खन्ना की राजनीति में टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर निर्माण, आर्थिक असमानता और अमेरिकी उद्योगों को मजबूत बनाने जैसे मुद्दे प्रमुख हैं।
वह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कई आर्थिक और इमिग्रेशन नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। उनका मानना है कि टेक्नोलॉजी में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा जरूरी है। साथ ही, आर्थिक विकास का लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित न रहकर आम कामगारों को भी मिलना चाहिए।उनका चुनावी क्षेत्र टेक्नोलॉजी कंपनियों का बड़ा केंद्र है। ऐसे में यहां का मुकाबला केवल दो उम्मीदवारों के बीच नहीं है, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, विदेशी कुशल कर्मचारियों के वीजा, टैक्स और कारोबार को लेकर दोनों की अलग-अलग सोच भी इस चुनाव का हिस्सा है। कैलिफोर्निया का यह क्षेत्र डेमोक्रेटिक पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता है।
प्रमिला जयपाल: इमिग्रेशन और स्वास्थ्य सेवाएं प्रमुख मुद्दे
चेन्नई में जन्मीं प्रमिला जयपाल (Pramila Jayapal) डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हैं। वह अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में छठा कार्यकाल हासिल करने के लिए चुनाव लड़ रही हैं। उनका मुकाबला रिपब्लिकन उम्मीदवार निरव शेठ से है।प्रमिला जयपाल लंबे समय से इमिग्रेशन सुधार, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रमिकों के अधिकारों और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों पर काम करती रही हैं।वह प्रवासियों के लिए नागरिकता हासिल करने की प्रक्रिया आसान बनाने, आम लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने और कर्मचारियों के अधिकार मजबूत करने की समर्थक हैं। इसके अलावा, वह ट्रंप प्रशासन की निर्वासन और इमिग्रेशन से जुड़ी नीतियों का विरोध भी करती रही हैं।इस चुनाव की खास बात यह है कि दोनों उम्मीदवार भारतीय मूल के हैं, लेकिन उनके राजनीतिक विचार अलग-अलग हैं। निरव शेठ कानूनी तरीके से अमेरिका आने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने के साथ-साथ देश की सीमा सुरक्षा मजबूत करने की बात करते हैं।
अमी बेरा: भारत-अमेरिका संबंधों पर भी नजर
डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अमी बेरा (Ami Bera) अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में सबसे लंबे समय से काम कर रहे भारतीय मूल के सांसदों में शामिल हैं। वह एक बार फिर चुनाव मैदान में हैं।स्वास्थ्य सेवाओं, सार्वजनिक सुविधाओं और भारत के साथ अमेरिका के संबंधों को मजबूत बनाने जैसे मुद्दे उनके राजनीतिक काम का अहम हिस्सा रहे हैं।अमी बेरा स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च कम करने, शिक्षा को बेहतर बनाने, बुनियादी सुविधाओं के विकास और क्षेत्रीय सुरक्षा पर जोर देते रहे हैं। विदेश नीति के मामले में उनकी खास दिलचस्पी हिंद-प्रशांत क्षेत्र और चीन से जुड़ी रणनीतिक चुनौतियों में रही है।भारत के लिहाज से भी उनका चुनाव महत्वपूर्ण है। अमेरिकी कांग्रेस में भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी, रक्षा सहयोग और एशिया की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर होने वाली चर्चाओं में सांसदों की भूमिका होती है। हालांकि, किसी एक सांसद की जीत या हार से दोनों देशों की पूरी विदेश नीति तय नहीं होती।
सुहास सुब्रमण्यम: सरकारी कर्मचारियों और टेक्नोलॉजी पर जोर
डेमोक्रेटिक उम्मीदवार सुहास सुब्रमण्यम 2025 में पहली बार अमेरिकी प्रतिनिधि सभा पहुंचे थे। अब वह दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मुकाबला रिपब्लिकन उम्मीदवार डेव बेकविथ और एक निर्दलीय उम्मीदवार से है।टेक्नोलॉजी क्षेत्र में काम करने का अनुभव रखने वाले सुहास के लिए सरकारी कर्मचारियों की नौकरियां, स्वास्थ्य सुविधाएं, छोटे कारोबार और डेटा सेंटर से जुड़े स्थानीय मुद्दे अहम हैं।उनके चुनावी क्षेत्र में बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी, टेक्नोलॉजी से जुड़े पेशेवर और सरकारी ठेकेदार रहते हैं। ऐसे में केंद्र सरकार के खर्च और कर्मचारियों से संबंधित नीतियां यहां के मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं।
विवेक रामास्वामी: ट्रंप के समर्थन के साथ गवर्नर पद की दौड़
भारतीय मूल के कारोबारी विवेक रामास्वामी 2026 के चुनाव में प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। वह 2024 के रिपब्लिकन राष्ट्रपति पद के चुनाव में भी उम्मीदवार रह चुके हैं। अब वह ओहायो के गवर्नर पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मुकाबला डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एमी एक्टन से है।रामास्वामी सरकारी विभागों की नौकरशाही और खर्च कम करने, नियमों में ढील देने, शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाने और आर्थिक अवसर बढ़ाने की बात करते हैं।वह पहले से ही डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक रहे हैं। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव की रिपब्लिकन प्राइमरी से अपना नाम वापस लेने के बाद उन्होंने ट्रंप का समर्थन किया था।इस बार उनके सामने राष्ट्रीय राजनीति में बनी अपनी पहचान को राज्य स्तर पर चुनावी सफलता में बदलने की चुनौती है।
अमीश शाह: पिछली हार के बाद फिर चुनाव मैदान में
डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अमीश शाह (Amish Shah) पेशे से डॉक्टर हैं और एरिजोना के पूर्व विधायक रह चुके हैं। इस बार उनका मुकाबला रिपब्लिकन उम्मीदवार जे फीली से है।2024 में अमीश शाह को इसी सीट पर हार का सामना करना पड़ा था। इस बार यह सीट इसलिए खाली हुई है, क्योंकि मौजूदा सांसद डेविड श्वाइकेर्ट गवर्नर पद के चुनाव में शामिल हो गए हैं।अक्टूबर में जारी एक सर्वे के अनुसार, अमीश शाह को 44.4 प्रतिशत और जे फीली को 41.6 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिला था। हालांकि, इस सर्वे की त्रुटि सीमा 5.4 प्रतिशत अंक थी। इसलिए इन आंकड़ों के आधार पर किसी उम्मीदवार की पक्की बढ़त नहीं मानी जा सकती।
पिया दांडिया: खाली सीट पर चुनावी मुकाबला
डेमोक्रेटिक उम्मीदवार पिया दांडिया एक खाली सीट से चुनाव लड़ रही हैं। उनका मुकाबला रिपब्लिकन कारोबारी केसी अस्कर से है।पेशे से शिक्षक और स्कूल प्रिंसिपल रह चुकीं पिया दांडिया का चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस सीट का नतीजा अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में बहुमत के गणित को प्रभावित कर सकता है।अगस्त 2026 में जारी एक सर्वे में पिया दांडिया को 46 प्रतिशत और उनके प्रतिद्वंद्वी को 44 प्रतिशत समर्थन मिला था। हालांकि, यह सर्वे डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े एक संगठन ने कराया था और मतदान से काफी पहले जारी हुआ था। इसलिए इसे चुनाव के अंतिम नतीजे का संकेत नहीं माना जा सकता।
US Midterm Elections: गवर्नर से मेयर तक, इन भारतीय मूल के उम्मीदवारों पर भी नजर
अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में भारतीय मूल के उम्मीदवारों की दावेदारी केवल कांग्रेस की सीटों तक सीमित नहीं है। कई उम्मीदवार गवर्नर, अटॉर्नी जनरल और मेयर जैसे महत्वपूर्ण पदों के लिए भी चुनाव लड़ रहे हैं।
निरव शाह: मेन के गवर्नर पद के उम्मीदवार
डॉक्टर और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन से जुड़े रहे निरव शाह डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार हैं। वह पहले मेन के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के निदेशक रह चुके हैं। इसके बाद उन्होंने अमेरिकी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) में वरिष्ठ अधिकारी के तौर पर भी काम किया। अब वह मेन के गवर्नर पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।
अरुणा मिलर: वेस मूर के साथ दोबारा चुनाव मैदान में
भारत में जन्मीं अरुणा मिलर डेमोक्रेटिक गवर्नर वेस मूर के साथ दोबारा चुनाव लड़ रही हैं। वह पहले ट्रांसपोर्टेशन इंजीनियर के रूप में काम कर चुकी हैं। 2022 में उन्हें मैरीलैंड का लेफ्टिनेंट गवर्नर चुना गया था। इस बार वह गवर्नर वेस मूर के साथ संयुक्त टिकट पर चुनाव मैदान में हैं।
सरिता कोमातिरेड्डी: न्यूयॉर्क के अटॉर्नी जनरल को चुनौती
रिपब्लिकन उम्मीदवार सरिता कोमातिरेड्डी पूर्व संघीय अभियोजक रह चुकी हैं। वह न्यूयॉर्क की मौजूदा डेमोक्रेटिक अटॉर्नी जनरल लेटिटिया जेम्स के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं।इस चुनाव में कानून-व्यवस्था और सरकारी जांच जैसे मुद्दे प्रमुख हैं।
नित्या रमन: लॉस एंजिलिस की मेयर बनने की कोशिश
भारतीय मूल की सिटी काउंसिल सदस्य नित्या रमन का मुकाबला लॉस एंजिलिस की मौजूदा मेयर करेन बास से है।उनके चुनावी मुद्दों में घरों की उपलब्धता, बेघर लोगों की समस्या, सार्वजनिक सुरक्षा और शहर में मिलने वाली सुविधाएं शामिल हैं।अगर नित्या रमन यह चुनाव जीतती हैं, तो वह लॉस एंजिलिस की पहली दक्षिण एशियाई महिला मेयर बनेंगी।इसके अलावा, टेक्सास में पूजा सेठी और संदीप श्रीवास्तव भी राज्य विधानसभा की सीटों के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। इस तरह भारतीय मूल के उम्मीदवार अमेरिकी राष्ट्रीय संसद से लेकर राज्य और स्थानीय प्रशासन तक अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
US Midterm Elections: क्या अमेरिकी कांग्रेस में बढ़ेगी ‘समोसा कॉकस’ की ताकत?
अमेरिकी कांग्रेस में भारतीय मूल के सांसदों के समूह को अनौपचारिक रूप से ‘समोसा कॉकस’ (Samosa Caucus) कहा जाता है।इस समूह के सदस्य इमिग्रेशन, स्वास्थ्य सेवाओं, टेक्नोलॉजी, व्यापार और विदेश नीति जैसे कई राष्ट्रीय मुद्दों पर होने वाली चर्चाओं में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।हालांकि, भारतीय मूल का होने का मतलब यह नहीं है कि सभी नेताओं की राजनीतिक सोच और प्राथमिकताएं एक जैसी होंगी।डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार आमतौर पर स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने, प्रवासियों के अधिकारों की रक्षा करने और सामाजिक सुरक्षा पर ज्यादा जोर देते हैं। वहीं, रिपब्लिकन उम्मीदवारों की प्राथमिकताओं में सरकारी खर्च कम करना, कारोबार को बढ़ावा देना और सीमा सुरक्षा मजबूत करना जैसे मुद्दे शामिल हैं।कुछ उम्मीदवारों का ध्यान राष्ट्रीय राजनीति से ज्यादा अपने चुनावी क्षेत्र की समस्याओं पर है। इनमें स्थानीय अर्थव्यवस्था, आवास, शिक्षा और रोजगार जैसे विषय शामिल हैं।इस चुनाव में यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि भारतीय मूल के उम्मीदवार अपनी व्यक्तिगत पहचान और स्थानीय लोगों के समर्थन को कितनी राजनीतिक ताकत में बदल पाते हैं।
US Midterm Elections: भारत के लिए क्यों अहम हैं अमेरिका के ये चुनाव?
भारत के नजरिए से अमेरिकी मिडटर्म चुनाव केवल भारतीय मूल के उम्मीदवारों की जीत और हार तक सीमित नहीं हैं। इन चुनावों के नतीजे अमेरिका की राजनीति में सत्ता का संतुलन बदल सकते हैं, जिसका असर भारत-अमेरिका संबंधों के अलग-अलग पहलुओं पर भी पड़ सकता है।हाल के दिनों में टैरिफ लगाने और एच-1बी वीजा से जुड़े फैसलों को लेकर ट्रंप प्रशासन के कई कदम चर्चा में रहे हैं।इन फैसलों का असर भारतीय कारोबारियों, पेशेवरों और उन लोगों पर पड़ सकता है, जो अमेरिका में नौकरी करने या अपना करियर बनाने की इच्छा रखते हैं।रो खन्नाऐसे में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव के नतीजे भारत के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे। इनसे यह समझने में मदद मिलेगी कि अमेरिकी राजनीति में आगे किस तरह की नीतियों और मुद्दों को अधिक महत्व मिल सकता है।








